स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान

तनाव शरीर में कहाँ छिपता है

डॉ. कृष्ण अवतार

साँझ को एक बार अपने ही शरीर का जायज़ा लीजिए। जबड़ा हल्का सा भिंचा हुआ, कन्धे कानों की ओर उठे हुए, माथे पर एक अदृश्य पट्टी सी कसी हुई, साँस छोटी। दिन भर में किसी ने आप पर आक्रमण नहीं किया; फिर शरीर मोर्चे पर क्यों खड़ा है।

उत्तर यह है कि मन के लिए बैठक की चिन्ता और जंगल का संकट, दोनों की भाषा एक ही है। और शरीर वह सिपाही है जो मन की हर अफ़वाह पर कवच पहन लेता है।

विज्ञान की ओर से

तनाव की व्यवस्था अपने आप में शत्रु नहीं है; वह रक्षक है। संकट के क्षण में वह हृदय को दौड़ाती है, माँसपेशियों को कसती है, और शरीर की दीर्घकालिक परियोजनाओं, जैसे पाचन और विश्राम, को कुछ देर के लिए स्थगित कर देती है। कठिनाई केवल एक है; यह व्यवस्था कुछ मिनटों के लिए बनी थी, और हमने इसे महीनों चलाना सीख लिया है।

अध्ययन संकेत करते हैं कि लगातार चलता तनाव नींद, पाचन, रक्तचाप और रोग प्रतिरोध, सब पर अपनी छाप छोड़ता है। और एक बात चिकित्सक की दृष्टि से विशेष; दबा हुआ तनाव प्रायः शब्दों में नहीं, लक्षणों में बोलता है। सिर की जकड़न, गर्दन कन्धों का दर्द, पेट की गड़बड़, थकान। मानो शरीर वह कह रहा हो, जो मन कहने से बचता रहा।

किन्तु यहीं एक सावधानी भी उतनी ही आवश्यक है; हर लक्षण को तनाव मान लेना भी भूल है। पहले उचित जाँच, फिर निष्कर्ष। तनाव का निदान अनुमान से नहीं, चिकित्सक की सम्यक् जाँच के बाद ही उचित है।

ज्ञान क्या कहता है

कठोपनिषद् शरीर को रथ कहता है; आत्मा रथी है, बुद्धि सारथी, मन लगाम, और इन्द्रियाँ घोड़े। यह रूपक तनाव के युग में नया अर्थ पाता है। रथ की देखभाल रथी का धर्म है; घोड़ों को दिन रात दौड़ाना वीरता नहीं, सारथी की असावधानी है।

और हमारी परम्परा ने विश्राम को कभी आलस्य नहीं कहा। सन्ध्या, मौन, शवासन, समर्पण; ये सब उसी की विधियाँ हैं। रात को सब कुछ उसके हाथों में सौंपकर सोना केवल भक्ति नहीं है; वह शरीर की सबसे गहरी चिकित्सा भी है।

अनुभव क्या सिखाता है

ओ.पी.डी. में ऐसे अनेक लोग आते हैं जिनकी जाँचें सामान्य निकलती हैं और कष्ट वास्तविक होता है। उनसे बातचीत में प्रायः रोग नहीं, दिनचर्या मिलती है; बिना विराम का काम, छोटी होती नींद, और फ़ोन के साथ बिस्तर तक चलती हुई दुनिया।

तीन छोटे नियम बड़ा अन्तर लाते हैं। पहला, दिन में दो तीन बार, दो मिनट का सच्चा विराम; केवल लम्बी साँसें, कन्धे ढीले, जबड़ा खुला। दूसरा, सोने का समय और सोने का स्थान, दोनों की मर्यादा; बिस्तर पर दुनिया नहीं। तीसरा, सप्ताह में कुछ घड़ियाँ ऐसी, जिनमें कोई प्रयोजन न हो; टहलना, सत्संग, मौन। शरीर को वेतन नहीं चाहिए; उसे केवल यह भरोसा चाहिए कि युद्ध हर समय नहीं है।

सम्बन्धित सूत्र
"शरीर वह कहता है, जो मन चुप होकर रोता रहता है।"
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यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।