आगामी ग्रन्थ

शरणागति

जीवन के सबसे बड़े प्रश्न के उत्तर

जीवन के सबसे बड़े प्रश्न के उत्तर

सनातन परम्परा से विश्व के सभी धर्मों, दर्शनों एवं आधुनिक विज्ञान तक। समर्पण, आश्रय एवं परम कल्याण का मार्ग।

निर्माणाधीन मंगलाचरण सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

– श्रीमद्भगवद्गीता १८.६६

समस्त धर्मों को छोड़कर तुम केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

यह वचन ही इस ग्रन्थ की आत्मा है।

हर मनुष्य के हृदय की चार पुकारें
  • मैं कौन हूँ?
  • मुझे क्या चाहिए?
  • मेरे जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है?
  • मेरा सच्चा कल्याण किसमें है?

इन्हीं चार प्रश्नों का सर्वांगीण उत्तर इस ग्रन्थ में है।

एक दृष्टि में सम्पूर्ण ग्रन्थ

  • ७१ · अध्याय
  • ७ · खण्ड
  • ६ · परिशिष्ट
  • १० · +
  • धर्म एवं दर्शन
  • १०० · +
  • विश्व सन्त

एक परम सत्य की अनेक भाषाओं में पुकार।

जिनका यह ग्रन्थ उत्तर देता है

  • क्या दुःख से आत्यन्तिक मुक्ति सम्भव है? हाँ, शरणागति में
  • क्या शाश्वत सुख मनुष्य के लिए उपलब्ध है? हाँ, शरणागति में
  • क्या जीवन का परम कल्याण साधा जा सकता है? हाँ, शरणागति में

उत्तर एक ही शब्द में निहित है। शरणागति।

१ · दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति

तीनों तापों से शाश्वत मुक्ति

२ · शाश्वत सुख की प्राप्ति

जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं

३ · परम कल्याण

धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की पूर्णता

ये तीनों एक ही शरणागति के तीन रूप हैं।

शरणागति क्या है, और क्या नहीं

शरणागति क्या है

  •  मैं भगवान का हूँ, यह स्थिर बोध
  • जो हो रहा है, उसकी ही व्यवस्था है
  • अपने बोझ को उसके चरणों में रखना
  • करने में सावधान, होने में प्रसन्न
  • अहंकार का स्वाभाविक विसर्जन
  • हृदय में सतत प्रेम की धारा

शरणागति क्या नहीं है

  • अपराजेय शक्ति, कमज़ोरी नहीं
  • जागरूक कर्मयोग, निष्क्रियता नहीं
  • नित्य अभ्यास, एक बार की घटना नहीं
  • जीवन की प्रत्येक श्वास, केवल विपत्ति में नहीं
  • विवेक से समर्पण, विचार छोड़ना नहीं
  • हर मनुष्य के लिए, केवल भक्तों के लिए नहीं

ये सब एक ही भाव की भिन्न भिन्न झलकें हैं।

शरणागति के छह अंग

षडंग प्रपत्ति

१ · आनुकूल्य संकल्प

जो भगवान को प्रिय हो, वह करने का संकल्प

२ · प्रातिकूल्य वर्जन

जो भगवान को अप्रिय हो, उसका त्याग

३ · रक्षिष्यति इति विश्वास

वह मेरी रक्षा करेंगे, यह दृढ़ विश्वास

४ · गोप्तृत्व वरण

उन्हीं को रक्षक मानने का निश्चय

५ · आत्मनिक्षेप

स्वयं को सब अंगों के साथ उन्हें सौंपना

६ · कार्पण्य

मैं असमर्थ हूँ, यह ईमानदार स्वीकृति

एक ही प्रेम के पाँच मधुर रंग

शरणागति के पाँच रसमय भाव

शान्त

गहरी शान्ति का परम विश्राम

दास्य

हनुमान् सम सेवा का भाव

सख्य

अर्जुन सम सखा भाव

वात्सल्य

यशोदा सम वात्सल्य

माधुर्य

मीरा एवं राधा सम प्रेम

एक सत्य, अनेक भाषाएँ

सब परम्पराओं और विज्ञान की साक्षी

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति

सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक प्रकार से कहते हैं।

ऋग्वेद १.१६४.४६

  • सनातन
  • शरणागति
  • इस्लाम
  • तवक्कुल
  • ईसाई
  • Surrender
  • बौद्ध
  • त्रिशरण
  • सिख
  • हुकम
  • ताओ
  • वू वेइ

एक ही पुकार सारे विश्व में गूँज रही है।

आधुनिक विज्ञान की पुष्टि भी इसी ओर संकेत करती है।

साइकोन्यूरोइम्यूनोलॉजी अनुसन्धान हृदय मस्तिष्क सामंजस्य डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क की शान्ति आघात उपचार में आधुनिक मनोचिकित्सा प्रवाह अवस्था का शोध सकारात्मक मनोविज्ञान में कृतज्ञता एवं समभाव

शास्त्र की वाणी विज्ञान की भाषा में भी सत्य है।

उन्होंने जिया, उनसे यह पथ खुला है

  • हनुमान् जी
  • अनन्य सेवा
  • विभीषण
  • शास्त्र शरण
  • द्रौपदी
  • आर्त पुकार
  • गजेन्द्र
  • अन्तिम क्षण समर्पण
  • मीराबाई
  • प्रेम पराकाष्ठा
  • तुलसीदास
  • दास्य भाव
  • रूमी
  • इश्क़ की शरण
  • रामकृष्ण
  • माँ काली में लीन

ग्रन्थ की रूपरेखा

  • प्रथममूल भूत प्रश्न एवं ईश्वर शरणागति
  • द्वितीयशरणागति की पूर्ण समझ एवं साधन
  • तृतीयशास्त्र एवं ग्रन्थों में शरणागति
  • चतुर्थदर्शन परम्पराओं में शरणागति
  • पंचमविश्व धर्म एवं विज्ञान की दृष्टि
  • षष्ठसाधन का व्यावहारिक मार्ग
  • सप्तमतीन महाफल एवं जीवन्त उदाहरण

किसी समूह को स्पर्श करने पर उसके अध्याय खुलते हैं।

१ से ७ · नींव, ईश्वर एवं शरणागति का स्वरूप

१ · मैं कौन हूँ
२ · जगत क्या है
३ · ईश्वर है
४ · ईश्वर की अवधारणा
५ · शरणागति क्यों
६ · शरणागति की परिभाषा
७ · सच्चाई एवं भ्रान्तियाँ

८ से १३ · अहंकार से समर्पण की ओर

८ · शरणागति के सूत्र
९ · दुःख से आनन्द
१० · मेरी असमर्थता
११ · भगवत् प्रेम
१२ · अनसुनी प्रार्थना
१३ · प्रार्थना एवं ध्यान

१४ से १८ · साधना के व्यावहारिक मार्ग

१४ · नामजप
१५ · गुरु शरणागति
१६ · जीवन के विशेष प्रसंग
१७ · समाज, कला, सेवा
१८ · सत्संग

१९ से २४ · योग एवं विश्व परम्पराओं की दृष्टि

१९ · तीनों योगों का समन्वय
२० · स्वरूप, आस्था, संशय
२१ · व्यावहारिक समस्याएँ
२२ · गहन प्रश्न
२३ · शरणागति के स्तर
२४ · विश्व परम्पराओं का परिचय

२५ से ३२ · वैदिक एवं पौराणिक शास्त्रों में शरणागति

२५ · वेद
२६ · उपनिषद्
२७ · ब्रह्मसूत्र
२८ · श्रीमद्भगवद्गीता
२९ · श्रीमद्भागवत
३० · वाल्मीकि रामायण
३१ · रामचरितमानस
३२ · महाभारत

३३ से ३८ · षड्दर्शन एवं आचार्य त्रय

३३ · सांख्य योग
३४ · न्याय वैशेषिक
३५ · मीमांसा
३६ · आदि शंकराचार्य
३७ · रामानुज एवं रामानन्द
३८ · मध्वाचार्य

३९ से ४३ · वैष्णव सम्प्रदायों में शरणागति

३९ · श्री सम्प्रदाय
४० · ब्रह्म सम्प्रदाय
४१ · रुद्र सम्प्रदाय
४२ · सनक सम्प्रदाय
४३ · गौड़ीय वैष्णव

४४ से ४९ · शैव, शाक्त एवं भक्ति परम्पराएँ

४४ · शैव दर्शन
४५ · शाक्त परम्परा
४६ · उत्तर भारतीय भक्ति
४७ · वारकरी परम्परा
४८ · दक्षिण भारत के सन्त
४९ · बंगाल की भक्ति

५० से ५७ · विश्व के धर्मों में शरणागति

५० · बौद्ध धर्म
५१ · इस्लाम
५२ · सूफी परम्परा
५३ · ईसाई धर्म
५४ · सिख धर्म
५५ · जैन दर्शन
५६ · ताओ एवं यहूदी
५७ · पारसी धर्म

५८ से ६१ · पाश्चात्य दर्शन एवं आधुनिक विज्ञान

५८ · प्राचीन एवं मध्यकालीन पाश्चात्य
५९ · आधुनिक पाश्चात्य
६० · मनोविज्ञान
६१ · तंत्रिका विज्ञान

६२ से ६६ · साधना का व्यावहारिक प्रकटीकरण

६२ · अहंकार का विश्लेषण
६३ · पूर्व भूमिका
६४ · क्रमिक छह चरण
६५ · साधना के माध्यम
६६ · विकृतियाँ एवं सावधानी

६७ से ७१ · तीन महाफल एवं अन्तिम संवाद

६७ · दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति
६८ · शाश्वत सुख की प्राप्ति
६९ · परम कल्याण
७० · जीवन्त उदाहरण
७१ · पाठक से अन्तिम संवाद

एक

प्रार्थना, दैनिक स्मरण

दो

चिकित्सक का सबसे प्रभावशाली उपकरण उसकी वाणी है, और सबसे उपेक्षित उपकरण भी वही है।

तीन

शरणागति की महाप्रार्थनाएँ

चार

तीस दिवसीय साधना योजना

पाँच

मुख्य ग्रन्थों की प्रामाणिक सूची

छह

विश्व भाषाओं का पारिभाषिक कोश

समर्पण

परम पूज्य स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज के पावन श्रीचरणों में

इस ग्रन्थ का प्रत्येक शब्द उन्हीं की कृपा है, उन्हीं की वाणी का प्रतिबिम्ब है, उन्हीं की चरण रज है। जो भी सत्य इन पृष्ठों में है, वह उनका है। जो भी न्यूनता है, वह केवल लेखक की है।

यह ग्रन्थ केवल पढ़ने के लिए नहीं है। यह जीने के लिए है। जिस दिन एक भी सूत्र आपके भीतर जागृत हो जाएगा, उसी दिन यह ग्रन्थ अपना उद्देश्य पूर्ण कर लेगा।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥"

सब सुखी हों, सब निरोग हों, सब का कल्याण हो, कोई भी दुःख का भागी न हो।
॥ हरिः ॐ तत् सत् ॥

शरणागति

जीवन के सबसे बड़े प्रश्न के उत्तर
संरचना; सात खण्ड, इकहत्तर अध्याय, एवं छह परिशिष्ट।