स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान
पुरानी बातें बार बार क्यों लौट आती हैं
डॉ. कृष्ण अवतार
रात का कोई शान्त क्षण होता है, और मन अचानक वही पुराना दृश्य चला देता है। वही वाक्य जो किसी ने वर्षों पहले कहा था, वही दिन, वही भूल, वही अपमान। घटना को बीते युग हो गए; भीतर वह कल की तरह ताज़ा है। और मनुष्य स्वयं से पूछता है, मैं इसे भूल क्यों नहीं पाता।
यह प्रश्न जितना सताता है, इसका उत्तर उतना ही मुक्त करता है; क्योंकि उत्तर में दोष नहीं, रचना है।
विज्ञान की ओर से
स्मृति के विषय में पहली बात यह समझनी चाहिए कि मस्तिष्क सब कुछ एक सी स्याही से नहीं लिखता। जिस घटना के साथ तीव्र भाव जुड़ा हो, भय, अपमान, हानि, उसे वह गहरी स्याही से लिखता है; क्योंकि उसकी दृष्टि में वही पाठ जीवित रहने के लिए सबसे आवश्यक है। अर्थात् पुरानी पीड़ा का बार बार लौटना स्मृति की दुर्बलता नहीं, उसकी अति सजग सेवा है।
दूसरी बात और भी महत्त्व की है; अध्ययन संकेत करते हैं कि स्मृति कोई जड़ अभिलेख नहीं है। हर बार जब हम किसी घटना को याद करते हैं, वह थोड़ी सी फिर से लिखी जाती है; उस समय के हमारे भाव उसमें घुल जाते हैं। इसी से दो मार्ग खुलते हैं। जो व्यक्ति हर स्मरण पर उसी क्रोध और उसी ग्लानि को दोहराता है, वह लकीर को और गहरा करता जाता है। और जो स्मरण के क्षण में थोड़ी करुणा, थोड़ी समझ, थोड़ा साक्षी भाव ले आता है, वह उसी लकीर को धीरे धीरे कोमल करता जाता है। लौटती हुई स्मृति वास्तव में पुनर्लेखन का एक अवसर है।
ज्ञान क्या कहता है
हमारी परम्परा ने इस लकीर को नाम दिया है, संस्कार; बार बार दोहराए गए अनुभव की गहरी छाप, जो फिर स्वचालित होकर चलती है। और उसने यह भी कहा कि संस्कार मिटाए नहीं जाते, बदले जाते हैं; पुरानी लकीर से लड़ने के स्थान पर नई लकीर खींची जाती है। इसीलिए स्मरण के सामने स्मरण रखा गया; जो मन बार बार घाव की ओर जाता है, उसे बार बार नाम की ओर, स्वाध्याय की ओर, सेवा की ओर मोड़ा जाता है।
और क्षमा को हमारे यहाँ इतना ऊँचा स्थान इसीलिए मिला; वह अतीत को उचित ठहराना नहीं है, अतीत की पकड़ से अपने वर्तमान को छुड़ा लेना है। क्षमा दूसरों पर उपकार से पहले, अपने ही मन की चिकित्सा है।
अनुभव क्या सिखाता है
व्यवहार में तीन बातें काम आती हैं। पहली, जब पुरानी स्मृति आए, तो उससे लड़िए मत और उसमें बहिए भी मत; केवल उसे नाम दीजिए, यह स्मृति है, यह आज नहीं है। इतना सा अन्तराल ही उसका आधा बल ले लेता है। दूसरी, जो बात भीतर बार बार घूमती हो, उसे एक बार पूरा लिख डालिए, अथवा किसी विश्वस्त को कह डालिए; कही और लिखी हुई पीड़ा भार से उतरकर स्मृति बनने लगती है। तीसरी, उसी स्मरण के क्षण में एक साँस लेकर यह देखिए कि उस घटना ने आपको क्या सिखाया; जिस क्षण अतीत से शिक्षा निकल आती है, उसी क्षण उसका डंक छोटा होने लगता है।
और एक आवश्यक मर्यादा; यदि कोई पुरानी घटना नींद, दिनचर्या और मन को लगातार तोड़ रही हो, तो यह केवल स्वाध्याय का नहीं, सहायता का भी विषय है। मन के घाव के लिए वैद्य के पास जाना उतना ही स्वाभाविक होना चाहिए जितना देह के घाव के लिए।
सम्बन्धित सूत्र
"अतीत के बारे में सोचकर उसे बदला नहीं जा सकता। जो हो गया, वह हो गया। उससे सीखा जा सकता है। किन्तु उसमें रहना केवल दुःख देता है।"
आगे के द्वार
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।