निर्माणाधीन ग्रन्थ
भक्ति एवं ज्ञान
प्रेम से बोध तक, बोध से प्रेम तक
इस ग्रन्थ की आत्मा एक वाक्य में; “ज्ञान बताता है कि वह कौन है। भक्ति बताती है कि वह तुम्हारा कौन है।”
मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन की दो महाधाराएँ हैं; बोध की धारा, और प्रेम की धारा। सहस्रों वर्षों से साधक पूछते आए हैं कि इन दोनों में कौन बड़ी है, और दोनों का सम्बन्ध क्या है। यह ग्रन्थ इसी प्रश्न की गहन, श्रद्धापूर्ण एवं व्यवस्थित यात्रा है।
एक ही खण्ड में श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत एवं गोस्वामी तुलसीदास जी की वाणी की त्रिवेणी है। जीव, जगत् एवं ईश्वर के तत्त्व विचार से लेकर, आळवार सन्तों, स्वामी रामानन्दाचार्य जी, कबीर, रैदास, सूरदास, मीराबाई से होते हुए आधुनिक हिन्दी सन्त परम्परा तक, भक्ति की पूरी लोक धारा इसमें समाहित है। शैव एवं शाक्त दृष्टियों का भी एक स्वतन्त्र खण्ड है, जो इस ग्रन्थ की अपनी विशेषता है।
तेरह खण्ड, एक सौ आठ अध्याय; लगभग साढ़े आठ सौ पृष्ठों का यह ग्रन्थ इस समय निर्माणाधीन है। हिन्दी संस्करण पहले आएगा, अंग्रेज़ी उसके पश्चात।
(स्थिति; निर्माणाधीन। विमोचन की सूचना इसी वेबसाइट पर मिलेगी।)