एक न्यूरोलॉजिस्ट की कलम से
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"एक न्यूरोलॉजिस्ट की कलम से, सरल हिन्दी में, मस्तिष्क एवं सम्पूर्ण स्वास्थ्य पर विश्वसनीय जानकारी। यह अनुभाग सामान्य शिक्षा के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। कृपया अपनी स्थिति के लिए अपने चिकित्सक से ही परामर्श लें। आपात स्थिति में तुरन्त निकटतम चिकित्सा केन्द्र जाएँ।"
श्रेणी एक
न्यूरोलॉजी
मस्तिष्क और स्नायुतन्त्र के पाँच रोग, सरल भाषा में
पाँच लेख
१ · जब मस्तिष्क की एक नस चुप हो जाती है
मस्तिष्काघात, अर्थात् लकवा, और वे कुछ घंटे जो सब कुछ तय करते हैं
२ · दौरा कलंक नहीं, मस्तिष्क की एक बिजली है
मिर्गी, उसका सच और उसके साथ जुड़ा अनावश्यक अपमान
३ · हर सिरदर्द साधारण नहीं, हर सिरदर्द ट्यूमर भी नहीं
सिरदर्द, माइग्रेन, और खतरे की सच्ची घंटियाँ
४ · पिताजी भूलते नहीं हैं, बीमार हैं
भूलने की बीमारी, और परिजनों के नाम एक लम्बा पत्र
५ · काँपते हाथ, थमते कदम
पार्किंसन रोग, जिसे प्रायः केवल बुढ़ापा समझ लिया जाता है
डॉ. कृष्ण अवतारन्यूरोलॉजिस्ट, लेखक, साधक
चिकित्सा कक्ष में बैठे हुए वर्षों बीत गए। इस बीच एक बात बार बार सामने आई कि जितनी हानि रोग से होती है, उससे कहीं अधिक हानि रोग के विषय में फैली भ्रान्ति से होती है। कोई परिवार इसलिए देर से पहुँचता है कि उसे पता ही नहीं था कि प्रतीक्षा घातक है। कोई रोगी इसलिए दवा छोड़ देता है कि उसे किसी ने कह दिया कि यह दवा जीवन भर नहीं लेनी चाहिए। यहाँ प्रस्तुत पाँच लेख उसी अन्तर को पाटने का एक विनम्र प्रयास हैं।
लेख एक
जब मस्तिष्क की एक नस चुप हो जाती है
मस्तिष्काघात, अर्थात् लकवा
सुबह के साढ़े छह बजे थे। चाय का प्याला हाथ में था और समाचार पत्र गोद में। अचानक प्याला छूट गया। घर वालों ने सोचा, नींद पूरी नहीं हुई होगी, हाथ सुन्न हो गया होगा। बात करने पर लगा कि जीभ थोड़ी लड़खड़ा रही है। किसी ने कहा, थोड़ी देर लेट जाइए, ठीक हो जाएगा। किसी ने सरसों का तेल गरम किया। जब तीन घंटे बाद परिवार अस्पताल पहुँचा, तब तक जो समय सबसे मूल्यवान था, वह बीत चुका था।
मस्तिष्क को प्रति क्षण रक्त क्यों चाहिए
शरीर के प्रत्येक अंग को रक्त चाहिए, किन्तु मस्तिष्क की माँग सबसे कठोर है। यह अंग अपने लिए कोई संचय नहीं रखता। जिस क्षण किसी नस से रक्त का प्रवाह रुकता है, उसी क्षण से उस क्षेत्र की कोशिकाएँ मरने लगती हैं। यही कारण है कि मस्तिष्काघात में समय ही औषधि है। जो एक घंटे में सुधर सकता था, वह चार घंटे बाद स्थायी अपंगता बन जाता है।
दो प्रकार, दो भिन्न कहानियाँ
पहला प्रकार वह है जिसमें मस्तिष्क की कोई नस थक्के से बन्द हो जाती है। अधिकांश रोगी इसी श्रेणी में आते हैं। दूसरा प्रकार वह है जिसमें कोई नस फट जाती है और रक्त मस्तिष्क में फैल जाता है। दोनों के लक्षण बाहर से लगभग एक जैसे दिखते हैं, किन्तु उपचार बिल्कुल विपरीत है। इसीलिए घर पर अनुमान लगाना व्यर्थ है। यह भेद केवल सी टी स्कैन या एम आर आई से ही होता है, और वह भी कुछ ही मिनटों में हो जाता है।
पहचान के चार चिह्न
इन्हें याद रखने के लिए चार शब्द पर्याप्त हैं: चेहरा, बाँह, बोली, और बिना देर।
इनके अतिरिक्त अचानक एक आँख या दोनों आँखों से दिखाई न देना, अचानक तेज चक्कर के साथ चलने में लड़खड़ाहट, तथा जीवन का सबसे भीषण अचानक सिरदर्द भी मस्तिष्काघात के चिह्न हो सकते हैं।
वह सुनहरा समय जिसे लोग गँवा देते हैं
यदि रोगी लक्षण आरम्भ होने के साढ़े चार घंटे के भीतर उपयुक्त अस्पताल पहुँच जाए, और जाँच में नस का बन्द होना सिद्ध हो, तो ऐसी दवा दी जा सकती है जो थक्के को घोल देती है। कुछ चुने हुए रोगियों में, विशेष जाँच के आधार पर, इससे भी अधिक समय बीत जाने पर नस के भीतर से थक्का यन्त्र द्वारा निकाला जा सकता है। ये दोनों उपचार चमत्कार जैसे परिणाम दे सकते हैं, किन्तु इनका द्वार समय के साथ बन्द होता चला जाता है।
यहाँ एक बात विशेष रूप से स्मरण रखिए। लक्षण आरम्भ होने का समय वह है जब रोगी अन्तिम बार पूर्णतः सामान्य देखा गया था। यदि रोगी सुबह इस अवस्था में मिला हो, तो चिकित्सक को यह बताना आवश्यक है कि वह रात में कब तक ठीक था।
जो कदापि नहीं करना है
क्षणिक लक्षण, स्थायी चेतावनी
कभी कभी लक्षण कुछ मिनटों में स्वयं ठीक हो जाते हैं। हाथ सुन्न हुआ और ठीक हो गया, बोली लड़खड़ाई और सम्भल गई। परिवार निश्चिन्त हो जाता है। वस्तुतः यह सबसे बड़ी चेतावनी है। ऐसे रोगियों में आने वाले दिनों में पूर्ण मस्तिष्काघात की सम्भावना सर्वाधिक होती है, और यही वह क्षण है जब उसे पूरी तरह रोका जा सकता है। क्षणिक लक्षण को कभी हल्के में मत लीजिए।
रोकथाम, जो वास्तव में सम्भव है
मस्तिष्काघात अकस्मात् घटता अवश्य है, किन्तु उसकी तैयारी वर्षों चलती है। उच्च रक्तचाप इसका सबसे बड़ा कारण है, और सबसे उपेक्षित भी, क्योंकि वह प्रायः कोई लक्षण नहीं देता। मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान, तम्बाकू, अत्यधिक मद्यपान, मोटापा, निष्क्रिय जीवन तथा हृदय की अनियमित धड़कन, ये सब मिलकर उस दिन की भूमिका बनाते हैं। इनमें से लगभग प्रत्येक हमारे वश में है।
चालीस वर्ष के बाद रक्तचाप की नियमित जाँच, दवा की निरन्तरता, तथा हृदय की धड़कन में अनियमितता का पता चलते ही चिकित्सक से परामर्श, इतना भी कर लिया जाए तो बहुत बड़ी संख्या में लकवे टाले जा सकते हैं।
लकवे के बाद का जीवन
उपचार के बाद असली यात्रा आरम्भ होती है। मस्तिष्क में यह क्षमता होती है कि वह नई राहें बनाए, और यही पुनर्वास का आधार है। भौतिक चिकित्सा, वाणी की चिकित्सा तथा दैनिक कार्यों का अभ्यास, ये तीनों जितनी शीघ्र आरम्भ हों उतना अच्छा। सुधार की गति सबसे तेज आरम्भ के कुछ महीनों में होती है, किन्तु धीमा सुधार उसके बाद भी वर्षों चलता रहता है।
परिजनों से एक निवेदन है। रोगी का हाथ जो उठ नहीं रहा, उसे बार बार दिखाकर निराश मत होइए। उसके गले लगने का, बैठने का, स्वयं कौर उठाने का जो छोटा सा सुधार आज हुआ है, उसे देखिए। लकवे के रोगी को जितनी औषधि चाहिए, उतना ही साहस भी चाहिए, और वह साहस उसे केवल आप दे सकते हैं।
यदि इस पूरे लेख से केवल एक वाक्य स्मरण रखना हो, तो वह यह है: लकवे में प्रतीक्षा सबसे महँगी चीज है। संदेह हो तो देर मत कीजिए, अस्पताल चलिए। कुछ न निकला तो भी आपने कुछ नहीं खोया, और यदि कुछ निकला तो आपने किसी का पूरा जीवन बचा लिया।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। यह किसी योग्य चिकित्सक के परीक्षण तथा परामर्श का विकल्प नहीं है।
लेख दो
दौरा कलंक नहीं, मस्तिष्क की एक बिजली है
मिर्गी को समझिए
कक्षा सात की एक बालिका प्रार्थना सभा में अचानक गिर पड़ी। कुछ ही क्षणों में हाथ पैर अकड़े, फिर झटके आए, मुँह से झाग निकला। दो मिनट बाद वह शान्त हो गई और कुछ देर सोई सी रही। अगले दिन जो हुआ, वह उस दौरे से कहीं अधिक पीड़ादायक था। बच्चों ने उसका नाम बदल दिया। कुछ अभिभावकों ने आपत्ति की। विद्यालय ने परिवार को बुलाकर कहा कि जब तक यह पूरी तरह ठीक न हो जाए, तब तक इसे घर पर ही रखिए। जिस रोग की दवा एक छोटी सी गोली थी, उसका मूल्य उस बच्ची ने अपनी शिक्षा से चुकाया।
दौरा वास्तव में है क्या
मस्तिष्क की कोशिकाएँ आपस में अत्यन्त सूक्ष्म विद्युत संकेतों से बात करती हैं। यही विद्युत हमारी सोच, गति, वाणी और स्मृति का आधार है। कभी कभी किसी कारण से यह व्यवस्थित संवाद अचानक अव्यवस्थित हो जाता है और बहुत सी कोशिकाएँ एक साथ बेतरतीब ढंग से चल पड़ती हैं। इसी क्षणिक विद्युत तूफान का नाम दौरा है।
यह न कोई भूत प्रेत का प्रभाव है, न किसी पूर्वजन्म का दण्ड, न कोई छूत का रोग। किसी के दौरे को छूने से, उसके साथ भोजन करने से, अथवा उसके साथ रहने से किसी को यह रोग नहीं होता। यह मस्तिष्क का एक शारीरिक रोग है, ठीक वैसे ही जैसे हृदय की धड़कन का अनियमित हो जाना।
हर दौरा गिरने और झटके वाला नहीं होता
लोगों के मन में दौरे का एक ही चित्र है, गिरना और झटके आना। किन्तु मिर्गी के कई रूप हैं। बच्चों में कभी कभी दौरा केवल इतना होता है कि वे कुछ सेकंड के लिए शून्य में देखते रह जाते हैं, बात करते करते रुक जाते हैं, और फिर वहीं से आगे चल पड़ते हैं। ऐसे बच्चों को प्रायः असावधान या ध्यान न देने वाला कह दिया जाता है। कभी दौरा केवल एक हाथ के फड़कने तक सीमित रहता है, कभी अजीब सी गन्ध या भय का अनुभव होता है, कभी रोगी कुछ क्षण के लिए अनजान सा व्यवहार करने लगता है, होंठ चबाता है, कपड़े खींचता है, और बाद में उसे कुछ स्मरण नहीं रहता।
दौरे के समय क्या करना है
जो कदापि नहीं करना है
अस्पताल तुरन्त कब ले जाना है
दवा के विषय में वह बात जो सबसे अधिक भूल की जाती है
मिर्गी की दवाएँ आज बहुत प्रभावी हैं। बड़ी संख्या में रोगी नियमित दवा से पूर्णतः दौरा रहित जीवन जीते हैं। किन्तु यहीं सबसे बड़ी भूल होती है। छह महीने या एक वर्ष तक दौरा न आने पर परिवार सोचता है कि अब रोग समाप्त हो गया, और दवा अपने आप बन्द कर दी जाती है। बहुधा इसके बाद दौरा लौटता है, और कभी कभी पहले से अधिक तीव्र रूप में।
दवा कब घटानी है और कब बन्द करनी है, यह निर्णय केवल चिकित्सक का है, और वह भी धीरे धीरे, महीनों में। दवा का समय पर न लेना, नींद पूरी न करना, तथा अत्यधिक मद्यपान, ये तीन कारण दौरे लौटाने में सबसे आगे हैं।
वह पीड़ा जिसकी चर्चा कोई नहीं करता
मिर्गी के रोगी को जितना कष्ट रोग से होता है, उससे अधिक समाज से होता है। विवाह के समय सत्य छिपाया जाता है, नौकरी के आवेदन में उल्लेख नहीं किया जाता, और उपचार गुप्त रूप से चलता है। इस छिपाव का सबसे बड़ा नुकसान रोगी को ही होता है, क्योंकि आपात स्थिति में उसके साथ के लोग जानते ही नहीं कि करना क्या है।
कुछ बातें स्पष्ट रूप से समझ लीजिए। मिर्गी की रोगिणी माँ बन सकती है, बस गर्भधारण से पहले चिकित्सक से परामर्श करके दवा का चयन करना आवश्यक है, क्योंकि कुछ दवाएँ गर्भस्थ शिशु के लिए उपयुक्त नहीं होतीं। दवा से नियन्त्रित रोगी लगभग हर व्यवसाय कर सकता है। वाहन चलाने के विषय में नियम है कि एक निश्चित अवधि तक पूर्णतः दौरा रहित रहने के बाद ही चिकित्सक की सम्मति से यह किया जाए। बच्चों को विद्यालय से रोकना तो पूर्णतः अनुचित है, केवल इतना करना चाहिए कि शिक्षक को सूचना हो और उसे प्राथमिक उपचार का ज्ञान हो।
जिन महापुरुषों ने संसार को दिशा दी, उनमें से कई इस रोग के साथ जिए। दौरा किसी की योग्यता, बुद्धि या चरित्र पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाता। वह केवल इतना कहता है कि मस्तिष्क को कुछ समय के लिए सहायता चाहिए। वह सहायता उपलब्ध है, सुलभ है, और अत्यन्त प्रभावी है। कलंक रोग में नहीं, हमारी दृष्टि में है।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। यह किसी योग्य चिकित्सक के परीक्षण तथा परामर्श का विकल्प नहीं है।
लेख तीन
हर सिरदर्द साधारण नहीं, हर सिरदर्द ट्यूमर भी नहीं
सिरदर्द तथा माइग्रेन
एक सज्जन अपनी पत्नी के साथ आए। बातचीत के बीच उन्होंने पत्नी की ओर संकेत किया और कहा, इनके तो सिरदर्द की गोलियाँ घर के हर कमरे में रखी रहती हैं। पर्स में, रसोई की दराज में, गाड़ी में। बारह वर्ष से यही चल रहा है। किसी ने आज तक यह नहीं पूछा कि यह सिरदर्द है किस प्रकार का। और दूसरी ओर उसी सप्ताह एक युवक आया जिसे तीन दिन से सिरदर्द था और वह पहले ही दिन एम आर आई करा चुका था, इस भय से कि कहीं मस्तिष्क में गाँठ न हो।
दो विपरीत भूलें
सिरदर्द के विषय में समाज दो अतियों पर खड़ा है। एक ओर वर्षों की उपेक्षा और दर्दनिवारक गोलियों का अन्धाधुन्ध सेवन, दूसरी ओर हर सिरदर्द में गाँठ का भय और अनावश्यक जाँचों की दौड़। सत्य यह है कि सिरदर्द के अधिकांश रोगियों में कोई गम्भीर रोग नहीं होता, किन्तु एक छोटी संख्या ऐसी अवश्य होती है जहाँ सिरदर्द किसी गम्भीर बात का प्रथम संकेत होता है। इन दोनों को अलग करना ही चिकित्सक का काम है, और उसका आधार महँगी मशीन नहीं, बल्कि रोगी से पूछी गई कुछ ठीक बातें हैं।
सबसे सामान्य प्रकार
तनावजन्य सिरदर्द: यह सबसे आम है। सिर के चारों ओर कसाव जैसा, मानो कोई पट्टी बाँध दी गई हो। प्रायः दिन चढ़ने के साथ बढ़ता है, गर्दन और कन्धों की जकड़न के साथ आता है, और दैनिक कार्यों को पूरी तरह रोकता नहीं।
माइग्रेन: यह प्रायः सिर के एक ओर होता है, धड़कता हुआ सा, और इतना तीव्र कि रोगी अँधेरे कमरे में लेटना चाहता है। प्रकाश और ध्वनि असह्य हो जाते हैं, उल्टी या जी मिचलाना साथ आता है, और चलने या सीढ़ी चढ़ने से दर्द बढ़ता है। कुछ रोगियों को दर्द से पहले चमकती हुई टेढ़ी मेढ़ी रेखाएँ दिखती हैं या दृष्टि का कुछ भाग धुँधला हो जाता है, इसे पूर्वाभास कहते हैं।
गर्दन से उपजा सिरदर्द: गर्दन की हड्डियों तथा मांसपेशियों से आरम्भ होकर सिर के पिछले भाग तक फैलने वाला दर्द। लम्बे समय तक झुककर काम करने वालों में यह बढ़ता जा रहा है।
साइनस का भ्रम: यह वह नाम है जो सबसे अधिक और सबसे गलत ढंग से प्रयोग होता है। माथे या चेहरे में दर्द होते ही उसे साइनस मान लिया जाता है और वर्षों एन्टीबायोटिक चलती रहती है। वास्तविक साइनस के रोग में नाक का बन्द होना, गाढ़ा स्राव, गन्ध का लोप तथा प्रायः बुखार भी रहता है। इनके बिना केवल माथे का दर्द बहुधा माइग्रेन ही निकलता है।
खतरे की सच्ची घंटियाँ, इनमें प्रतीक्षा नहीं
वह दवा जो स्वयं रोग बन जाती है
यह उस लेख का सबसे महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद है। जब कोई व्यक्ति सप्ताह में कई बार, महीनों तक दर्दनिवारक गोलियाँ लेता रहता है, तो एक विचित्र स्थिति बनती है। मस्तिष्क उस दवा का अभ्यस्त हो जाता है और गोली का असर उतरते ही फिर दर्द उठा देता है। रोगी फिर गोली लेता है, और इस प्रकार दर्द तथा दवा का चक्र बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का सिरदर्द अब उसके मूल रोग से नहीं, बल्कि दवा से चल रहा होता है।
इससे बाहर निकलने का एक ही मार्ग है, चिकित्सक की देखरेख में उन दवाओं को क्रमशः छोड़ना और साथ ही रोकथाम की चिकित्सा आरम्भ करना। यह कुछ सप्ताह कठिन होता है, किन्तु इसके बाद बहुत से रोगी वर्षों बाद पहली बार बिना गोली के जीना सीखते हैं।
जाँच कब आवश्यक है
यदि सिरदर्द का स्वरूप स्पष्ट है, वर्षों से एक जैसा चल रहा है, स्नायविक परीक्षण सामान्य है, और ऊपर लिखी कोई चेतावनी नहीं है, तो एम आर आई से प्रायः कुछ नया नहीं मिलता। इसके विपरीत, चेतावनी के चिह्नों में से कोई एक भी उपस्थित हो, तो जाँच में विलम्ब नहीं करना चाहिए। यह निर्णय रोगी के भय या मशीन की उपलब्धता से नहीं, बल्कि परीक्षण से होना चाहिए।
जो आप स्वयं कर सकते हैं
माइग्रेन के रोगी के लिए एक छोटी सी डायरी सबसे बड़ी औषधि है। किस दिन दर्द हुआ, उससे पहले क्या खाया, कितनी नींद ली, मासिक धर्म का कौन सा दिन था, कितना तनाव था, यह लिखते रहने से कुछ ही महीनों में अपना स्वयं का ढाँचा दिखने लगता है।
दो प्रकार की दवाएँ, दो भिन्न उद्देश्य
एक वे जो दर्द उठने पर ली जाती हैं, और दूसरी वे जो प्रतिदिन इसलिए ली जाती हैं कि दर्द उठे ही नहीं। जिन रोगियों को महीने में बार बार दर्द होता है, उनके लिए दूसरी श्रेणी ही वास्तविक उपचार है। ये दवाएँ कुछ सप्ताह में प्रभाव दिखाती हैं, इसलिए धैर्य आवश्यक है। दो चार दिन लेकर छोड़ देने से इनका मूल्यांकन नहीं हो पाता।
सिरदर्द को न तो जीवन का स्थायी साथी मान लीजिए, न उसमें अकारण भयभीत होइए। उसे केवल इतना समय दीजिए कि कोई उसे ध्यान से सुन सके। बहुधा जिस पीड़ा को व्यक्ति वर्षों से भाग्य समझकर ढो रहा होता है, वह एक ठीक निदान और कुछ महीनों की सही चिकित्सा से समाप्त हो जाती है।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। यह किसी योग्य चिकित्सक के परीक्षण तथा परामर्श का विकल्प नहीं है।
लेख चार
पिताजी भूलते नहीं हैं, बीमार हैं
भूलने की बीमारी, अर्थात् डिमेंशिया
वे अड़तालीस वर्ष तक उसी मुहल्ले में रहे। हर गली, हर मोड़, हर दुकान उनकी जानी हुई थी। उस दिन शाम को वे सब्जी लेने निकले और लौटे नहीं। दो घंटे बाद एक परिचित उन्हें घर छोड़ गया। वे मुख्य सड़क पर खड़े थे, यह समझने का प्रयास करते हुए कि घर किस ओर है। घर में उस रात किसी ने भोजन नहीं किया। किन्तु उससे भी अधिक दुःख की बात यह थी कि पिछले दो वर्षों से परिवार यह सब देख रहा था और हर बार यही कहकर टाल रहा था कि उम्र हो गई है, ऐसा तो होता ही है।
सामान्य भूलना और रोग का भूलना
आयु के साथ स्मरण शक्ति कुछ धीमी होती है, यह स्वाभाविक है। नाम याद आने में क्षण भर लगना, चश्मा रखकर भूल जाना, किसी की जन्मतिथि याद न रहना, ये चिन्ता की बात नहीं। भेद इस बात से होता है कि व्यक्ति का दैनिक जीवन चल रहा है या नहीं।
सामान्य भूलने वाला व्यक्ति चाबी रखकर भूल जाता है, किन्तु ढूँढ़ने पर पा लेता है और यह जानता है कि चाबी किस काम आती है। रोगग्रस्त व्यक्ति चाबी को असंगत स्थान पर, जैसे चावल के डिब्बे में रख देता है, और कुछ समय बाद यह भी भूल जाता है कि उसका उपयोग क्या है। सामान्य व्यक्ति को याद दिलाने पर घटना स्मरण आ जाती है। रोगी को याद दिलाने पर भी वह घटना लौटती नहीं, क्योंकि वह मस्तिष्क में दर्ज ही नहीं हुई।
वे प्रारम्भिक संकेत जिन्हें प्रायः अनदेखा किया जाता है
वे कारण जो उपचार से ठीक हो सकते हैं
यह वह भाग है जिसके कारण चिकित्सक के पास जाना अनिवार्य है। हर भूलने की बीमारी अल्ज़ाइमर नहीं होती। कुछ ऐसे कारण हैं जो पूरी तरह या बहुत हद तक ठीक किए जा सकते हैं, और जिनकी पहचान केवल जाँच से होती है।
निदान क्यों आवश्यक है, यदि रोग पूर्णतः ठीक नहीं होता
यह प्रश्न परिवार बार बार पूछते हैं। उत्तर स्पष्ट है। पहला, उपचार योग्य कारणों को पहचानना। दूसरा, उपलब्ध दवाओं तथा उपायों से रोग की गति धीमी करना और व्यवहार सम्बन्धी कठिनाइयों को सम्भालना, जो परिवार के लिए सबसे थकाने वाली होती हैं। तीसरा, और सबसे उपेक्षित, आगे की तैयारी। जब तक रोगी में निर्णय लेने की क्षमता शेष है, तब तक सम्पत्ति, वसीयत, बैंक तथा उपचार सम्बन्धी उसकी अपनी इच्छाएँ जान लेना और लिखवा लेना, यह उसका अधिकार भी है और परिवार की रक्षा भी।
परिजनों के लिए व्यावहारिक सूत्र
देखभाल करने वाले की थकान
इस रोग में दो व्यक्ति बीमार होते हैं, एक जिसे रोग है और दूसरा जो चौबीस घंटे उसके साथ है। प्रायः वह पत्नी होती है, या बेटी, या पुत्रवधू। वर्षों तक कोई उससे यह नहीं पूछता कि तुम कैसी हो। नींद टूटती है, अपना जीवन रुक जाता है, और सबसे कष्टदायक यह कि जिसकी सेवा की जा रही है, वही कभी कभी अपशब्द कहता है या आरोप लगाता है।
यदि आप उस स्थान पर हैं, तो दो बातें स्मरण रखिए। पहली, जो कटु वचन आपको मिले, वे उस व्यक्ति के नहीं, रोग के हैं। दूसरी, सहायता माँगना कमजोरी नहीं है। परिवार में जिम्मेदारी बाँटिए, सप्ताह में कुछ घंटे अपने लिए निकालिए, अपना स्वास्थ्य मत छोड़िए। जो दीपक स्वयं बुझ जाएगा, वह किसी और को प्रकाश नहीं दे सकेगा।
बचाव, जो आज से आरम्भ हो सकता है
मस्तिष्क को अन्तिम दिन तक स्वस्थ रखने के उपाय असाधारण नहीं हैं। मध्य आयु से ही रक्तचाप, मधुमेह तथा कोलेस्ट्रॉल का नियन्त्रण, धूम्रपान तथा तम्बाकू का पूर्ण त्याग, नियमित शारीरिक श्रम, पर्याप्त और नियमित नींद, सुनने की शक्ति घटने पर श्रवण यन्त्र का प्रयोग, तथा सिर की चोट से बचाव। इन सबके साथ दो बातें और, जो हमारी संस्कृति में सहज उपलब्ध हैं। एक, निरन्तर कुछ नया सीखते और पढ़ते रहना। दूसरा, लोगों के बीच रहना। जो वृद्ध बोलते रहते हैं, मिलते जुलते रहते हैं, सत्संग में जाते हैं, उनका मस्तिष्क अधिक समय तक अपनी दीप्ति बनाए रखता है। एकान्त मस्तिष्क का मित्र नहीं है।
अन्त में एक बात, जो चिकित्सा पुस्तकों में नहीं मिलती। जिस व्यक्ति ने आपको चलना सिखाया, वह धीरे धीरे यह भूल रहा है कि आप कौन हैं। यह अत्यन्त पीड़ादायक है। किन्तु स्मरण रखिए, वे आपका नाम भूल सकते हैं, आपका चेहरा भूल सकते हैं, आपके स्पर्श में जो सुरक्षा है, उसे नहीं भूलते। वह अनुभूति सबसे अन्त तक शेष रहती है। इसीलिए उनके पास बैठिए, हाथ थामिए, और उन्हें सुधारने के स्थान पर केवल साथ दीजिए।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। यह किसी योग्य चिकित्सक के परीक्षण तथा परामर्श का विकल्प नहीं है।
लेख पाँच
काँपते हाथ, थमते कदम
पार्किंसन रोग, अर्थात् कम्पवात
वे चौंसठ वर्ष के थे और तीन वर्ष से घर में एक चुप्पी सी चल रही थी। चाय का प्याला अब वे दोनों हाथों से पकड़ते थे। हस्ताक्षर छोटे होते जा रहे थे, इतने कि बैंक ने दो बार आपत्ति की। चलते समय एक हाथ पहले की तरह हिलता नहीं था। सबसे विचित्र यह कि उनका चेहरा अब कुछ कहता नहीं था, वे प्रसन्न हों या दुःखी, भाव एक जैसा रहता। घर के लोग समझते रहे कि उम्र का असर है, और भीतर ही भीतर यह भी सोचते रहे कि पिताजी अब किसी से मन से बात नहीं करते।
सामान्य भूलना और रोग का भूलना
आयु के साथ स्मरण शक्ति कुछ धीमी होती है, यह स्वाभाविक है। नाम याद आने में क्षण भर लगना, चश्मा रखकर भूल जाना, किसी की जन्मतिथि याद न रहना, ये चिन्ता की बात नहीं। भेद इस बात से होता है कि व्यक्ति का दैनिक जीवन चल रहा है या नहीं।
सामान्य भूलने वाला व्यक्ति चाबी रखकर भूल जाता है, किन्तु ढूँढ़ने पर पा लेता है और यह जानता है कि चाबी किस काम आती है। रोगग्रस्त व्यक्ति चाबी को असंगत स्थान पर, जैसे चावल के डिब्बे में रख देता है, और कुछ समय बाद यह भी भूल जाता है कि उसका उपयोग क्या है। सामान्य व्यक्ति को याद दिलाने पर घटना स्मरण आ जाती है। रोगी को याद दिलाने पर भी वह घटना लौटती नहीं, क्योंकि वह मस्तिष्क में दर्ज ही नहीं हुई।
यह वृद्धावस्था नहीं है
मस्तिष्क के एक अत्यन्त छोटे भाग में कुछ विशेष कोशिकाएँ डोपामीन नामक रसायन बनाती हैं। यह रसायन हमारी गति को सहजता, गति और लय देता है। इसी के कारण हम बिना सोचे चलते हैं, बिना सोचे मुस्कुराते हैं, बिना सोचे चलते समय हाथ हिलाते हैं। पार्किंसन रोग में ये कोशिकाएँ धीरे धीरे क्षीण होती जाती हैं और डोपामीन घटता जाता है। तब गति से उसकी सहजता चली जाती है और शरीर हर काम के लिए प्रयास माँगने लगता है।
यह न मानसिक रोग है, न कमजोरी का परिणाम, न किसी लापरवाही का दण्ड। यह मस्तिष्क का एक निश्चित शारीरिक रोग है जिसकी अपनी चिकित्सा उपलब्ध है।
चार प्रमुख लक्षण
वे संकेत जो वर्षों पहले आ जाते हैं
यह जानकारी बहुत कम लोगों तक पहुँची है। कम्पन आरम्भ होने से कई वर्ष पहले कुछ लक्षण प्रकट हो सकते हैं। गन्ध की अनुभूति का धीरे धीरे समाप्त हो जाना, वर्षों से चली आ रही कब्ज, नींद में तेज स्वर में बोलना, चीखना अथवा हाथ पैर चलाना मानो स्वप्न को अभिनीत कर रहे हों, तथा चेहरे के भावों का कम होते जाना। इनमें से कोई भी अकेले पार्किंसन का प्रमाण नहीं है, किन्तु यदि इनके साथ गति की मन्दता जुड़ने लगे, तो चिकित्सक को दिखाने में विलम्ब नहीं करना चाहिए।
हर कम्पन पार्किंसन नहीं होता
यह भ्रम बहुत कष्ट देता है। कम्पन के कई अन्य कारण हैं। एक अत्यन्त सामान्य प्रकार वह है जो परिवारों में चलता है और जिसमें कम्पन तब दिखता है जब हाथ किसी काम में लगा हो, जैसे पानी का गिलास उठाते समय या लिखते समय, जबकि विश्रान्ति में हाथ शान्त रहता है। इसके अतिरिक्त थायरॉइड का बढ़ जाना, कुछ दवाओं का प्रभाव, विशेषकर उल्टी तथा मानसिक रोगों की कुछ दवाएँ, अत्यधिक चाय कॉफी, चिन्ता, तथा मद्यपान छोड़ने की स्थिति, ये सब कम्पन दे सकते हैं। इनका उपचार पार्किंसन से पूर्णतः भिन्न है, इसलिए ठीक पहचान आवश्यक है।
उपचार से क्या मिलता है
आज उपलब्ध दवाएँ मस्तिष्क में डोपामीन की कमी की पूर्ति करती हैं, और उनका प्रभाव प्रायः बहुत स्पष्ट होता है। जो व्यक्ति कुर्सी से उठ नहीं पाता था, वह पुनः चलने लगता है। यह रोग को समाप्त नहीं करता, किन्तु जीवन की गुणवत्ता को वर्षों तक सुरक्षित रखता है। जिन चुने हुए रोगियों में वर्षों बाद दवाओं का प्रभाव अस्थिर होने लगता है, उनके लिए मस्तिष्क में विद्युत उपकरण लगाने की शल्य चिकित्सा भी एक स्थापित विकल्प है, जिसका निर्णय विशेषज्ञ करता है।
दवा के विषय में एक बात अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस रोग में दवा का समय पर लेना उतना ही आवश्यक है जितनी दवा स्वयं। कुछ मिनटों का विलम्ब भी रोगी की गति पर स्पष्ट दिखता है। घर में, यात्रा में, तथा किसी अन्य रोग के लिए अस्पताल में भर्ती होने पर भी यह समय नहीं टूटना चाहिए। भोजन के साथ दवा का सम्बन्ध भी चिकित्सक से स्पष्ट पूछ लीजिए।
व्यायाम, जो यहाँ औषधि के समान है
पार्किंसन में शरीर स्वाभाविक रूप से सिकुड़ने लगता है, इसलिए खुलकर की गई गति ही उसका उत्तर है। नियमित चलना, हाथ पैर को पूरे विस्तार तक फैलाने वाले व्यायाम, सन्तुलन का अभ्यास, तथा योगासन, इनका महत्त्व किसी भी दवा से कम नहीं है। जिन रोगियों को बोली धीमी होने या निगलने में कठिनाई की शिकायत हो, उनके लिए वाणी चिकित्सा भी उपलब्ध है, और उससे बहुत लाभ होता है।
गिरने से बचाव, घर में जो करना है।
वह पक्ष जिस पर बात नहीं होती
इस रोग में केवल गति नहीं थमती। अवसाद, चिन्ता, नींद का टूटना, थकान, कब्ज तथा कभी कभी स्मृति की कठिनाइयाँ भी इसका भाग हैं। इन्हें चरित्र या स्वभाव मानकर छोड़ मत दीजिए, क्योंकि इनका उपचार उपलब्ध है और प्रायः इन्हीं के ठीक होने से रोगी का जीवन सबसे अधिक बदलता है।
परिजनों से एक विनम्र निवेदन है। रोगी का चेहरा भावहीन दिखता है, बोली धीमी हो जाती है, और वह देर से उत्तर देता है। इससे यह भ्रम होता है कि उसका मन नहीं लगता, या वह रुचि नहीं ले रहा। सत्य इसके विपरीत है। भीतर वही व्यक्ति है, वही भावनाएँ हैं, वही स्नेह है। केवल उसे बाहर आने में समय लगता है। उसे वह समय दीजिए। बीच में वाक्य पूरा मत कीजिए, और जल्दी मत मचाइए।
यह रोग धीरे धीरे आगे बढ़ता है, यह सत्य है। किन्तु इसके साथ अच्छा, सक्रिय, सार्थक और सम्मानित जीवन जीना पूर्णतः सम्भव है, और अनगिनत लोग जी रहे हैं। कम्पन को अपनी पहचान मत बनने दीजिए। शरीर धीमा हो सकता है, व्यक्ति नहीं।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। यह किसी योग्य चिकित्सक के परीक्षण तथा परामर्श का विकल्प नहीं है।
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श्रेणी दो · मनुष्य होने का विज्ञान
विविध
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