श्रद्धा के दीप

प्रेरणा स्रोत

एक

परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज की वाणी

इन शिक्षाओं की आत्मा

स्वामीजी महाराज ने अपने जीवन में स्पष्ट आदेश दिया था, कि न कोई उनकी जीवनी लिखे, न चित्र रखे। अतः यहाँ कोई चित्र नहीं है। यह परिचय शाखा चंद्र न्याय के अनुरूप है, अर्थात व्यक्ति की ओर नहीं, उनकी शिक्षा की ओर एक संकेत मात्र।

इस पुस्तक का बीज

जैसे वृक्ष की शाखा की ओर संकेत करके चंद्रमा की ओर दृष्टि मोड़ी जाती है, वैसे ही यहाँ उनके व्यक्तित्व पर नहीं, उनकी शिक्षा की ओर संकेत मात्र है। जो पाठक इसे धैर्य से पढ़ेंगे, उन्हें वह जीवित प्रकाश मिलेगा, जो स्वामीजी की वाणी में आज भी बहता है।

एक संक्षिप्त परिचय

शाखा चंद्र न्याय के अनुरूप

सन् १९०४

राजस्थान के नागौर ज़िले के मधपुर गाँव में आविर्भाव। चार वर्ष की आयु में संत वेश।

लगभग १०२ वर्ष

शाखा चंगाँव गाँव, नगर नगर निरंतर भ्रमण करते हुए गीता का सत्संग बरसाते रहे।

साधक संजीवनी

गीता पर उनकी विस्तृत टीका। साथ ही अमृतबिंदु, जो इस पुस्तक का मूल आधार है।

३ जुलाई २००५

माँ गंगा के तट पर, ऋषिकेश के गीता भवन में तिरोभाव। जहाँ से आये, वहीं लौट गये। उनका व्रत, जो उनकी ही शिक्षा का जीवित प्रमाण था
- उन्होंने कभी अपना चित्र नहीं खिंचवाया।
- किसी को अपने चरण स्पर्श नहीं करने दिये।
- किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया, और कोई आश्रम स्थापित नहीं किया।
- कोई उपहार स्वीकार नहीं किया, और किसी वस्तु का संग्रह नहीं किया।
- अपने चारों ओर कोई भीड़ एकत्र नहीं होने दी, और कोई उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया।
- संपूर्ण जीवन केवल भिक्षा पर निर्भर रहे।
उनका एकमात्र संकल्प था; जनमानस को भगवद्गीता की ओर मोड़ देना, अपनी ओर नहीं। उन्होंने स्वयं कहा था, कि जो लोगों को अपनी ओर खींचता है, वह भगवद्रोही है। इस एक सूत्र को उन्होंने केवल सिखाया नहीं; उन्होंने उसे जिया।

भाग दो

इक्कीस प्रमुख शिक्षाएँ

स्वामीजी महाराज की समस्त वाणी का सार इक्कीस शिक्षाओं में संकलित है। जिनमें से एक भी सूत्र हृदय में बैठ जाय, उनके लिए संपूर्ण पुस्तक का सार उसी एक सूत्र में मिल जाता है। किसी शिक्षा को स्पर्श करने पर उसका विस्तार खुलता है।

१ · आप कौन हैं
  • आप यह शरीर नहीं हैं। न ये इन्द्रियाँ। न यह मन। न यह बुद्धि।
  • आप वह चेतन सत्ता हैं, जिसके प्रकाश में ये सब दिखाई देते हैं। जो “मैंपन” आप अपने भीतर अनुभव करते हैं, यही मात्र संसार का बीज है। यही समस्त दुःखों का मूल है।
  • आपका सच्चा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है। और उसमें कोई “मैं” नहीं है। यह एक बात समझ में आ जाय, तो इसी क्षण जीवन्मुक्ति है।
  • शरीर बदलता रहता है, आप नहीं बदलते। शरीर आपके बिना नहीं रह सकता; परन्तु आप शरीर के बिना सदा रहते हैं, सदा रहे हैं, सदा रहेंगे।
  • यह मनुष्य शरीर आपको खाने, सोने, कमाने, और मर जाने के लिए नहीं दिया गया। इसका एकमात्र प्रयोजन है; उसको जानना, जिसने इसे दिया है।
  • यह जन्म आपके समस्त जन्मों का आदि भी है, और अंतिम भी। यदि आप परमात्मप्राप्ति कर लें, तो यही अंतिम जन्म है। और यदि न करें, तो यही अनंत जन्मों का आदि जन्म है।
  • आकृति मात्र से कोई मनुष्य नहीं होता। मनुष्य वही है, जो अपने विवेक को महत्त्व देता है। आपका उद्देश्य ही आपकी प्रतिष्ठा है।
  • आप जीवन भर जिस सुख के पीछे दौड़ते रहे, वह सदा दूसरा रूप लेकर दुःख में बदल जाता है।
  • क्योंकि अपने लिए सुख चाहने से नाशवान् सुख मिलता है। और दूसरों को सुख पहुँचाने से अविनाशी सुख मिलता है।
  • सुख भोगने के लिए स्वर्ग है। दुःख भोगने के लिए नरक है। और सुख दुःख दोनों से ऊँचे उठकर महान् आनन्द प्राप्त करने के लिए ही यह मनुष्य लोक है। हमें सुख का भोगी नहीं, सुख का दाता बनना है।
  • आप ध्यान से देखिए; दुःख कहाँ से आता है। जब आप कहते हैं, “ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए;” इसी एक छोटे वाक्य में समस्त दुःख भरे हुए हैं।
  • मनुष्य को वस्तु ग़ुलाम नहीं बनाती; उसकी इच्छा ग़ुलाम बनाती है। कुछ भी चाहना ग़ुलामी है। कुछ भी न चाहना आज़ादी है।
  • कामनाओं के त्याग में आप पूर्णतया स्वतंत्र हैं। परन्तु कामनाओं की पूर्ति में आप सदा पराधीन हैं। जब तक अंतःकरण में कोई कामना नहीं रहेगी, तब भगवान् स्वतः प्राप्त हो जायँगे।
  • सुखी अथवा दुःखी होना प्रारब्ध का फल नहीं है; यह मूर्खता का फल है। और यह मूर्खता केवल सत्संग से मिटती है।
  • यह एक गहरा रहस्य है; अनुकूलता में सुखी होना ही प्रतिकूलता में दुःखी होने का कारण है। ये दोनों एक ही गति के दो छोर हैं।
  • दुःख आपको नष्ट करने नहीं आता; वह आपको सुख की लत से मुक्त करने आता है। और सदा याद रखिए; दुःख वस्तु के अभाव से नहीं आता; वस्तु की चाह से आता है।
  • दुःख जब आये, तब प्रसन्न होना; यह बहुत ऊँचा साधन है। क्योंकि दुःख पूर्वकृत पापों का क्षय करता है।
  • भगवान् के मंगलमय विधान से जो अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थिति आती है, वह केवल आपके हित के लिए ही आती है।
  • जो होता है, वह ठीक ही होता है। बेठीक होता ही नहीं। ठीक बेठीक हमारी दृष्टि में होता है; भगवान् की दृष्टि में सब ठीक है।
  • इसलिए करने में सावधान, और होने में प्रसन्न रहिए। करना पुरुषार्थ के अधीन है। होना प्रारब्ध के अधीन। कर्तव्य और कर्म आपकी स्वतंत्रता में हैं; फल आपके अधीन नहीं है।
  • दुःखदायी परिस्थिति भगवान् के विधान से आपके कल्याण के लिए ही आती है। अतः उसे मिटाने की चेष्टा न करके शान्तिपूर्वक सहना चाहिए।
  • सुख की इच्छा ही समस्त पापों की जड़ है। और दुःख उस इच्छा को काटने वाला धारदार शस्त्र है।
  • ज्ञानी पुरुष परिस्थिति से रहित नहीं होता; वह सुख दुःख से रहित होता है। परिस्थिति से मुक्त होने में आप स्वतंत्र नहीं हैं; परन्तु सुखी दुःखी न होने में पूर्णतया स्वतंत्र, समर्थ, और सफल हैं।
  • संसार विश्वास करने योग्य नहीं है; सेवा करने योग्य है। इस जगत् में जो संयोग है, वह निरंतर वियोग की ओर जा रहा है।
  • भूल यह होती है, कि आप उस संयोग को नित्य मान लेते हैं। यह संसार मेहन्दी के पत्ते की तरह है; ऊपर से हरा दीखता है, परन्तु इसके भीतर परमात्मरूप लाली परिपूर्ण है।
  • संसार को सत्ता देने से संयोग वियोग होते हैं; और महत्ता देने से सुख दुःख। संसार की सत्ता नहीं, उसकी महत्ता ही बाधक है।
  • ममता ही मूल अशुद्धि है। आप घर में रहने से नहीं फँसते; घर को अपना मानने से फँसते हैं। जितनी वस्तुओं को आप अपनी मानते हैं, उतने ही उनके पराधीन हो जाते हैं।
  • यह एक आश्चर्य है, कि ममतारहित पुरुष दुनिया का जितना भला कर सकता है, ममतावाला उतना कर ही नहीं सकता।
  • जो जाने वाला है, उसे जाने वाला समझना; और जो रहने वाला है, उसे रहने वाला समझना; यही यथार्थ समझ है। रहने वाले भगवान् से आत्मीयता करेंगे, तो सदा के लिए निहाल हो जायँगे।
  • कर्तव्य का यथार्थ स्वरूप सेवा है। संसार से मिले हुए शरीरादि पदार्थों को संसार के हित में लगा देना; यही कर्तव्य है। आज जो अशान्ति है, उसका मूल कारण एक ही है; लोग अधिकार की माँग तो करते हैं, पर कर्तव्य का पालन नहीं करते।
  • सुख लेने के लिए तो आपका शरीर भी आपका नहीं है। परन्तु सुख देने के लिए पूरा संसार आपका है। देने के भाव से समाज में एकता और प्रेम उत्पन्न होते हैं। लेने के भाव से संघर्ष।
  • दूसरे के दुःख से दुःखी होना ही सेवा का मूल है। हमारी किसी भी क्रिया से किसी को तिलमात्र भी दुःख न पहुँचे; यह भाव सच्चा भजन है।
  • अच्छाई का अभिमान बुराई की जड़ है। ज्ञान मुक्त करता है। परन्तु ज्ञान का अभिमान नरकों में ले जाता है।
  • अभिमान उस वस्तु का होता है, जो आपकी है ही नहीं; परन्तु आपने उसको अपनी मान लिया। जो सच में आपकी है, उसका अभिमान नहीं होता।
  • जिसका स्वभाव सुधर जाय, उसके लिए पूरी दुनिया सुधर जाती है। अपने को छोटा, और दूसरे को बड़ा मानना; असली बड़प्पन है। बड़ा वास्तव में वही है, जो दूसरों को बड़ा बनाता है।
  • सर्वथा निर्दोष जीवन आप सबका हो सकता है। परन्तु सर्वथा दोषी जीवन किसी का नहीं। भगवान् के अंश होने से आप स्वयं निर्दोष हैं।
  • जब आप अपने दोषों को दोष मानकर उनसे दुःखी हो जाते हैं, उनका रहना आपको असह्य हो जाता है; तब भगवद्कृपा उन्हें शीघ्र नष्ट कर देती है।
  • दूसरों के दोष देखने से आपका अंतःकरण स्वयं मलिन होता चला जाता है। यदि अपनी निर्दोषता सुरक्षित रखनी है, तो किसी में दोष न देखिए; न अपने में, न दूसरे में।
  • आपका वास्तविक गुरु आपके भीतर ही बैठा है। उसका नाम विवेक है।
  • शान्ति त्याग से मिलती है, मन की एकाग्रता से नहीं। कल्याण बुद्धि की स्थिरता से होता है; मन की स्थिरता से मात्र सिद्धियाँ मिलती हैं।
  • बुद्धि के अनुसार मन, और मन के अनुसार इन्द्रियाँ चलें; तो उत्थान। इसका उल्टा हो, तो पतन। विवेक का आदर जितना बढ़ता है, वह अंततः बिना शास्त्र और बिना गुरु के भी आपको परमात्मा तक पहुँचा देता है।
  • लोग समझते हैं, त्याग का अर्थ है वस्तुओं को छोड़ देना। परन्तु वस्तु आपको नहीं बाँधती; वस्तु का महत्त्व बाँधता है।
  • मुक्ति इच्छा के त्याग से होती है, वस्तु के त्याग से नहीं। वास्तविक त्याग वह है, जिसमें त्याग वृत्ति का भी त्याग हो जाय।
  • मुझे कुछ लेना है ही नहीं; केवल इतनी बात से मुक्ति हो जायगी। और शरीर से अहंता ममता न रखना; यही सच्चा एकांत है, न कि निर्जन स्थान में जाना।
  • भगवान् सर्वसमर्थ हैं। परन्तु एक बात में वे असमर्थ हैं। वे आपसे दूर नहीं हो सकते।
  • जिस वस्तु को आप दूर से दूर मानते हैं, शरीर उससे भी अधिक दूर है। जिस वस्तु को आप नज़दीक से नज़दीक मानते हैं, परमात्मा उससे भी अधिक नज़दीक हैं।
  • भगवान् का कहीं भी अभाव नहीं है। केवल उनको देखने वाले का अभाव है। और सुनिए; भगवान् आपको दास नहीं, सखा बनाना चाहते हैं।
  • मैं भगवान् का हूँ, और भगवान् मेरे हैं। इस अपनेपन के समान कोई योग्यता, पात्रता, अथवा अधिकारिता नहीं है।
  • समस्त यज्ञ, तप, दान, व्रत, तीर्थ; इसके सामने छोटे पड़ जाते हैं। आप जैसे भी हैं, अभी इसी क्षण मान लीजिए, कि मैं भगवान् का हूँ।
  • यह एक स्वीकृति आपके समस्त दोषों को खा जाती है। भगवान् के साथ आपका संबंध स्वतःसिद्ध और स्वाभाविक है।
  • भगवत्प्राप्ति वास्तव में सुगम है। परन्तु लगन न होने के कारण कठिन प्रतीत होती है।
  • भगवान् क्रियाग्राही नहीं, भावग्राही हैं। वे हठ से नहीं मिलते; सच्ची लगन से मिलते हैं। देर उद्योग की कमी से नहीं, उत्कट अभिलाषा की कमी से होती है।
  • यदि आप जल बिना व्याकुल मछली की भाँति भगवान् के बिना व्याकुल हो जायँ; तो भगवान् मिलने में देर नहीं लगायेंगे। भगवान् का विश्वास भगवान् से भी बड़ा है।
  • भगवान् के लिए अपनी मनचाही छोड़ देना; यही शरणागति है। जब भक्त भगवान् के साथ अपने नित्य संबंध को पहचान लेता है; तब उसमें चार अद्भुत फल एक साथ प्रकट होते हैं।
  • वह निश्चिंत हो जाता है। वह निर्भय हो जाता है। वह निःशोक हो जाता है। वह निःशंक हो जाता है। संसार का कोई अन्य साधन यह चार फल नहीं दे सकता।
  • वेदों का सार उपनिषद् हैं। उपनिषदों का सार गीता है। और गीता का सार एक ही वाक्य में है; भगवान् की शरणागति।
  • भगवान् की कृपा भगवान् के लिए नहीं है। वह आप सबके लिए है। जैसे गाय का दूध गाय के लिए नहीं, बछड़े के लिए है।
  • प्रेम केवल वहीं उत्पन्न होता है, जहाँ अपने सुख और स्वार्थ की गन्ध भी नहीं होती। भेद मत में होता है, प्रेम में नहीं। प्रेम समस्त मतवादों को खा जाता है।
  • प्रेम मुक्ति से भी आगे की वस्तु है। और यदि आप भगवान् की दया चाहते हैं; तो अपने से छोटों पर दया करना प्रारंभ कर दीजिए।
  • साधन क्रिया नहीं है। साधन में केवल भाव और विवेक मुख्य हैं। अभ्यास का नाम भजन नहीं है। भगवान् की स्मृति और प्रियता का नाम भजन है।
  • नामजप अभ्यास नहीं, पुकार है। असली साधन वह है, जो निरंतर होता है। प्रत्येक क्षण, श्वास श्वास पर।
  • जो परिस्थिति सामने आ जाय, उसी में प्रसन्न रहना; यही सर्वोच्च भजन है। हर हाल में प्रसन्न रहने की विद्या एकमात्र सत्संग से मिलती है। सच्चा संत लोगों को अपनी तरफ़ नहीं, भगवान् की तरफ़ खींचता है।
  • साधक वही है, जो निरंतर सावधान रहता है। उसमें साधन सिद्धि की चिंता नहीं; परन्तु भगवत्प्राप्ति की व्याकुलता अवश्य होनी चाहिए। क्योंकि चिंता भगवान् से दूर करती है, और व्याकुलता पास लाती है।
  • अपने को कभी सिद्ध नहीं मानना चाहिए। सदा साधक ही मानना चाहिए। क्योंकि सिद्ध मानने से धोखा होता है।
  • करेंगे, यह निश्चित नहीं है। परन्तु मरेंगे, यह बिलकुल निश्चित है। शरीर को मैं और मेरा मानना ही प्रमाद है। और प्रमाद ही मृत्यु है।
  • शरीर संसार के संबंध से मृत्यु का अनुभव होता है। और भगवान् के संबंध से अमरता का। जैसे शरीर के लिए मृत्यु सुलभ है; वैसे ही आपके लिए अमरता सुलभ है।

भाग तीन

तीन मूल साधना मंत्र

स्वामीजी महाराज ने अपने जीवन भर के समस्त उपदेश का निचोड़ केवल तीन छोटे छोटे वाक्यों में दे दिया है। यदि आप केवल इन्हीं तीन को अपने श्वास श्वास में बसा लें; तो अन्य कोई साधना करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। ये तीनों मिलकर भक्ति, ज्ञान, और वैराग्य; तीनों को एक ही क्षण में पूर्ण कर देते हैं।

पहला मंत्र · एक प्रार्थना

हे मेरे नाथ, मैं आपको भूलूँ नहीं।
इस एक पंक्ति में समस्त भक्ति समाहित है। आप कुछ नहीं माँग रहे। न धन, न यश, न सफलता, न सुख, न मुक्ति।
आप केवल इतना कह रहे हैं, कि आपको भूल न जाऊँ। और यह पुकार इतनी सरल है, कि किसी योग्यता, पात्रता, अथवा अधिकार की आवश्यकता नहीं।
क्योंकि भगवान् क्रियाग्राही नहीं, भावग्राही हैं। और इस पुकार में जो भाव है; वही उन्हें प्रकट कर देता है।

दूसरा मंत्र · एक स्वीकृति

मैं केवल भगवान् का ही हूँ, एवं केवल भगवान् ही मेरे हैं।
इस अपनेपन के समान कोई योग्यता, पात्रता, अथवा अधिकारिता नहीं है। समस्त यज्ञ, तप, दान, व्रत, तीर्थ; इसके सामने छोटे पड़ जाते हैं।
आप जैसे भी हैं; अभी इसी क्षण मान लीजिए, कि मैं भगवान् का हूँ। यह एक स्वीकृति आपके समस्त दोषों को खा जाती है।
संसार में कोई नौकर को अपना मालिक नहीं बनाता। परन्तु भगवान् शरणागत भक्त को अपना मालिक बना लेते हैं। ऐसी उदारता केवल प्रभु में ही है।

तीसरा मंत्र · एक तत्त्वसूत्र

शरीर संसार कभी साथ रहते नहीं, एवं भगवान् कभी साथ छोड़ते नहीं।
इस एक वाक्य में वैराग्य भी है, श्रद्धा भी है, और विश्वास भी है। जिस शरीर को आप अपना समझते हैं, वह एक क्षण भी आपके साथ स्थिर नहीं रहा।
और जिन भगवान् को आप दूर मानते हैं; वे एक क्षण भी आपसे अलग नहीं होते। भगवान् सर्वसमर्थ होते हुए भी, आपसे दूर होने में असमर्थ हैं।
यह एक सूत्र आपके जीवन का संपूर्ण शास्त्र बन सकता है।

तीनों का संयुक्त साधन

एक पूर्ण साधना
पहला

प्रार्थना · भक्ति का अंग

दूसरा

स्वीकृति · अपनेपन का अंग

तीसरा

विवेक · वैराग्य का अंग

एक बार इन्हें हृदय में बसा लीजिए। फिर कुछ करना नहीं है। ये तीनों आप में स्वयं साधना करते रहेंगे। श्वास श्वास में। प्रत्येक क्षण। जब भी मन अशान्त हो; किसी एक वाक्य को धीरे से अपने भीतर दोहराइए। जब भी अकेलापन सताये; मैं भगवान् का हूँ, और भगवान् मेरे हैं। फिर कैसा अकेलापन। जब भी संसार का मोह पकड़ने लगे; जो छोड़ ही जायगा, उसके लिए क्या रोना। और जो कभी नहीं छोड़ेंगे, उनके लिए क्या चिंता। और रात को सोने से पूर्व; जब सारा संसार सो जाता है; केवल पहला वाक्य। हे मेरे नाथ, मैं आपको भूलूँ नहीं।

यही स्वामीजी महाराज की संपूर्ण साधना है। यही उनकी शिक्षा का अर्क है। और यही भगवान् से वह अंतिम सेतु है, जो कभी टूट नहीं सकता।

"हे नाथ, मेरे नाथ, मैं आपको भूलूँ नहीं।
दुःख से आनन्द की ओर परिशिष्ट दो।

स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज की वाणी

दो · एक भक्ति भेंट

गीता सेवा

श्रीमद्भगवद्गीता, अन्य सनातन साहित्य तथा परम श्रद्धेय सेठ जयदयाल जी गोयन्दका, परम पूज्य भाई श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी एवं परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज के साहित्य के नित्य श्रवण तथा पाठ के लिए गीता सेवा ट्रस्ट की सामग्री निःशुल्क उपलब्ध है। जो साधक इस मार्ग पर चलना चाहें, उनके लिए यह अत्यन्त उपयोगी है।

वेबसाइट : gitaseva.org

एंड्रॉयड एवं ऐपल ऐप भी उपलब्ध हैं, तथा यूट्यूब म्यूज़िक पर गीता सेवा चैनल भी।

दो · एक भक्ति भेंट

गीता सेवा

श्रीमद्भगवद्गीता, अन्य सनातन साहित्य तथा परम श्रद्धेय सेठ जयदयाल जी गोयन्दका, परम पूज्य भाई श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी एवं परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज के साहित्य के नित्य श्रवण तथा पाठ के लिए गीता सेवा ट्रस्ट की सामग्री निःशुल्क उपलब्ध है। जो साधक इस मार्ग पर चलना चाहें, उनके लिए यह अत्यन्त उपयोगी है।

वेबसाइट; gitaseva.org

एंड्रॉयड एवं ऐपल ऐप भी उपलब्ध हैं, तथा यूट्यूब म्यूज़िक पर गीता सेवा चैनल भी।

gita