विचार एवं लेख

आधार शब्द

बाईस मूल अवधारणाएँ, सरल परिभाषाओं सहित।
खण्ड एक

जीवन के मूल अनुभव

पहले हम उन पाँच मूल अनुभवों को समझते हैं, जिनसे होकर मनुष्य का हर जीवन गुज़रता है।

१ · पीड़ा

जो परिस्थिति देती है। अनिवार्य।

पीड़ा वह प्राथमिक संवेदना है जो किसी घटना, परिस्थिति या कारण के होने पर शरीर या मन में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। शरीर में रोग होने पर शारीरिक पीड़ा। किसी प्रिय के बिछुड़ जाने पर हार्दिक पीड़ा। असफलता या अपमान के आघात पर मानसिक पीड़ा।

पीड़ा जीवन की अनिवार्यता है। इसको नकारने का प्रयास न उचित है, न सम्भव। पीड़ा कोई दोष नहीं, जीवन की सजीवता का प्रमाण है।

जो मन पीड़ा के ऊपर बुनता है। वैकल्पिक।

पीड़ा हुई, और मन ने उसे पकड़ लिया, बार बार याद किया, उससे भविष्य की आशंकाएँ बनाईं, अपने आप को दोषी ठहराया, दूसरों को दोषी ठहराया। यह आरोपित परत ही दुःख है। यह मन की रचना है। इसीलिए पीड़ा अनिवार्य है, किन्तु दुःख वैकल्पिक है।

परिस्थिति का फल। आता है, जाता है।

सुख वह मानसिक अवस्था है जो किसी अनुकूल परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति या घटना के होने पर उत्पन्न होती है। सुख परिस्थितिजन्य है। जब परिस्थिति बदलती है तो सुख भी बदल जाता है।

नई नियुक्ति मिली, सुख हुआ। बड़ा घर मिला, सुख हुआ। प्रिय का मिलन हुआ, सुख हुआ। किन्तु कुछ समय बाद ये सब सामान्य हो गए। सुख का स्वभाव ही यही है, वह आता है और जाता है। यह बाहर पर निर्भर है, इसलिए स्थायी नहीं हो सकता।

आत्मा का स्वभाव। सदा भीतर है।

आनन्द सुख से सर्वथा भिन्न है। आनन्द परिस्थितिजन्य नहीं है, यह आत्मा का स्वभाव है। तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली में कहा गया है, “आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्।” अर्थात ऋषि भृगु ने यही जाना कि आनन्द ही ब्रह्म है, आनन्द ही परम सत्य है।

आनन्द बाहर से नहीं आता। यह भीतर से प्रकट होता है, जब अज्ञान और अहंकार की परत हटती है। आनन्द किसी कारण से उत्पन्न नहीं होता, इसीलिए किसी कारण से नष्ट भी नहीं होता। आनन्द हमारी कोई उपलब्धि नहीं है, हमारा स्वरूप है। जैसे चन्दन से उसकी सुगन्ध अलग नहीं की जा सकती, वैसे आत्मा से आनन्द अलग नहीं किया जा सकता।

शास्त्र ने अनुभव के तीन सहज संकेत दिए हैं। पहला, गहरी निद्रा से जागकर हम कहते हैं, “बहुत अच्छी नींद आई।” उस अवस्था में न कोई वस्तु थी, न संबंध, न इच्छा, फिर भी आनन्द था। दूसरा, दो इच्छाओं के बीच जो छोटा सा अन्तराल आता है, उसमें मन क्षण भर अपने स्वरूप में टिकता है, और जो सहज प्रसन्नता वहाँ प्रकट होती है, वह आनन्द का स्पर्श है। तीसरा, जब अहंकार किसी क्षण पूर्ण शिथिल होता है, चाहे प्रेम में, चाहे विस्मय में, चाहे शरणागति में, तब “मैं” का भाव हट जाता है, और जो शेष रहता है, वही आत्म आनन्द है।

जहाँ “मैं” स्वतः शिथिल होता है।

प्रेम वह अनुभव है जिसमें “मैं” का भाव शिथिल होता है। नारद भक्ति सूत्र में प्रेम को अनिर्वचनीय कहा गया है, जैसे गूँगे को मीठे का स्वाद। भारतीय भक्ति परम्परा में प्रेम पाँच रसों में आता है; शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, और माधुर्य।

यूनानी दार्शनिकों ने भी प्रेम को चार रूपों में देखा था; एरोस, फिलिया, स्टोर्ग, और अगापे। सब एक ही सत्य के विविध रूप हैं। प्रेम सुख नहीं है, क्योंकि सुख स्थितिजन्य है, प्रेम स्वभाव। प्रेम आनन्द के सहज द्वारों में से एक है, क्योंकि उसमें “मैं” स्वतः शिथिल होता है।

खण्ड दो

आत्म तत्त्व

अब हम उस तत्त्व की ओर बढ़ते हैं, जो इन सब अनुभवों का द्रष्टा है। बाहर से भीतर की एक क्रमिक यात्रा।

६ · मन

विचारों का प्रवाह। उपकरण, स्वामी नहीं।

मन कोई भौतिक अंग नहीं है। यह विचार, स्मृति, कल्पना, और भावना का प्रवाह है। अद्वैत वेदान्त में मन अन्तःकरण चतुष्टय का एक अंग है, बुद्धि, चित्त, और अहंकार के साथ। पतंजलि के योगसूत्र में “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” कहा गया है, अर्थात योग का लक्ष्य मन की वृत्तियों को शान्त करना है।

मन उपकरण है, स्वामी नहीं। हम मन के पीछे का साक्षी हैं, मन स्वयं नहीं। विचार बादल हैं, हम वह आकाश हैं जिसमें वे आते जाते हैं। मन को साधा जा सकता है, परिष्कृत किया जा सकता है, और एक बड़ी चेतना में विश्राम पाने दिया जा सकता है।

सीमित “मैं”। दुःख का मूल।

यहाँ अहंकार का अर्थ घमण्ड नहीं है। अहंकार वह “मैं” का भाव है, जो मनुष्य को एक सीमित और पृथक् सत्ता मानता है। मैं हूँ, और मैं दूसरों से अलग हूँ। मुझे चोट लगती है, मेरा छिन जाता है, मैं नियन्त्रण चाहता हूँ, मैं तुलना में उलझा रहता हूँ।

यह “मैं” का भाव ही वह केन्द्र है जहाँ से मन सुख और दुःख की सारी कहानियाँ गढ़ता है। अहंकार दुःख का मूल है, मन उसका माध्यम। जब यह भाव शिथिल होता है, तो दुःख भी शिथिल होता है। और जब यह पूरी तरह समर्पित हो जाता है, तो दुःख के लिए आधार ही नहीं बचता।

स्वयंप्रकाश जागरूकता, जो सदा है।

चेतना वह मूल जागरूकता है, जो समस्त अनुभवों का आधार है। यह वह जानना है जो सदा है; जागते समय भी, स्वप्न में भी, और गहरी नींद में भी। चेतना किसी बाहरी वस्तु की प्रतीक्षा नहीं करती। वह स्वयंप्रकाश है, स्वयं जानने वाली है।

शरीर बदलता है, मन बदलता है, विचार बदलते हैं, भावनाएँ बदलती हैं। जो नहीं बदलती, वह चेतना है। आप द्रष्टा हैं, दृश्य नहीं। यही चेतना का स्वरूप है।

जो देखता है, परन्तु जुड़ता नहीं।

सत् चित् आनन्द। आप वही हैं।

आत्मा वह है, जो शरीर नहीं है, मन नहीं है, विचार नहीं हैं, भावनाएँ नहीं हैं। आत्मा वह चेतन तत्त्व है, जो इन सबका अनुभव करता है और इन सबसे परे है।

शास्त्र कहते हैं कि आत्मा का स्वभाव सत् है, अर्थात सदा विद्यमान। चित् है, अर्थात स्वयं जानने वाली। और आनन्द है, अर्थात स्वयं आनन्द रूप। जब कोई कहता है कि आनन्द भीतर है, तो उसका अर्थ है कि आनन्द आत्मा में है, और आत्मा भीतर है। आत्मा की पहचान इस यात्रा की आधारशिला है।

खण्ड तीन

साधना के साधन

इन तत्त्वों के बाद आते हैं साधना के पाँच मुख्य साधन। ये वे आधार हैं, जिन पर तीन मार्ग खड़े होते हैं।

११ · विवेक

नित्य और अनित्य का भेद।

विवेक केवल बुद्धि नहीं है। बुद्धि चुनाव कर सकती है, किन्तु केवल विवेक ही श्रेयस्कर चुनाव की ओर ले जा सकता है। विवेक वह भीतरी दृष्टि है, जो नित्य और अनित्य में, शाश्वत और क्षणिक में, सत्य और असत्य में भेद करती है।

आदि शंकराचार्य के साधन चतुष्टय का प्रथम तत्त्व नित्यानित्य वस्तु विवेक है। विवेक समस्त साधना का पहला द्वार है। इसके बिना साधना अन्धकार में चलने जैसी है।

अनासक्ति। फल से बँधे बिना कर्म।

वैराग्य उदासीनता नहीं है, जीवन से पलायन नहीं है, संवेदनाओं का दमन नहीं है। वैराग्य अनासक्ति है, जो यह समझती है कि बाहरी वस्तुएँ और परिस्थितियाँ स्थायी नहीं हैं। इनसे लगाव जितना अधिक होगा, दुःख भी उतना ही अधिक होगा।

वैराग्य जीवन में कर्म करने से नहीं रोकता। यह केवल कर्म के फल से बँधने से रोकता है। प्रेम करना, कर्तव्य निभाना, संबंधों में जीना, ये सब वैराग्य में सम्भव हैं। विवेक जब जीवन में उतरता है, तो वह वैराग्य बन जाता है।

जो है, उसे है मानना।

स्वीकृति का अर्थ हार मान लेना नहीं है, न ही निष्क्रिय हो जाना। स्वीकृति का अर्थ है, जो घटित हो चुका है, उसे उसके वर्तमान रूप में, बिना प्रतिरोध के, बिना आत्म दोष के स्वीकार करना। प्रतिरोध कहता है, यह नहीं होना चाहिए था। स्वीकृति कहती है, यह है, अब क्या करना है।

एपिक्टेटस की प्राचीन स्टोइक दृष्टि और रेनहोल्ड नीबर की शान्ति प्रार्थना इसी सत्य पर पहुँचीं। आधुनिक स्वीकृति एवं प्रतिबद्धता चिकित्सा इसकी वैज्ञानिक पुष्टि है। स्वीकृति वह भूमि है, जहाँ से परिवर्तन की यात्रा आरम्भ होती है। जो स्वीकार नहीं किया गया, उसे बदला भी नहीं जा सकता।

हृदय का खुलापन। ज्ञान का बीज।

श्रद्धा अन्धविश्वास नहीं है। संस्कृत में श्रत् और धा का अर्थ है, हृदय में धारण करना। श्रद्धा वह हृदय का खुलापन है, जो ज्ञान को भीतर आने देता है। भगवद्गीता के “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्” का यही अर्थ है, बुद्धिमान को नहीं, श्रद्धावान को ज्ञान मिलता है।

श्रद्धा में विवेक है, प्रश्न पूछने की स्वतन्त्रता है। अन्धविश्वास में दमन है, भय है, तर्क का निषेध है। यह भेद स्पष्ट रहना अनिवार्य है। ज्ञान, भक्ति, और कर्म, तीनों मार्गों की भूमि श्रद्धा है। श्रद्धा बीज है, साधना उसकी अभिव्यक्ति।

आत्म परिष्कार की पद्धति।

साधना केवल ध्यान, पूजा या मन्त्र नहीं है। साधना जीवन में आत्म परिष्कार की सम्पूर्ण पद्धति है। प्रत्येक विचार, प्रत्येक कर्म, प्रत्येक संबंध साधना का अवसर है। जब व्यक्ति अपने स्वभाव को पहचानने के लिए जीवन को साधने लगता है, तो वह साधक बनता है।

पतंजलि के योगसूत्र में साधना का सूत्र है, “स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारासेवितो दृढभूमिः।” अर्थात साधना दीर्घ काल तक, बिना विराम, और श्रद्धा से की जाए, तभी वह दृढ़ होती है। ज्ञान वह है जो जिया जाए, और जीने के लिए निरन्तर अभ्यास चाहिए। यही साधना है।

खण्ड चार

साधना के तीन मार्ग

भारतीय परम्परा ने मनुष्य के विभिन्न स्वभावों के लिए तीन प्रमुख मार्ग दिए। ये परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं।

१६ · कर्म

फल की अपेक्षा बिना कर्तव्य निर्वाह।

कर्म केवल काम नहीं है। कर्म वह सम्पूर्ण क्रिया है, जो विचार, वाणी, और शरीर से होती है। कर्मयोग वह दर्शन है, जो कहता है, कर्म करो, परन्तु फल पर अधिकार न समझो। गीता का “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” इसी का सूत्र है।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि एपिक्टेटस के स्टोइक दर्शन ने भी स्वतन्त्र रूप से यही कहा। कर्मयोग दुःख से मुक्ति का सबसे व्यावहारिक मार्ग है, क्योंकि अधिकांश दुःख फल की अपेक्षा से उत्पन्न होते हैं।

हृदय का सहज प्रेम परमात्मा की ओर।

भक्ति वह हृदय का खुलापन है, जो परमात्मा की ओर सहज प्रेम से बहता है। नारद भक्ति सूत्र में भक्ति को “सा त्वस्मिन् परम प्रेमरूपा” कहा गया है। श्रीमद्भागवत में नवधा भक्ति के नौ रूप दिए गए हैं; श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य, और आत्मनिवेदन।

भक्ति में विशेष बुद्धि की आवश्यकता नहीं, केवल खुले हृदय की। यह तीसरा द्वार है, जब ज्ञान थका दे और कर्म का बोझ भारी लगे। मीरा, कबीर, चैतन्य, तुलसी, सूर, ललयद, अक्कमहादेवी, और अनगिनत संतों ने इसी द्वार से चलकर परम आनन्द को पाया।

“मैं कौन हूँ” का प्रत्यक्ष साक्षात्कार।

ज्ञानयोग के मूल सूत्र हैं; “नेति नेति”, “तत्त्वमसि”, और “अहं ब्रह्मास्मि”। शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में अध्यास, अर्थात एक पर दूसरे का आरोपण, ही अविद्या का स्वरूप है। यह तीव्र आकाङ्क्षा वालों के लिए मार्ग है। रमण महर्षि की कोऽहम् साधना इसी का सरलतम और गहनतम रूप है।

खण्ड पाँच

यात्रा की उच्च भूमियाँ

अन्त में साधना की चार उच्च भूमियाँ। ये क्रमशः उठते हुए पड़ाव हैं, जिनकी ओर सब साधन और मार्ग ले जाते हैं।

१९ · समता

अनुकूल प्रतिकूल में अडिग केन्द्र।

समता वह भीतरी स्थिरता है, जो अनुकूल और प्रतिकूल, दोनों प्रकार की परिस्थितियों में समान बनी रहती है। समता का अर्थ न निष्क्रियता है, न भावहीनता। समता का अर्थ है, परिस्थिति बदले पर भी भीतर का केन्द्र न हिले। सफलता में शान्त, असफलता में भी शान्त।

भगवद्गीता में वर्णित स्थितप्रज्ञ इसी समता में स्थित है। और गीता का “समत्वं योग उच्यते” इसी सत्य का घोष है। यह यात्रा का पहला व्यावहारिक फल है।

“मैं” का सचेत समर्पण। सर्वोच्च साधना।

शरणागति का अर्थ पराजय नहीं है। थकान में “अब भगवान पर छोड़ दिया” कहना शरणागति नहीं है। शरणागति जागे हुए मन का निर्णय है। वह सचेत है, प्रेमपूर्ण है, और पूर्ण जागरूकता में ली गई है। इसमें वह “मैं” भी समर्पित किया जाता है, जो सब कुछ को धारण करने का अभिमान करता है।

इसी जीवन में बन्धन से छूटना।

मुक्ति मृत्यु के बाद की नहीं है। मुक्ति इसी जीवन में सम्भव है, अभी, यहीं। इसे शास्त्र जीवन्मुक्ति कहते हैं। मुक्ति किसी स्थान पर जाने का नाम नहीं है। यह एक आन्तरिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति अहंकार, अविद्या, और सीमित “मैं” के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

व्यक्तिगत और सामाजिक परिपूर्णता का पूर्ण समावेश।

कल्याण केवल सुख नहीं है, केवल शान्ति नहीं है, केवल मुक्ति नहीं है। कल्याण इन सबका पूर्ण समावेश है। परम कल्याण वह अवस्था है, जिसमें व्यक्ति के भीतरी और बाहरी, व्यक्तिगत और सामाजिक, सब आयाम एक साथ पूर्ण होते हैं।

वह मुक्त है, आनन्द में है, समता में है, और साथ ही समाज के हित में भी कार्यरत है। वह अपने लिए ही नहीं, सबके लिए मङ्गल की कामना करता है। यही सनातन परम्परा के शान्ति मन्त्र का घोष है, “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।” परम कल्याण वही अवस्था है, जहाँ यह कामना जीवन बन जाती है।

"इन सबका सारा ज्ञान एक ही केन्द्रीय वचन के चारों ओर घूमता है। दुःख तुम्हारा शत्रु नहीं है, वह उस आनन्द की पुकार है, जो तुम्हारे भीतर सदा से था।"