विचार एवं लेख
जीवन सूत्र
पचास चुने हुए सूत्र। धीरे पढ़िए; ये रुकने के लिए ही लिखे गए हैं। जो सूत्र हृदय को छू जाए, उसे साझा कीजिए; आपका एक छोटा सा शेयर किसी दुःखी हृदय तक आशा पहुँचा सकता है।
१
पीड़ा अनिवार्य है। दुःख वैकल्पिक है।
२
आप अकेले नहीं हैं। यह क्षण भी, बहुत लोगों ने पार किया है। आप भी पार करेंगे।
३
माता पिता सच्चे अर्थ में कभी खोते नहीं। वे हृदय के भीतर स्थान ले लेते हैं। जब भी कोई शुभ विचार आता है, वह उनकी देन है। जब भी कोई कठिन घड़ी सही गई, वह उनकी शक्ति है।
४
शास्त्र हमें सत्य देता है। विज्ञान हमें भाषा देता है। अनुभव हमें जीवन देता है। तीनों मिलकर एक सम्पूर्ण मार्ग बनाते हैं।
५
करने में सदा सावधान, होने में सदा प्रसन्न।
६
परम कल्याण यहीं, अभी, इसी जीवन में सम्भव है। किसी और लोक की प्रतीक्षा नहीं, किसी और समय की प्रतीक्षा नहीं। जो आप खोज रहे थे, वह आप हैं।
७
जब किसी प्रश्न का एक उत्तर होता है, तब वह प्रश्न छोटा होता है। जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों के अनेक उत्तर होते हैं, और उन सबको एक साथ मानना ही ज्ञान की पहली परिपक्वता है।
८
सोने का सच्चा परखी गहनों में नहीं फँसता। जो सोने को पहचानता है, वह कंगन, हार, अंगूठी; इन भिन्न रूपों के बीच विवाद नहीं करता। उसे सोना चाहिए, गहना नहीं।
९
एक ऐसी भीतरी स्थिरता, जिसे न सुख डगमगाए, न दुःख तोड़े।
१०
पीड़ा वह प्राथमिक संवेदना है, जो शरीर, मन, या परिस्थिति से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। दुःख वह अतिरिक्त बोझ है, जो मन उस पीड़ा के ऊपर अपने विचारों, कहानियों, प्रतिरोध, और आत्म दोष से चढ़ाता है।
११
इच्छाएँ होना स्वाभाविक है। किन्तु जब इच्छाएँ अपेक्षाएँ बन जाती हैं, और अपेक्षाएँ माँगें बन जाती हैं, तब दुःख अनिवार्य हो जाता है।
१२
दुःख से भागना उपाय नहीं है। दुःख को दबाना उपाय नहीं है। क्योंकि जो प्रश्न के साथ बैठ सकता है, वह अन्ततः उत्तर पाता है।
१३
स्वीकृति का अर्थ हार मान लेना नहीं है। स्वीकृति का अर्थ है यह जानना कि जो है वह है।
१४
जब दुःख आता है, और हम घबराते हैं, उसे दबाते हैं, या उससे भागते हैं, तब वह और गहरा होता जाता है। किन्तु जब उसके पास बैठते हैं, उसे देखते हैं, तब एक परिवर्तन होता है।
१५
जो रोग को पहचान लेता है, वह उससे डरना बन्द कर देता है। जो दुःख को पहचान लेता है, वह उससे मुक्त होने का मार्ग पा सकता है।
१६
जो व्यक्ति स्वयं पीड़ा से गुज़रा है, वह दूसरों की पीड़ा का सबसे गहरा मरहम बन सकता है।
१७
जो दुःख बिना जागरूकता के झेला जाए, वह तोड़ता है। जो दुःख एक प्रश्न के साथ झेला जाए, वह गढ़ता है।
१८
जो हुआ, वह हुआ। किन्तु उससे हम कौन सी कथा निकालते हैं, यह हमारे हाथ में है। तब वही दुःख जो कभी एक बन्द दरवाज़ा था, एक खुली खिड़की बन जाता है।
१९
मैं वाहन नहीं हूँ। मैं वह हूँ जो इस वाहन में बैठा है।
२०
यदि आप शरीर को देख सकते हैं, तो आप शरीर नहीं हैं। यदि आप मन को देख सकते हैं, तो आप मन नहीं हैं। यदि आप विचारों को देख सकते हैं, तो आप विचार नहीं हैं। यदि आप भावनाओं को देख सकते हैं, तो आप भावना नहीं हैं।
२१
जब "मैं" को चोट लगती है, तब दुःख होता है। जब "मेरा" खो जाता है, तब दुःख होता है। जब "मेरी" इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तब दुःख होता है।
२२
शरीर वह कहता है, जो मन चुप होकर रोता रहता है।
२३
आकाश सदा वैसा ही रहता है। बादल आते हैं, आकाश को ढकते हैं, किन्तु आकाश को बदल नहीं सकते। तूफ़ान के बाद भी आकाश वैसा ही है।
२४
मस्तिष्क बदल सकता है। और यदि मस्तिष्क बदल सकता है, तो मन बदल सकता है। और यदि मन बदल सकता है, तो जीवन बदल सकता है।
२५
जो पैटर्न पहचाना जाता है, वह बदला जा सकता है।
२६
क्रोध एक ऊर्जा है। यह बुरी ऊर्जा नहीं है। यह बताता है कि कुछ अनुचित हुआ है। यह एक सूचना है।
२७
जो व्यक्ति क्रोध का पात्र है, वह प्रायः शान्ति से बैठा होता है। और जो क्रोध में है, वह स्वयं जल रहा होता है।
२८
आसक्ति दुःख की सबसे उपजाऊ भूमि है। क्योंकि जो भी आसक्ति का पात्र है, वह अनित्य है। वह बदलेगा। वह जाएगा।
२९
संबंधों में दुःख अनेक बार इसलिए नहीं आता कि दूसरा व्यक्ति बुरा है। यह इसलिए आता है, क्योंकि हम अपने प्रेम को उस भाषा में व्यक्त नहीं कर पाते जो दूसरा समझे।
३०
क्षमा का अर्थ यह नहीं कि जो हुआ वह उचित था। यह दूसरे के लिए नहीं है। यह स्वयं के लिए है।
३१
अतीत के बारे में सोचकर उसे बदला नहीं जा सकता। जो हो गया, वह हो गया। उससे सीखा जा सकता है। किन्तु उसमें रहना केवल दुःख देता है।
३२
आनन्द इन सबसे सर्वथा भिन्न है। यह परिस्थितियों पर निर्भर नहीं। यह आत्मा का स्वभाव है। यह बाहर से नहीं आता, भीतर से प्रकट होता है।
३३
समता का अर्थ उदासीनता नहीं है। जो सफलता में उतना ही प्रसन्न है, जितना असफलता में दुःखी है, वह समता में नहीं है। और जो न सफलता में अहंकारित होता है, न असफलता में टूटता है, वह समता में है।
३४
आनन्द वह है, जो पहले से भीतर है। वह ढका हुआ है, अज्ञान की परतों के नीचे। जब ये परतें हटती हैं, तो आनन्द प्रकट होता है। यह उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि यह पहले से था।
३५
जो स्वयं के लिए जीता है, वह घटता जाता है। जो दूसरों के लिए जीता है, वह बढ़ता जाता है।
३६
जो प्रतिदिन कृतज्ञ हो सकता है, वह सदा सम्पन्न रहता है। क्योंकि सम्पन्नता वस्तुओं की मात्रा नहीं है।
३७
पतंजलि यह नहीं कह रहे, कि सुख से सन्तोष मिलता है। वे कह रहे हैं, कि सन्तोष से सुख मिलता है।
३८
शरणागति का अर्थ ज़िम्मेदारियाँ छोड़ना नहीं है। जो आपके हाथ में है, वह कीजिए। जो आपके हाथ में नहीं है, उसे समर्पित कीजिए।
३९
सच्ची शरणागति में कोई अपेक्षा नहीं होती। जो हो, वह स्वीकार। परिस्थिति बदले न बदले, शरणागत हृदय शान्त रहता है।
४०
जब "मैं कर रहा हूँ" की जगह "वह करा रहा है" आता है, तो कर्म की गुणवत्ता असाधारण हो जाती है।
४१
जो केवल फल पर ध्यान रखता है, वह सदा चिन्ता में रहता है, क्योंकि फल उसके हाथ में नहीं। जो केवल कर्म पर ध्यान रखता है, वह सदा शान्त रह सकता है, क्योंकि कर्म उसके हाथ में है।
४२
सच्चा सन्त कुछ माँगता नहीं। न धन, न यश, न अनुयायी, न शिष्य। जो माँगे, वह व्यापारी है, सन्त नहीं।
४३
जब दुःख आता है, तब एक पुकार भीतर से उठती है। और वह पुकार ही भक्ति का बीज है।
४४
जानना पर्याप्त नहीं। करना आवश्यक है।
४५
गुरु कोई जादूगर नहीं है, जो परिवर्तन कर दे। गुरु वह दीपक है, जो दूसरे दीपक को जलाता है।
४६
जब जीवन में कोई भी साधना नहीं हो सकती; जब समय नहीं है, जब मन भटका हुआ है; तब केवल यह कीजिए। तीन गहरी साँसें।
४७
जब यह जान लेते हैं, कि समय सीमित है, तो जो महत्त्वपूर्ण है, वह सामने आता है। जो गौण है, वह पीछे छूट जाता है। जो अनावश्यक है, वह स्वयं हट जाता है।
४८
कमल कीचड़ में उगता है। यदि कीचड़ न हो, तो कमल भी न हो।
४९
जब "मैं" था, तब हरि नहीं थे। और जब हरि आए, तो "मैं" नहीं रहा। प्रेम की गली इतनी साँकरी है, कि उसमें दो नहीं समा सकते।
५०
वह सत्य यह है; जो खोज रहे थे, वह तुम हो।