परिचय

डॉ. कृष्ण अवतार

न्यूरोलॉजिस्ट · लेखक · साधक

संस्थापक एवं अध्यक्ष, सिनर्जी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, देहरादून

अध्यक्ष, रक्षा फाउंडेशन, देहरादून

अध्यक्ष, केयर वेलनेस सेंटर, देहरादून

यहाँ जो कुछ है, वह उपदेश नहीं है। वह केवल उतना है जितना रोगियों ने, ग्रन्थों ने तथा सन्तों की कृपा ने मुझे सिखाया।

krishna sir
पहला पड़ाव

जहाँ से सब आरम्भ हुआ

मेरा जन्म मेरठ, उत्तर प्रदेश में हुआ और आरम्भिक वर्ष संघर्षशील परिवेश में बीते। बालपन में जो मिला, वह सुविधा नहीं थी। वह संस्कार था।

बचपन

मेरा जन्म मेरठ, उत्तर प्रदेश में हुआ और आरम्भिक वर्ष संघर्षशील परिवेश में बीते। बालपन में जो मिला, वह सुविधा नहीं थी। वह संस्कार था।

मेरे पिता जी श्री लक्ष्मी चन्द जी एक व्यापारी थे। उनका जीवन दो ही बातों पर टिका था, सिद्धान्त तथा श्रद्धा। वे कहा करते थे कि साध्य के साथ साथ साधनों की पवित्रता भी उतनी ही आवश्यक है, और ईमानदारी का आचरण ही सच्ची आराधना है। जीवन में समझौता किस बात पर नहीं करना है, यह मैंने किसी पुस्तक से नहीं, उन्हीं को देखकर सीखा।

मेरी माता जी स्वर्गीय श्रीमती भगवती जी ने कभी यह आशीर्वाद नहीं दिया कि बड़ा आदमी बनो अथवा सफल आदमी बनो। उनका आशीर्वाद सदा एक ही रहा, कि तुझे सन्तों तथा गुरुजनों की कृपा से भगवान की सच्ची भक्ति मिले। वे कहती थीं कि यदि तेरे भीतर भगवान में प्रेम और जीवन में कर्तव्य परायणता आ गई, तो मेरा मातृत्व सफल हो जाएगा।

उनका एक ही आग्रह था। भगवान का आश्रय कभी मत छोड़ना, और संसार का आश्रय मत लेना। उस समय यह बात मुझे साधारण लगती थी। आज जानता हूँ कि मेरे जीवन की सबसे मूल्यवान पूँजी वही एक आग्रह था। इस वेबसाइट पर जो कुछ भी आध्यात्मिक है, उसका बीज मेरी माता जी की उसी बात में है।

हाई स्कूल एवं इंटरमीडिएट के लिए उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा आयोजित की गई परीक्षाओं में जब मेरा नाम मेरिट सूची में आया, तो उन दिनों घर में जो प्रसन्नता थी, वह मुझे आज भी स्मरण है। परन्तु उससे बड़ी बात यह हुई कि उस सफलता ने पहली बार दो भाव दिए। पहला यह विश्वास कि परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता, और दूसरा प्रभु के प्रति कृतज्ञता का वह भाव, जो उन दिनों के बाद आज तक नहीं छूटा।

इस प्रश्न का उत्तर मेरे लिए सरल नहीं है, क्योंकि इसका उत्तर मेरे जीवन की सबसे बड़ी क्षति है। सन् १९८६ में एक दुर्घटना में मैंने अपने पिता जी को खो दिया। मेरी आयु उस समय सोलह वर्ष थी। उस आघात ने भीतर सब कुछ स्थिर कर दिया। उस अवस्था में जो अनुभव हुआ, वह असहायता का था। यह भाव कि सामने कोई अपना जा रहा है, और आपके हाथ में कुछ नहीं है।

उसी असहायता से एक संकल्प निकला, कि यदि सम्भव हो सके तो जीवन ऐसा बनाऊँ जिसमें किसी और को यह असहायता कम अनुभव हो। मैंने चिकित्सा को नहीं चुना। सच यह है कि मेरे पिता जी के जाने ने मुझे चिकित्सा तक पहुँचा दिया। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरा पहला दुःख ही मेरा पहला मार्गदर्शक था।

दूसरा पड़ाव

आरोग्य सीखने के वर्ष

चिकित्सा के अध्ययन ने मुझे सबसे पहले यह सिखाया कि जानने तथा समझने में बहुत अन्तर होता है।

एम.बी.बी.एस.

एल एल आर एम मेडिकल कॉलेज, मेरठ, १९९३

डिस्टिंक्शन, सर्टिफिकेट ऑफ ऑनर्स तथा नौ स्वर्ण पदकों सहित विश्वविद्यालय में द्वितीय स्थान
यहाँ शरीर को जाना।

एम.डी. मेडिसिन

एल एल आर एम मेडिकल कॉलेज, मेरठ, १९९७

स्वर्ण पदक सहित
यहाँ रोग को जाना।

डी.एम. न्यूरोलॉजी

किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ, २०००

यहाँ मस्तिष्क को जाना, और उसी के साथ अपनी सीमा को भी।

डी.एच.ए.

हेल्थ केयर मैनेजमेंट, दूरस्थ शिक्षा, २००८

स्वास्थ्य प्रशासन के इस अध्ययन ने आगे चलकर संस्थान खड़ा करने में सहायता की।

इन उपाधियों के विषय में एक निवेदन

इन शैक्षणिक उपाधियों को मैं अपनी योग्यता का प्रमाण नहीं मानता। ये मेरे उन सभी गुरुजनों का प्रसाद हैं जिन्होंने मुझे गढ़ा।

विशेष रूप से मेरे परम पूज्य शिक्षा गुरुदेव डॉ. एस एस एल श्रीवास्तव जी तथा परम आदरणीय डॉ. आलोक मोहन कार जी। इन्होंने मुझे केवल धैर्य से पढ़ाया ही नहीं, अपितु चिकित्सा शास्त्र का विज्ञान और उसकी कला, दोनों हाथ पकड़कर सिखाए।

और ये उन रोगियों के भी हैं जिन्होंने अपना शरीर तथा अपना विश्वास एक विद्यार्थी के हाथों में सौंपने का साहस किया। वह साहस किसी पदक से बड़ा है।

इन वर्षों की एक सीख

पुस्तकें उत्तर देती हैं, रोगी प्रश्न देते हैं। और चिकित्सा में प्रश्न सदा उत्तरों से बड़े होते हैं।

तीसरा पड़ाव

चिकित्सक का जीवन

कार्ययात्रा तथा प्रमुख पड़ाव

२००१ से २०१२

टैगोर विला, देहरादून में निजी चिकित्सा क्लिनिक।

२०१२

एक सौ पचास शय्याओं वाले मल्टी सुपर स्पेशलिटी सिनर्जी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, देहरादून की स्थापना।

२०१४

इस संस्थान को चिकित्सा सेवाओं के क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए उत्तराखण्ड एवं निकटवर्ती क्षेत्रों का प्रथम NABH तथा NABL प्रमाणित संस्थान होने का गौरव प्राप्त हुआ।

२०२०

केयर मल्टी सुपर स्पेशलिटी रिहैबिलिटेशन एवं वेलनेस सेंटर, देहरादून की स्थापना।

२०१२ से आज तक

सिनर्जी अस्पताल, देहरादून में न्यूरोलॉजी विभाग का विभागाध्यक्ष, तथा सिनर्जी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी का दायित्व।

चिकित्सा से मिली चार सीख

एक

रोग का नाम जान लेना आधा कार्य है। रोगी का भय समझ लेना शेष आधा है।

दो

चिकित्सक का सबसे प्रभावशाली उपकरण उसकी वाणी है, और सबसे उपेक्षित उपकरण भी वही है।

तीन

हर बार विजय नहीं मिली। जिन्हें मैं नहीं बचा सका, उन्होंने मुझे किसी भी सफलता से अधिक सिखाया।

चार

स्नायु विज्ञान मस्तिष्क तक पहुँचता है, किन्तु मनुष्य मस्तिष्क पर समाप्त नहीं होता। यही अनुभव मुझे आगे की खोज की ओर ले गया।

"मैं यहाँ किसी रोगी का नाम अथवा प्रकरण नहीं लिखूँगा। यह मर्यादा भी है और उनका अधिकार भी। परन्तु इतना कह सकता हूँ कि जिन क्षणों ने मुझे सबसे अधिक बदला, वे वे क्षण नहीं थे जब मैंने किसी को बचा लिया। वे वे क्षण थे जब मैं कुछ नहीं कर सका, और फिर भी किसी परिवार ने मेरा हाथ पकड़कर धन्यवाद कहा।"

स्मरणीय अनुभव

चौथा पड़ाव

एक स्वप्न का निर्माण

यह क्यों बना

भीतर एक बेचैनी थी कि केवल अपने अभ्यास तक सीमित रहकर जितना कर सकता हूँ, उससे कुछ अधिक करना है। देहरादून तथा आसपास के पर्वतीय अंचलों से आने वाले रोगियों को देखता था, जिनका समय, धन तथा शक्ति उपचार तक पहुँचने में ही व्यय हो जाते थे।

हमारा स्वप्न था कि हमारे उत्तराखण्ड में एक ऐसा अस्पताल हो जहाँ की चिकित्सा सेवाएँ हमारे क्षेत्र के रोगियों की आवश्यकताओं, अपेक्षाओं, सुविधाओं तथा सुरक्षा पर केन्द्रित हों। जो गुणवत्ता के स्तर पर विश्वस्तरीय मानकों का पूरी तरह पालन करता हो और सभी की पहुँच में हो। जहाँ एक ही छत के नीचे सभी प्रकार की बीमारियों के लिए आधुनिकतम चिकित्सा उपलब्ध हो, और जो उपचार के साथ साथ एक स्वस्थ समाज के निर्माण में योगदान के लिए संकल्पबद्ध हो। सन् २०१२ में यही स्वप्न सिनर्जी बना। यह किसी व्यापारिक गणना से नहीं, इसी अभाव को देखकर आरम्भ हुआ।

सबसे बड़ी कठिनाई भवन अथवा उपकरण नहीं थी। सबसे बड़ी कठिनाई योग्य चिकित्सकों को जोड़ना थी। एक नए संस्थान के पास दिखाने के लिए इतिहास नहीं होता, केवल वचन होता है। किसी योग्य व्यक्ति से यह कहना कि आप अपना स्थापित भविष्य छोड़कर एक अनिश्चित आरम्भ में सम्मिलित हो जाइए, सरल नहीं होता। यह बाधा किसी युक्ति से नहीं टूटी। वह केवल समय, पारदर्शिता तथा व्यवहार से टूटी।

सिनर्जी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की स्थापना सन् २०१२ में हुई, और स्थापना के लगभग अठारह माह के भीतर ही संस्थान को एन.ए.बी.एच. तथा एन.ए.बी.एल. प्रमाणन प्राप्त हो गया। इसी के साथ संस्थान को यह गौरव प्राप्त हुआ कि वह चिकित्सा सेवाओं के क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए उत्तराखण्ड एवं निकटवर्ती क्षेत्रों का प्रथम एन.ए.बी.एच. तथा एन.ए.बी.एल. प्रमाणित संस्थान बना।

फिर भी मैं इसे गति का प्रमाण नहीं मानता। मैं इसे अनुशासन का प्रमाण मानता हूँ। गुणवत्ता प्रमाणन का वास्तविक अर्थ प्रमाणपत्र नहीं है। उसका अर्थ यह है कि रोगी की सुरक्षा किसी व्यक्ति की इच्छा पर नहीं, व्यवस्था पर टिकी है। व्यक्ति थक सकता है, व्यवस्था नहीं थकती।

इस निर्माण में मेरी धर्मपत्नी डॉ. सीमा अवतार तथा उनके छोटे भाई श्री कमल कान्त गर्ग का योगदान सहयोग शब्द से बहुत आगे की वस्तु है। संस्थान का व्यवस्था पक्ष आज जो सुदृढ़ है, वह इन दोनों के परिश्रम का फल है। डॉ. सीमा अवतार सिनर्जी हॉस्पिटल में चीफ़ मैनेजिंग डायरेक्टर तथा श्री कमल कान्त गर्ग मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में यह दायित्व निभा रहे हैं। जो कार्य दिखाई देता है, वह मेरा है। जो कार्य दिखाई नहीं देता और जिसके बिना कुछ भी सम्भव नहीं था, वह इनका है।

और उन सबके प्रति, जिनका नाम इस पृष्ठ पर नहीं आ सकता

सिनर्जी मेरा कार्य नहीं है। वह अनेक हाथों का कार्य है। अपने प्रत्येक सहयोगी चिकित्सक के प्रति मैं नतमस्तक हूँ, जिन्होंने एक अनिश्चित आरम्भ पर विश्वास किया और अपनी योग्यता इस भूमि को दी। अपनी नर्सिंग टीम, तकनीशियनों, प्रयोगशाला, फ़ार्मेसी, स्वागत, सुरक्षा, भोजन तथा स्वच्छता के प्रत्येक कर्मचारी के प्रति मैं कृतज्ञ हूँ। रोगी जिस स्पर्श को सबसे अधिक स्मरण रखता है, वह प्रायः चिकित्सक का नहीं, इन्हीं का होता है। जो श्रेय मुझे मिलता है, वह वस्तुतः इन सबका है। मैं केवल उस स्थान पर खड़ा हूँ जहाँ से वह श्रेय दिखाई देता है।

सिनर्जी अस्पताल, देहरादून ने विगत चौदह वर्षों में उत्तराखण्ड तथा निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों में आधुनिक, विश्वसनीय एवं बहुविशेषज्ञतापूर्ण चिकित्सा सेवाओं को सुलभ बनाने की दिशा में योगदान दिया है। गुणवत्ता, करुणा, नैतिकता तथा रोगी सुरक्षा के प्रति सतत प्रतिबद्धता के माध्यम से सिनर्जी ने क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के साथ जनमानस में यह विश्वास भी स्थापित किया है कि उच्चस्तरीय चिकित्सा सेवा अपने ही प्रदेश में संवेदनशीलता और सम्मान के साथ प्राप्त की जा सकती है। यह उपलब्धि किसी एक व्यक्ति अथवा किसी एक संस्था की नहीं है। यह समर्पित चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों तथा प्रदेशवासियों के विश्वास और सहयोग से बनी एक सामूहिक सेवा यात्रा है।

हम यह भली भाँति जानते हैं कि इस कार्य में हम केवल माध्यम मात्र रहे हैं। वास्तव में यह अस्पताल भगवान की कृपा तथा आप सबके आशीर्वाद, शुभकामनाओं, स्नेह और सहयोग का परिणाम है। हम विनम्रता पूर्वक अपने इस प्रयास को अपने क्षेत्र की जनता को समर्पित करते हैं।

पाँचवाँ पड़ाव

चिकित्सा से आगे

अध्यात्म जीवन में कैसे आया

यह किसी एक दिन की घटना नहीं थी। बीज तो बहुत पहले पड़ चुका था, मेरी माता जी के उस आग्रह में कि भगवान का आश्रय मत छोड़ना। बचपन में माता जी की प्रेरणा तथा अनेक सन्तों की करुणामयी कृपा के फलस्वरूप मुझे भारतीय एवं पाश्चात्य धर्म और दर्शन से जुड़े ग्रन्थों के अनुशीलन का अवसर मिला। इसमें मेरे स्वाध्याय से कहीं अधिक सन्तों, विचारकों तथा विद्वानों की कृपा ही हेतु रही है।

सन् १९८७ में जब परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज की शरण में आया, तो जैसे जीवन ही बदल गया। उनकी शिक्षाओं के लिए इस वेबसाइट पर एक पूर्ण पृष्ठ समर्पित है। फिर रोगियों के बीच वर्ष बीतते गए और भीतर एक प्रश्न बैठता गया, कि जिस पीड़ा का कोई औषधीय उत्तर नहीं है, उसका उत्तर कहाँ है।

सन्तों की कृपा

उत्तर की दिशा मुझे सन्तों की कृपा से मिली। परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज मेरे जीवन के सार सर्वस्व ही हैं। धर्म की दृष्टि से मैं रामानन्दी विशिष्टाद्वैत परम्परा का एक साधारण अनुयायी हूँ। परम पूज्य प्रातः स्मरणीय तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी श्री रामभद्राचार्य जी महाराज के श्रीचरणों में दीक्षा प्राप्त होना मेरे जीवन की एक विशिष्ट निधि है।

परम पूज्य जगद्गुरु द्वाराचार्य श्री अग्र एवं मलूक पीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेन्द्र दास जी महाराज के प्रति मेरा हृदय सदा नत है। उनकी वाणी ने मुझे वह दृष्टि दी, जो किसी पाठ्यक्रम से नहीं मिल सकती थी। इनके अतिरिक्त भी अन्य सभी सन्तों, गुरुजनों एवं विद्वानों ने मुझ जैसे सर्वथा अयोग्य पात्र पर सदा ही कृपा की है। जो कुछ इस दिशा में मिला, वह मेरी साधना का फल नहीं है। वह इन विभूतियों की कृपा का प्रसाद है।
आरोग्य की मेरी समझ

चिकित्सा शरीर की मरम्मत करती है। स्वस्थ होना उससे बड़ी बात है। मैंने ऐसे लोग देखे हैं जिनकी सारी रिपोर्ट सामान्य थीं और जो भीतर से टूटे हुए थे। और ऐसे भी देखे जिनका रोग असाध्य था और जिनके भीतर एक विलक्षण शान्ति थी। यह अन्तर किसी औषधि से नहीं आता। यह अन्तर दृष्टि से आता है।

मन, शरीर तथा आत्मा

आधुनिक स्नायु विज्ञान बताता है कि करुणा, कृतज्ञता, ध्यान तथा स्थिरता का प्रभाव मस्तिष्क पर मापा जा सकता है। मैं इसे प्रमाण नहीं कहता। मैं इसे अनुनाद कहता हूँ। शास्त्र जो सहस्रों वर्ष पूर्व कह गए, विज्ञान अब उसी दिशा में सिर हिलाता हुआ प्रतीत होता है। इतना कहना पर्याप्त है। इससे अधिक दावा करना दोनों का अपमान होगा।

“मैं न सिद्ध हूँ, न उपदेशक। मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो चिकित्सक बनने के बाद भी भीतर से रोगी ही रहा। इस मार्ग पर चलते हुए मुझे एक विश्वास हुआ है, और वही मेरी सम्पूर्ण पूँजी है। कि दुःख से आनन्द तक का मार्ग वास्तव में खुला है, और वह मार्ग शरणागति से आरम्भ होता है।”

डॉ. कृष्ण अवतार

छठा पड़ाव

यात्रा चलती रहेगी

एक व्यक्तिगत निवेदन

आप यहाँ तक आए, यह आपकी उदारता है। मैं जानता हूँ कि इस पृष्ठ तक कोई अकारण नहीं आता। कहीं कोई प्रश्न होता है, कोई पीड़ा होती है, अथवा कोई ऐसी बात होती है जो अब तक किसी से कही नहीं जा सकी। यदि आप उसी स्थिति में हैं, तो यह वेबसाइट आपके लिए ही बनी है।

मैं कोई मत स्थापित नहीं करना चाहता, न कोई अनुयायी बनाना चाहता हूँ। मेरी एक ही इच्छा है कि जो व्यक्ति दुःख में अकेला खड़ा है, उसे इतना विश्वास मिल जाए कि मार्ग बन्द नहीं है। इससे आगे मुझे कुछ नहीं चाहिए।

आशा यह है कि आप इस पृष्ठ को छोड़ने के बाद मुझे भूल जाएँ और वह पंक्ति स्मरण रखें जो आपके काम आई। लेखक का मिट जाना और उसकी लेखनी का याद रह जाना ही उसकी सच्ची सफलता है।

इस पृष्ठ पर मेरा नाम है, किन्तु यह यात्रा अकेले की नहीं है। मेरी धर्मपत्नी डॉ. सीमा अवतार ने इस जीवन में वह भूमिका निभाई है जिसे शब्दों में तौला नहीं जा सकता। संस्थान की व्यवस्था हो, घर का अनुशासन हो, अथवा वे वर्ष जब मैं देर रात तक रोगियों के बीच रहा और फिर लेखन में डूबा रहा, प्रत्येक स्थिति में उन्होंने धैर्य से सब सँभाला। जिस स्थिरता के सहारे मैं यह सब कर सका, वह स्थिरता उन्हीं की दी हुई है। मैं उनका कृतज्ञ हूँ, और यह कृतज्ञता किसी शिष्टाचार से नहीं, अनुभव से निकली है।

मेरी पुत्री डॉ. ऋषिता गर्ग स्वयं चिकित्सा के क्षेत्र में हैं और न्यूरोलॉजी के उच्च अध्ययन में संलग्न हैं। किसी पिता के लिए इससे बड़ा सन्तोष क्या होगा कि उसकी सन्तान ने वही मार्ग चुना, जिसे उसने सेवा का मार्ग माना। उसकी उपस्थिति मेरे लिए आशीर्वाद है। और उन सभी स्वजनों, मित्रों तथा शुभचिन्तकों के प्रति भी मैं नतमस्तक हूँ, जिन्होंने बिना किसी अपेक्षा के इस यात्रा में मेरा साथ दिया।

हम सब एक ही मार्ग पर हैं। कोई आगे नहीं, कोई पीछे नहीं। मैंने भी अपनी यात्रा अपने सबसे बड़े दुःख से आरम्भ की थी। यदि उस दुःख के बाद भी यह मार्ग मेरे लिए खुल सका, तो आपके लिए क्यों नहीं खुलेगा।

यदि यह विचार आपको उपयोगी लगे, तो अपने अनुभव मुझे लिखिए। जो पत्र आते हैं, वे मेरे लिए किसी सम्मान से बड़े हैं। और यदि आप इस समय बहुत कठिन घड़ी से गुजर रहे हैं, तो कृपया अकेले मत रहिए। किसी अपने से कहिए, अथवा संकट सहायता निर्देशिका देखिए। वहाँ उपदेश नहीं है, केवल कुछ मार्ग हैं।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः