विचार एवं लेख

दैनिक प्रार्थना

प्रातः पाँच मिनट का स्मरण, और रात्रि का छोटा समर्पण पाठ।

प्रातः एवं रात्रि का समर्पण पाठ

दिन का आरम्भ एक स्मरण से, और दिन का अन्त एक समर्पण से। ये दो छोटे पाठ हृदय को प्रतिदिन उसी एक आश्रय की ओर लौटाते हैं।

प्रातः उठते ही पाँच मिनट का यह स्मरण, और रात्रि सोने से पूर्व यह छोटा समर्पण। न कोई विधि, न कोई कठिनाई। केवल हृदय से इन शब्दों को धीरे धीरे पढ़ना, और उस भाव में कुछ क्षण ठहर जाना।

भाग एक

पाँच मिनट का प्रातः स्मरण पाठ

हे प्रभु, आज का यह नया दिन आपका दिया हुआ है। यह शरीर आपका है, यह प्राण आपके हैं, यह बुद्धि आपकी है, यह समय आपका है, यह जीवन आपका है। मैं आज प्रातः उठते ही सबसे पहले यह स्मरण करना चाहता हूँ कि मैं केवल आपका हूँ, और केवल आप ही मेरे हैं। संसार के सब संबंध अपने स्थान पर हैं, पर अंतिम आश्रय केवल आप हैं। जो बदलते हैं, वे मेरे उपयोग और सेवा के क्षेत्र हैं। जो कभी नहीं बदलते, वे आप हैं। इसलिए आज मैं अपने मन को फिर आपके चरणों में टिकाना चाहता हूँ।

हे प्रभु, मुझे यह स्मरण रहे कि मैं केवल यह शरीर नहीं हूँ। यह शरीर बदलता है, थकता है, रोग पाता है, सुख दुःख से गुजरता है, पर मैं इससे परे आपका अंश, शुद्ध आत्मस्वरूप हूँ। यह शरीर भोग के लिए नहीं, सेवा के लिए मिला है। यह दिन भी मेरे निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि आपके स्मरण, निष्काम कर्तव्य और लोकहित के लिए मिला है। आज मैं अपने इस शरीर, वाणी, मन, बुद्धि और कर्म को सेवा का माध्यम बनाना चाहता हूँ। सेवा के लिए सब अपने हैं, पर अधिकार के लिए कुछ भी मेरा नहीं है। मुझे यह सच आज बार बार याद रहे।

हे प्रभु, मुझे यह भी याद रहे कि आप कभी साथ नहीं छोड़ते, और यह शरीर संसार कभी स्थायी साथ नहीं रहते। जो आज है, वह बदल जाएगा। जो प्रिय है, वह भी अनित्य है। जो दुःख है, वह भी अनित्य है। जो सुख है, वह भी अनित्य है। इसलिए आज मैं बदलती हुई वस्तुओं में शाश्वत सुरक्षा नहीं खोजूँगा। मेरा मन कहीं भी टिके, अंततः आपका ही हो। मेरा आधार बाहर की घटनाएँ नहीं, आपका अखंड साथ हो। जब मैं व्यस्त हो जाऊँ, तब भी भीतर यह स्मृति जीवित रहे कि मैं अकेला नहीं हूँ।

हे प्रभु, आज मैं यह संकल्प करता हूँ कि मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए, आपके प्रेम, आपके स्मरण और आपकी भक्ति के अलावा। यदि कुछ करना है, तो आपके दिए हुए इस शरीर द्वारा संसार की निस्वार्थ सेवा ही करनी है। मुझे आज मान नहीं चाहिए, प्रतिष्ठा नहीं चाहिए, किसी पर अधिकार नहीं चाहिए, अपनी इच्छा की जीत नहीं चाहिए। यदि कुछ चाहिए, तो इतना ही कि मैं आपके अनुकूल जी सकूँ, आपके विपरीत नहीं। मेरे कर्मों में ‘मेरे लिए’ कम हो और ‘आपके लिए’ अधिक हो। मेरी वाणी से किसी को दुःख न पहुँचे। मेरी दृष्टि में अहंकार न हो। मेरे व्यवहार में कठोरता न हो। मेरे कर्तव्य में आलस्य न हो। मेरे सेवा भाव में दिखावा न हो।

हे प्रभु, आप अभी हैं, यहीं हैं, मेरे भीतर भी हैं, मेरे चारों ओर भी हैं, और मेरे अत्यन्त अपने हैं। आज मैं जहाँ भी जाऊँ, जो भी करूँ, जिस भी व्यक्ति से मिलूँ, यह स्मरण न छूटे कि मैं आपके सामने ही जी रहा हूँ। यदि मुझे कोई कठिन निर्णय लेना पड़े, तो आप मेरे विवेक में रहिए। यदि मन डगमगाए, तो आप मेरे धैर्य में रहिए। यदि मोह आए, तो आप मेरे स्मरण में रहिए। यदि क्रोध उठे, तो आप मेरी चेतना को जगा दीजिए। यदि भय आए, तो मुझे अपने आश्रय का बोध करा दीजिए। यदि दुःख आए, तो मुझे आपसे दूर न होने दीजिए।

हे प्रभु, हम जैसे भी हैं, आपके ही हैं। हमारे दोषों सहित भी हम आपके हैं। और आप जैसे भी हैं, हमारे हैं। हमें आपकी कृपा को समझने की सामर्थ्य भले न हो, पर हमें आपकी शरण में जीना सीखना है। आज का यह दिन मैं आपके दरबार में, आपकी दी हुई वस्तुओं से आपकी ही सेवा करते हुए बिताना चाहता हूँ। मैं कुछ लेकर नहीं, कुछ लौटाकर जीना चाहता हूँ। मैं संसार से भागूँ नहीं, पर संसार में फँसू भी नहीं। मैं संबंध निभाऊँ, पर स्वामित्व न पालूँ। मैं कर्म करूँ, पर फल पर अपना कब्ज़ा न जमाऊँ।

हे प्रभु, मैं आपका शरणागत हूँ। आज आप जैसे रखें, उसी में मेरा कल्याण है। यह होना चाहिए, यह नहीं होना चाहिए, यही आग्रह सारे दुःखों का घर है। इसलिए आज मैं प्रयत्न करूँगा, कर्तव्य निभाऊँगा, सेवा करूँगा, धर्मपूर्वक चलूँगा, पर परिणाम आपके हाथ में छोड़ना सीखूँगा। यदि सफलता मिले, तो अभिमान न हो। यदि असफलता मिले, तो निराशा न हो। यदि मान मिले, तो मैं बह न जाऊँ। यदि अपमान मिले, तो मैं टूट न जाऊँ। यदि सुविधा मिले, तो मैं आपको न भूलूँ। यदि कठिनाई मिले, तो मैं आपसे मुँह न मोड़ूँ।

हे प्रभु, आज का यह दिन आपके चरणों में अर्पित है। मेरी सोच, मेरी चाल, मेरी वाणी, मेरा कर्म, मेरी सेवा, मेरा मौन, मेरा श्रम, मेरी थकान, मेरा धैर्य, मेरी भूल, मेरा सुधार, सब आपके हैं। मुझे आज इतना कृपापूर्वक सँभालिए कि मैं दिन के अंत में यह कह सकूँ कि मैं भटका अवश्य, पर लौटा भी; गिरा अवश्य, पर स्मरण नहीं छोड़ा; काम में गया, पर आपको खोया नहीं। यही मेरा प्रातः संकल्प है। यही मेरा आज का साधक धर्म है।

रात्रि का छोटा समर्पण पाठ

हे प्रभु, दिन भर मैं संसार में लगा रहा, पर अब मैं लौटकर आपके सामने खड़ा हूँ। जो कुछ आज हुआ, वह सब आपकी दृष्टि में हुआ। जो ठीक हुआ, वह आपकी कृपा से हुआ। जो गलत हुआ, उसमें मेरी असावधानी, मेरा अहंकार, मेरी भूल, मेरी अशुद्धि, मेरी अधीरता और मेरा विस्मरण था। अब मैं इस पूरे दिन को आपके चरणों में रखता हूँ। मैं अपने को छिपाकर नहीं, बल्कि सत्य रूप में आपके आगे उपस्थित करता हूँ।

हे प्रभु, आज जहाँ जहाँ मैं आपको भूल गया, वहाँ मुझे क्षमा कीजिए। जहाँ मेरे भीतर मान उठा, उसे शुद्ध कीजिए। जहाँ मुझे चोट लगी, वहाँ मुझे आपके आश्रय का बोध दीजिए। जहाँ मैं क्रोधित हुआ, वहाँ मेरे हृदय को कोमल कीजिए। जहाँ मैं भयभीत हुआ, वहाँ मुझे यह याद दिलाइए कि आप कभी साथ नहीं छोड़ते। जहाँ मैं दुखी हुआ, वहाँ मुझे यह समझ दीजिए कि अनित्य वस्तु को नित्य मान लेने से ही शोक जन्म लेता है। जहाँ मैं सेवा कर सका, वह भी आपकी ही शक्ति से हुआ। जहाँ मैं सेवा न कर सका, वहाँ मुझे कल के लिए सजग कीजिए।

हे प्रभु, मैं केवल आपका हूँ, और केवल आप ही मेरे हैं। दिन भर का सारा बोझ अब मैं अपने सिर पर नहीं रखना चाहता। यह शरीर आपका है, यह मन आपका है, यह बुद्धि आपकी है, यह थकान आपकी है, यह श्वास आपकी है। मैं इन्हें फिर आपके हाथ में सौंपता हूँ। यदि आज किसी ने मेरा मान किया, वह भी आपका था। यदि किसी ने अपमान किया, उससे भी मेरा अहंकार ही टूटा। यदि कहीं सफलता मिली, तो वह आपकी कृपा से मिली। यदि कहीं असफलता मिली, तो उसमें भी कोई शिक्षा छिपी होगी। अब मैं दिन का लेखा आपके सामने समाप्त करता हूँ। मुझे रात भर अपने आश्रय में रखिए।

हे प्रभु, मेरे भीतर जो भी अशांत तरंगें अब भी उठ रही हों, उन्हें धीरे धीरे शांत कर दीजिए। यदि कोई भय शेष हो, तो उसे अपने नाम में विश्राम दीजिए। यदि कोई चिंता शेष हो, तो उसे अपनी इच्छा में छोड़ना सिखाइए। यदि कोई शोक शेष हो, तो मुझे अपनी सन्निधि में रो लेने दीजिए। यदि कोई ग्लानि हो, तो मुझे सच्चे पश्चाताप और शुद्ध संकल्प की दिशा दीजिए, आत्मदमन की नहीं। यदि मेरा मन अभी भी इधर उधर भाग रहा हो, तो उसे कोमलता से वापस बुला लीजिए। मैं लड़ते लड़ते नहीं, आपकी गोद में टिकते टिकते सोना चाहता हूँ।

हे प्रभु, हम जैसे भी हैं, आपके ही हैं। हमारे दोषों सहित भी हम आपके हैं। इसलिए आज की रात्रि में मैं अपनी कमजोरी सहित अपने को आपको सौंपता हूँ। मैं यह दावा नहीं करता कि मैं बहुत बड़ा साधक हूँ। मैं केवल इतना जानता हूँ कि मेरे पास लौटने के लिए आपके सिवा कोई अंतिम आश्रय नहीं है। आप जैसे भी रखें, जैसे भी सँभालें, जैसे भी शुद्ध करें, वही मेरे लिए शुभ है। अब मैं अपने दिन, अपने मन, अपने शरीर, अपने भय, अपने भविष्य, अपने अपूर्ण प्रयास, अपनी साधना, अपने संबंध, सब आपको समर्पित करता हूँ।

हे प्रभु, जब तक यह शरीर जागता है, तब तक भी आप मेरे हैं। जब यह सो जाएगा, तब भी आप मेरे हैं। नींद में भी मेरी श्वास आपकी है। यदि रात शांत बीते, तो भी आपकी कृपा। यदि रात बेचैन बीते, तो भी आपकी ही शरण। मैं अब अपने को आपके हाथ में रखकर विश्राम करना चाहता हूँ। मुझे ऐसी रात्रि दीजिए जिसमें शरीर विश्राम पाए, मन थोड़ा हल्का हो, और आत्मा आपके स्मरण में भीगी रहे।

हे प्रभु, जो कुछ मेरा नहीं था, उसे मैं छोड़ता हूँ। जो आपका था, उसे मैं आपको लौटाता हूँ। जो मैं सँभाल नहीं सकता, उसे मैं आपके हवाले करता हूँ। जो बोझ मैं ढोते ढोते थक गया हूँ, उसे मैं आपके चरणों में रखता हूँ। अब मैं सोने नहीं, आपके भरोसे विश्राम करने जा रहा हूँ। मुझे रात भर अपने प्रेम, अपने संरक्षण और अपनी मौन उपस्थिति में धारण किए रखिए।

मैं केवल आपका हूँ,
और केवल आप ही मेरे हैं।
ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः दुःख से आनन्द की ओर
दैनिक प्रार्थना · शरणागति ग्रन्थ से