स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान

दुःख मस्तिष्क में कहाँ रहता है

डॉ. कृष्ण अवतार

ओ.पी.डी. में दो रोगी आते हैं। दोनों की एक जैसी बीमारी, एक जैसी जाँचें, एक जैसी औषधियाँ। किन्तु एक भीतर से टूट चुका है, और दूसरा मुस्कुराकर पूछता है, डॉक्टर साहब, परहेज़ क्या रखना है। पीड़ा दोनों की लगभग बराबर है; दुःख बराबर नहीं है।

एक न्यूरोलॉजिस्ट के लिए यह दृश्य एक प्रश्न बन जाता है। यदि पीड़ा शरीर की एक जैसी घटना है, तो दुःख कहाँ बनता है।

विज्ञान की ओर से

विज्ञान ने पीड़ा को समझने में बड़ी प्रगति की है, और उसमें एक बात विशेष ध्यान देने योग्य है। पीड़ा केवल एक तार नहीं है जो चोट से मस्तिष्क तक सन्देश ले जाए। शरीर से केवल सूचना आती है; अनुभव मस्तिष्क में रचा जाता है। और उस रचना में केवल चोट की सूचना नहीं होती; उसमें स्मृति, भय, अर्थ, और परिस्थिति भी घुल जाते हैं।

इसीलिए विज्ञान भी अब पीड़ा के दो पक्ष अलग करके देखता है; एक वह, जो संवेदना है, कि कहाँ, कितना चुभ रहा है; और दूसरा वह, जो उस संवेदना का कष्टभाव है, कि यह मेरे साथ क्यों, अब आगे क्या होगा। अनेक अध्ययन संकेत करते हैं कि ये दोनों पक्ष मस्तिष्क में एक ही स्थान पर नहीं सधते, और इनका घटना बढ़ना भी सदा साथ साथ नहीं होता। ध्यान, अर्थ, भय, अकेलापन; ये सब दूसरे पक्ष को घटा बढ़ा सकते हैं, जबकि चोट वही की वही रहती है।

सरल भाषा में; पीड़ा सूचना है, दुःख उस सूचना पर चली मन की कथा है। और कथा वहीं लिखी जाती है जहाँ स्मृति और भय रहते हैं।

ज्ञान क्या कहता है

अब वह वाक्य सुनिए जो हमारे शास्त्रों की परम्परा सहस्रों वर्षों से कहती आई है; पीड़ा शरीर को होती है, दुःख मन को। पीड़ा अनिवार्य है, दुःख वैकल्पिक है। मैं यह नहीं कहूँगा कि विज्ञान ने इस वाक्य को सिद्ध कर दिया है; ऐसा कहना विज्ञान और शास्त्र, दोनों के साथ अन्याय होगा। इतना अवश्य कहूँगा कि दोनों एक ही दिशा में देखते हुए प्रतीत होते हैं, और यह अनुनाद अपने आप में सुन्दर है।

शास्त्र इससे एक कदम आगे भी जाते हैं। वे कहते हैं कि जिस मन में दुःख की कथा लिखी जाती है, उस मन को देखने वाला भी भीतर कोई है। और जो देखने वाले में टिकना सीख लेता है, उसकी कथा छोटी होने लगती है।

अनुभव क्या सिखाता है

उन दो रोगियों में जो अन्तर था, वह किसी औषधि से नहीं आया था। वह अन्तर दृष्टि से आया था। और यही इस पूरे विषय की सबसे आशा भरी बात है। चोट, रोग, परिस्थिति; ये सदा हमारे हाथ में नहीं होते। किन्तु उन पर चलने वाली कथा में हमारा भी एक हस्ताक्षर होता है। और जहाँ हस्ताक्षर है, वहाँ अभ्यास से परिवर्तन है।

आज जब कोई कष्ट आए, तो एक क्षण रुककर केवल इतना पूछिए; इसमें कितनी पीड़ा है, और कितनी कथा।

सम्बन्धित सूत्र
"पीड़ा अनिवार्य है। दुःख वैकल्पिक है।"
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यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।