स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान

हम सुख क्यों खोजते हैं

डॉ. कृष्ण अवतार

एक क्षण के लिए रुककर देखिए; इस समय भी, इस पंक्ति को पढ़ते हुए भी, भीतर कोई खोज चल रही है। कुछ अच्छा लगे, कुछ मिल जाए, कहीं पहुँच जाएँ। मनुष्य ने भाषाएँ बदलीं, वेश बदले, युग बदले; यह खोज नहीं बदली। भूखा अन्न खोजता है, भरा पेट मान खोजता है, मान पाया हुआ अर्थ खोजता है। सीढ़ी की अन्तिम पायदान किसी ने नहीं देखी।

तो प्रश्न यह नहीं है कि सुख कैसे मिले। प्रश्न इससे गहरा है; हम सुख खोजते ही क्यों हैं। बिना किसी के सिखाए, जन्म के पहले दिन से।

ज्ञान क्या कहता है

उपनिषदों का उत्तर चौंकाने वाला है। वे कहते हैं कि प्राणी आनन्द से ही जन्मते हैं, आनन्द के ही बल पर जीते हैं, और अन्त में आनन्द की ही ओर लौट जाते हैं। अर्थात् सुख की खोज कोई दोष नहीं है, कोई रोग नहीं है; वह घर की स्मृति है। जैसे जल से निकली मछली तड़पती है, वैसे अपने स्वभाव से बिछड़ा मन तड़पता है।

भूल केवल पते की है। जो भीतर का धन है, उसे हम बाहर की दुकानों में खोजते हैं। इसीलिए हर प्राप्ति के बाद थोड़ी देर चैन मिलता है, और फिर वही खोज; क्योंकि दुकान बदलने से घर नहीं मिलता।

विज्ञान की ओर से

विज्ञान इस खोज को दूसरी दिशा से देखता है, और उसकी गवाही भी सुनने योग्य है। मस्तिष्क में एक अत्यन्त प्राचीन व्यवस्था है, जिसका काम ही यह है कि वह हमें उठाए, दौड़ाए, और हर उपलब्धि के बाद अगला लक्ष्य दिखा दे। जीवित रहने के लिए यही चाहिए भी था; जो जीव सन्तुष्ट होकर बैठ जाता, वह बचता नहीं।

और अध्ययन एक बात और संकेत करते हैं; सुख की हर नई परिस्थिति में मन कुछ समय बाद अभ्यस्त हो जाता है, और सुख का स्तर लगभग वहीं लौट आता है जहाँ पहले था। नया घर, नया पद, नई वस्तु; कुछ सप्ताह, कुछ मास, और फिर वही सामान्यता। विज्ञान इसे अनुकूलन कहता है। अर्थात् बाहर की सीढ़ी पर सुख टिकता नहीं, यह केवल शास्त्रों की घोषणा नहीं, नापी हुई बात भी है।

अनुभव क्या सिखाता है

चिकित्सा जीवन में मैंने वह भी देखा है जो सीढ़ी के ऊपरी छोर पर पहुँच चुके थे; जिनके पास वह सब था जिसकी सूची बनाकर हम दौड़ते हैं। उनमें से कई शान्त नहीं थे। और ऐसे भी देखे, जिनके पास सूची का कुछ नहीं था, और भीतर एक अटूट सन्तोष था। तब समझ आया कि खोज ग़लत नहीं थी; दिशा अधूरी थी।

आज एक छोटा प्रयोग कीजिए। जब कोई इच्छा उठे, तो एक क्षण पूछिए; मैं वास्तव में क्या चाह रहा हूँ, यह वस्तु, या वह चैन जो इसके मिलने की कल्पना में दिख रहा है। वस्तुएँ बदलती रहेंगी; चाह हर बार उसी चैन की है। और वह चैन जिस दिशा में है, उस दिशा का नाम भीतर है।

सम्बन्धित सूत्र
"आनन्द वह है, जो पहले से भीतर है। वह ढका हुआ है, अज्ञान की परतों के नीचे। जब ये परतें हटती हैं, तो आनन्द प्रकट होता है। यह उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि यह पहले से था।"
आगे के द्वार

यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।