प्रथम ग्रन्थ

यात्रा

दुःख से आनन्द की ओर
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आशीर्वचन

"सम्पूर्ण ग्रन्थ का अवलोकन करके हमने पाया है कि यह कृति सर्वजन के हित एवं सर्वजन के सुख के लिए है। उन्होंने लोगों के कल्याण की बात उन्हीं की भाषा में, पूर्णतया तर्कसंगत एवं युक्तियुक्त रूप में प्रस्तुत की है।"

श्रीमज्जगद्गुरु स्वामी श्री राजेन्द्र दास जी महाराज, श्री मलूक पीठ, वृन्दावन

यात्रा का पथ

पाँच पड़ाव

खण्ड एक

दुःख को जानना

अध्याय एक से चार

खण्ड दो

मैं और मेरा मन

अध्याय पाँच से आठ

खण्ड तीन

सुख और आनन्द को समझना

अध्याय नौ से ग्यारह

खण्ड चार

मुक्ति का मार्ग

अध्याय बारह से अठारह

खण्ड पाँच

परम कल्याण

अध्याय उन्नीस से बाईस

इनमें से किसी भी पड़ाव से प्रवेश किया जा सकता है; विस्तृत परिचय नीचे है।
ग्रन्थ परिचय

यह ग्रन्थ क्या है, किसके लिए है, और किस भाव से लिया जाए

यह कोई शास्त्र नहीं, एक मित्र का पत्र है। एक यात्री की ओर से दूसरे यात्री को, उस यात्रा का सहचर, जो दुःख से आनन्द की ओर जाती है। शास्त्रों की छाया में बैठकर, संतों की कृपा से सींचा गया, और थोड़े से अपने अनुभव के बीज से अंकुरित।

प्रथम संस्करण २०२६ · ५०२ पृष्ठ · रक्षा फाउंडेशन, देहरादून

नीचे पहले वे पाँच मूल प्रश्न हैं, जिनसे यह ग्रन्थ जन्मा। फिर तीन प्रतिज्ञाएँ, जो यह ग्रन्थ देता है। फिर उन प्रश्नों के पाँच संक्षिप्त संदेश। और अन्त में एक मित्र के बारह विनम्र निवेदन, जो स्पष्ट करते हैं कि इस यात्रा को किस भाव से लिया जाए।

पाँच मूल प्रश्न तीन प्रतिज्ञाएँ पाँच संदेश बारह निवेदन

जिन प्रश्नों से यह ग्रन्थ जन्मा

१ · पीड़ा और दुःख

पीड़ा और दुःख क्या हैं। क्या ऐसा सम्भव है कि जीवन की प्रतिकूलताओं की पीड़ा के रहते भी दुःख न हो।

२ · मैं कौन हूँ

दुःख जिसे होता है, वह "मैं" कौन है। क्या अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने से दुःख की जड़ कट सकती है।

३ · सुख और आनन्द

सुख, शान्ति, सन्तोष, और परम आनन्द क्या हैं। क्या ऐसा सुख सम्भव है, जो परिस्थितियों पर निर्भर न हो।

४ · समता और मार्ग

जीवन के उतार चढ़ाव में भीतर से समता कैसे आये। आनन्द की प्राप्ति का वास्तविक मार्ग कौन सा है।

५ · जीवन का लक्ष्य

जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है। क्या यहीं, अभी, इसी जीवन में परम कल्याण सम्भव है।

तीन प्रतिज्ञाएँ
एक

अनुकूल और प्रतिकूल के बीच भी एक समता आयेगी। आँधी रुके या न रुके, भीतर एक स्थिरता जन्म लेगी।

दो

पीड़ा आती जाती रहेगी, किन्तु वह कम दुःखदायी होगी। जो अभी शत्रु लगता है, वह एक दिन गुरु लगेगा।

तीन

उस आनन्द की यात्रा आरम्भ होगी, जो बाहर से नहीं, भीतर से उठती है। जो वर्षों से बाहर खोजा, वह भीतर था।

१ · पीड़ा को स्वीकार कीजिए, उसके ऊपर का बोझ मत लादिए। पीड़ा अनिवार्य है। दुःख वैकल्पिक है।

२ · अपने भीतर के साक्षी को पहचानिए। आप शरीर नहीं, मन नहीं। आप वह चेतना हैं, जो इन सबको देखती है।

३ · सच्चा आनन्द आपका अपना स्वभाव है। साधना उसे नया बनाने के लिए नहीं, उसे पहचानने के लिए है।

४ · करने में सदा सावधान, होने में सदा प्रसन्न। अनुकूल में अहंकार नहीं, प्रतिकूल में टूटना नहीं।

५ · परम कल्याण यहीं, अभी, इसी जीवन में सम्भव है। जो आप खोज रहे थे, वह आप हैं।

बारह निवेदन

यह ग्रन्थ किस भाव से लिया जाए, यह स्पष्ट करते बारह संकेत। प्रत्येक को स्पर्श करने पर उसका विस्तार खुलता है।

एक · पत्र, शास्त्र नहीं

यह एक मित्र का पत्र है, गुरु का उपदेश नहीं।

यह केवल एक साधक का पत्र है, जो अपनी यात्रा के कुछ पड़ावों पर रुककर लिखा गया। जहाँ शास्त्र का प्रत्यक्ष उद्धरण है, वहाँ शास्त्र की अधिकारिता है; शेष जहाँ है, वहाँ एक सहयात्री का स्वर है। एक सहयात्री का पत्र शास्त्रों एवं साधक के बीच एक सेतु बन सकता है। पाठक उस सेतु से चलकर शास्त्रों तक पहुँचे, यही इस ग्रन्थ की एकमात्र इच्छा है।

दो · अनेक संकेत

प्रश्न के सहस्र उत्तर सम्भव हैं, यह केवल कुछ संकेत देता है।

जब किसी प्रश्न का एक उत्तर होता है, तब वह प्रश्न छोटा होता है। जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों के अनेक उत्तर होते हैं, और उन सबको एक साथ मानना ही ज्ञान की पहली परिपक्वता है। यह उत्तर पुस्तिका नहीं, संकेत पुस्तिका है। संकेत दिशा दे सकते हैं, परन्तु पथ आपको स्वयं चलना होगा।

तीन · दो प्रमाण क्षेत्र

शास्त्र भीतर का ज्ञान, विज्ञान बाहर का। दोनों परस्पर पूरक।

शास्त्र चेतन सत्ता का अन्वेषण है, उसका प्रमाण आप्त वाक्य एवं स्वानुभव है। विज्ञान भौतिक संसार का अन्वेषण है। शास्त्र को विज्ञान की पुष्टि की किञ्चित मात्र भी आवश्यकता नहीं। विज्ञान केवल एक भाषाई सेतु है, परम्परा का प्रतिस्पर्धी नहीं।

चार · एक परम्परा

यह सनातन परम्परा से बोलता है, अन्य परम्पराओं के पूर्ण सम्मान सहित।

यह ग्रन्थ मुख्यतः वैष्णव विशिष्टाद्वैत परम्परा की दृष्टि से रचा गया है, जिसमें लेखक रामानन्दी सम्प्रदाय में दीक्षित है, और जिसके इष्ट भगवान श्री सीताराम हैं। परन्तु ऋग्वेद की एक प्रतीति सब की साझी है; एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति। स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज ने कहा था, सोने का सच्चा परखी गहनों में नहीं फँसता।

पाँच · पढ़ना एवं जीना

पढ़ने से सूचना आती है, जीने से ज्ञान आता है।

श्रवण, मनन, निदिध्यासन; यह ग्रन्थ केवल प्रथम स्तर का साधन है, श्रवण का। यदि पढ़कर यह लगे कि मैंने समझ लिया, तो यह सबसे बड़ा भ्रम होगा। यह संन्यास का आह्वान नहीं; गृहस्थ जीवन में रहते हुए ही यह यात्रा पूरी की जा सकती है। करने में सदा सावधान, होने में सदा प्रसन्न।

छह · गुरु अनिवार्य

यह ग्रन्थ गुरु का विकल्प नहीं, उनकी ओर एक कोमल संकेत है।

जो साधक गहन साधना की ओर बढ़ना चाहें, उनसे करबद्ध निवेदन है कि वे एक प्रामाणिक गुरु का आश्रय अवश्य लें। जिनके पास साक्षात गुरु नहीं, उनके लिए सद्ग्रन्थ ही प्रथम गुरु हैं। विशेष रूप से स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज की वाणी अनेक एकाकी साधकों के लिए प्रथम गुरु बनी है। यह ग्रन्थ गुरु का स्थानापन्न नहीं है।

सात · सब के लिए

हर इष्ट, हर परम्परा, हर वर्ग, हर आयु, सबको खुला निमन्त्रण।

जब भगवान शब्द आता है, तो पाठक अपने अपने इष्ट का स्मरण करते हुए इसे पढ़ें। यह यात्रा किसी एक वर्ग, लिङ्ग, जाति, अथवा धर्म की बपौती नहीं। दुःख सब को होता है, आनन्द की पुकार सब के भीतर है। जात पाँत पूछै नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।

आठ · असहमति स्वागत

जो प्रश्न उठाता है, वही उत्तर के निकट जाता है।

यह ग्रन्थ अन्तिम सत्य का दावा नहीं करता। इसे एक संवाद की भाँति लें, उपदेश की भाँति नहीं। जो हर बात पर सहमत हो जाता है, वह केवल अनुयायी बनता है, साधक नहीं। और एक विशेष निमन्त्रण उनके लिए जो ईश्वर में विश्वास नहीं रखते; यह ग्रन्थ आपके लिए भी है, क्योंकि दुःख सब को होता है।

नौ · क्रमिक यात्रा

एक वर्ष की निरन्तर साधना दस वर्ष के बौद्धिक अध्ययन से अधिक देती है।

एक सप्ताह में योग, एक माह में शान्ति; ये वादे आधुनिक स्व सहायता बाजार के हैं, साधना के नहीं। पतंजलि का सूत्र है, स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारासेवितो दृढभूमिः। धैर्य रखें। यह क्रमिकता ही साधना का सौंदर्य है।

दस · शास्त्र एवं चिकित्सा

साधना चिकित्सा का स्थानापन्न नहीं, उसकी पूरक है।

जो पाठक गहन मानसिक संकट में हैं, उनसे करबद्ध निवेदन है कि वे एक अनुभवी मनोचिकित्सक अथवा मनोवैज्ञानिक से अवश्य मिलें। लेखक स्वयं एक न्यूरोलॉजिस्ट है, और स्पष्ट करता है; पेशेवर सहायता लेना दुर्बलता नहीं, विवेक है। दवा एवं ध्यान, चिकित्सा एवं साधना, साथ साथ चल सकते हैं।

ग्यारह · आर्थिक स्पष्टता

यह ग्रन्थ बेचने के लिए नहीं, साझा करने के लिए लिखा गया है।

इस ग्रन्थ से लेखक का कोई व्यक्तिगत आर्थिक उद्देश्य नहीं। रॉयल्टी एवं अन्य प्राप्तियाँ रक्षा फाउंडेशन के माध्यम से साधना सेवा एवं समाज कल्याण के कार्यों में नियोजित होंगी। जो पाठक ग्रन्थ नहीं खरीद सकते, उनके लिए डिजिटल रूप में निःशुल्क पीडीएफ़ उपलब्ध रहेगी।

बारह · एक हल्की रात

यदि एक भी रात्रि किसी की हल्की हो जाए, यह यात्रा सार्थक है।

जो भी सत्य इन पन्नों में है, वह आचार्यों, शास्त्रों, संतों, और परम्परा का है; लेखक केवल माध्यम है। यदि किसी एक पाठक की किसी एक रात्रि में, जब मन भारी हो, इस ग्रन्थ की कोई एक पंक्ति एक छोटा सा दीपक जला दे, तो यह ग्रन्थ अपनी पूरी यात्रा सफल मानेगा। यह ग्रन्थ पाठक को लेखक की ओर न खींचे, यह आन्तरिक प्रार्थना है। यदि कुछ खींचे, तो शास्त्र की ओर, परम्परा की ओर, और उस अन्तर्यामी की ओर, जो प्रत्येक हृदय में पहले से विराजमान है।

दुःख तुम्हारा शत्रु नहीं है। वह उस आनन्द की पुकार है, जो तुम्हारे भीतर सदा से था।

बारह निवेदन। बाईस आधार शब्द।

बाईस अध्याय। पाँच खण्ड। पाँच परिशिष्ट।

यह संख्यात्मक संरचना आकस्मिक नहीं है। प्रत्येक संख्या के पीछे एक भाव है, एक क्रम है, एक यात्रा का चित्र है। जब आप इस यात्रा को पूर्ण करेंगे, तब इन संख्याओं की भीतरी एकता आपको दिखेगी।

आशीर्वचन (पुस्तक के पिछले आवरण से, अक्षरशः)

“सम्पूर्ण ग्रन्थ का अवलोकन करके हमने पाया है कि यह कृति सर्वजन के हित एवं सर्वजन के सुख के लिए है। उन्होंने लोगों के कल्याण की बात उन्हीं की भाषा में, पूर्णतया तर्कसंगत एवं युक्तियुक्त रूप में प्रस्तुत की है।”

श्रीमज्जगद्गुरु स्वामी श्री राजेन्द्र दास जी महाराज, श्री मलूक पीठ, वृन्दावन