विचार एवं लेख

संकट सहायता निर्देशिका

यदि इस समय बहुत कठिन घड़ी है, तो कृपया अकेले मत रहिए। यहाँ उपदेश नहीं है; केवल तुरन्त काम आने वाले मार्ग और हेल्पलाइन हैं। दूरभाष क्रमांक छूते ही कॉल लगेगी।

यह पृष्ठ उन क्षणों के लिए है, जब पूरी पुस्तक का अध्ययन सम्भव न हो। जब हृदय भारी है, मन व्यथित, और तत्काल कुछ चाहिए जो हाथ थामे।

आप अकेले नहीं हैं।

आपातकालीन सहायता

यदि अभी इसी क्षण कठिन विचार आ रहे हों

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  • राष्ट्रीय आपातकाल: 112
  • आई कॉल: हिन्दी, निःशुल्क, प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक सहायता 9152987821
  • वंद्रेवाला फ़ाउंडेशन: चौबीस घंटे, सभी भाषाएँ 1860 2662 345
  • महिला हेल्पलाइन: 181
  • महिला पुलिस हेल्पलाइन: 1091
  • चाइल्डलाइन, बच्चों के लिए: 1098

इन सेवाओं में प्रशिक्षित लोग आपकी बात सुनते हैं। फोन उठाने वाला आपको दोष नहीं देगा। केवल सुनेगा। आप अकेले नहीं हैं। कोई आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।

यहाँ नौ प्रकार के संकटों के लिए मार्ग दिए गए हैं। प्रत्येक खण्ड स्वतन्त्र है; क्रम में पढ़ने की आवश्यकता नहीं। यदि आप अभी संकट में हैं, सीधे अपनी स्थिति वाले खण्ड पर जाइए। प्रत्येक खण्ड में तीन वस्तुएँ मिलेंगी; एक तत्काल आधार, एक केन्द्रीय दृष्टि, और सम्बन्धित अध्याय का एक संकेत।

अपनी स्थिति चुनिए

आप अभी किससे गुज़र रहे हैं

यदि न जानें कौन सा खण्ड, अथवा एक से अधिक संकट साथ आ रहे हों, तो सीधे खण्ड नौ से आरम्भ कीजिए।

एक: जब प्रियजन चले जाएँ

जो गया है, वह अकेले नहीं गया; आपका हृदय भी उसके साथ कुछ छोड़ चुका है। यह जो खालीपन है, यह उनकी अनुपस्थिति का चिह्न है। यह पीड़ा प्रेम की गहराई का प्रमाण है, दुर्बलता नहीं। जिनसे गहरा प्रेम होता है, उन्हें खोने पर ऐसी पीड़ा स्वाभाविक है।

इस क्षण में

शान्त बैठिए। दोनों पाँव भूमि पर रखिए। पाँच वस्तुएँ गिनिए जिन्हें आप छू रहे हैं; जूता, फ़र्श, अपना वस्त्र, अपना हाथ अपनी जाँघ पर। केवल पाँच। यह छोटा सा अभ्यास उस झंझावात से, जो भीतर चल रहा है, थोड़ी सी दूरी बनाता है।

रोना स्वाभाविक है। शोक रैखिक नहीं है; पाँच चरणों का सिद्धान्त एक मार्गदर्शिका है, नियम नहीं। आप किसी भी क्रम में, किसी भी अवस्था में लौट सकते हैं। एक दिन शान्ति, अगले दिन फिर अश्रु। यह सब सामान्य है।

स्मरण रखिए

प्रेम मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होता। जो भीतर है, वह भीतर ही रहता है। संबंध बदलते हैं, समाप्त नहीं होते।

विस्तार के लिए अध्याय उन्नीस एवं तेरह।

रोग शत्रु नहीं है। यह केवल शरीर एवं मन का एक संकेत है, जो ध्यान माँग रहा है। रोग में स्वयं को दोष देना, अथवा यह सोचना कि “मेरे साथ ही ऐसा क्यों”, यह दूसरा बोझ है, जिसे उठाना आवश्यक नहीं।

इस क्षण में

दाहिने हाथ को छाती पर रखिए, जहाँ हृदय धड़कता है। पाँच गहरी साँसें लीजिए। प्रत्येक साँस के साथ मौन में दोहराइए, “मैं अभी यहाँ हूँ। यह क्षण ही पर्याप्त है।” शरीर ने आपका जीवन भर साथ दिया है। अब उसे सहारा देने की बारी आपकी है।

मानसिक रोग शरीर के रोग की तरह वास्तविक है, और उपचार योग्य है। अवसाद, चिंता विकार, अनिद्रा; ये सब चिकित्सकीय परिस्थितियाँ हैं, चरित्र दोष नहीं। मधुमेह के लिए चिकित्सक के पास जाना सहज है; अवसाद के लिए भी उतना ही सहज होना चाहिए।

स्मरण रखिए

चिकित्सक से सहायता दुर्बलता नहीं, साहस है। साधना एवं चिकित्सा परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं। संत भी रोगी हुए हैं; रोग आत्मा को नहीं छूता।

विस्तार के लिए अध्याय सात एवं बारह।

टूटना एक प्रकार की मृत्यु है। जो था, वह अब नहीं है, और जो अब है, वह अभी अपरिचित है। इसलिए यह पीड़ा वास्तविक है, और इसे शोक मानना चाहिए। प्रेम का जाना भी प्रिय के जाने जैसा ही है।

इस क्षण में

फोन को कम से कम तीस मिनट के लिए दूर रखिए, दूसरे कमरे में। उनके संदेश, चित्र, सोशल मीडिया देखने का आवेग प्रबल होगा; प्रति घंटे में अनेक बार आएगा। यह दौड़ती हुई गाड़ी जैसा है, जो धीरे धीरे रुकेगी। उस आवेग को देखिए, उसे आने दीजिए, परन्तु क्रिया में मत बदलिए।

प्रथम कुछ सप्ताह में मन एक काल्पनिक चलचित्र बनाता है, “यदि मैंने यह न कहा होता”, “यदि वह दिन वैसा न होता”। यह सामान्य है, परन्तु यह सत्य नहीं है। जो हुआ, वह अनेक कारणों से हुआ। किसी एक क्षण को दोषी ठहराना मन का खेल है।

तीस दिन का नियम

कोई भी स्थायी निर्णय; नौकरी छोड़ना, नया संबंध, निवास परिवर्तन; पहले तीस दिनों में मत लीजिए। मन इस समय स्थिर नहीं है, और जो निर्णय अभी लेंगे, वह बाद में पछताया जा सकता है।

विस्तार के लिए अध्याय आठ।

धन गया है, आप नहीं गए। यह दो वस्तुएँ हैं; एक की हानि से दूसरा समाप्त नहीं होता। आपने इस संसार में बिना धन के प्रवेश किया था, और जब तक श्वास है, आपका मूल्य उस श्वास से है, बैंक के अंकों से नहीं।

इस क्षण में

सभी ट्रेडिंग एवं समाचार ऐप बन्द कीजिए। बार बार देखने से कोई समाधान नहीं निकलेगा, केवल भय बढ़ेगा। एक काग़ज़ एवं कलम लीजिए। तीन कॉलम बनाइए; “आज वास्तव में क्या है”, “अगले तीस दिनों के लिए न्यूनतम क्या आवश्यक है”, और “किससे बात कर सकता हूँ”। तीसरा सबसे महत्त्वपूर्ण है; इस संकट को अकेले उठाने का विचार त्याग दीजिए।

एक भयानक भ्रम है, जिसे यहाँ तोड़ना आवश्यक है। “मेरे जाने से जीवन बीमा मेरे परिवार की रक्षा करेगा।” यह सत्य नहीं है। आत्महानि की स्थिति में अधिकांश पॉलिसी पहले बारह माह में पूर्ण लाभ नहीं देतीं। यह कदम परिवार को बचाता नहीं, एक स्थायी घाव देता है, जो पीढ़ियों तक नहीं भरता।

व्यसन के संकट में

अल्कोहलिक्स अनॉनिमस अथवा नार्कोटिक्स अनॉनिमस से सम्पर्क करें।

विस्तार के लिए अध्याय चौदह।

परिणाम आपकी पहचान नहीं है। यह केवल एक प्रश्न पत्र पर लिखे कुछ अंक हैं, अथवा एक साक्षात्कार में एक व्यक्ति का निर्णय है। आप उससे कहीं अधिक हैं। एक प्रश्न पत्र मनुष्य को नहीं तोलता।

इस क्षण में

पहले बहत्तर घंटों में अकेले मत रहिए। यह सबसे जोखिम का समय है। माँ, पिता, भाई, बहन, गुरु, मित्र; जो भी हों, उनके पास जाइए। यदि वे पहले फटकारें भी, तो भी जाइए। पाँच मिनट बाद वही माँ, जिसने डाँटा था, आपको गले लगाएगी, क्योंकि माँ का प्रेम परिणाम की प्रतीक्षा नहीं करता।

यदि माता पिता ही दबाव का स्रोत हैं, तो किसी एक अन्य विश्वसनीय वयस्क को खोजिए; मामा, मौसी, चाची, मित्र के माता पिता, कोई शिक्षक। और माता पिता को जो स्वर बालक को देना है, वह यह है। “तुम हमारे लिए परिणाम से पहले थे, परिणाम के बाद भी हो। आओ बैठो, हम साथ हैं। यह एक चरण है, तुम्हारा पूरा जीवन नहीं।”

स्मरण रखिए

हर सफल व्यक्ति का जीवन एक से अधिक असफलताओं पर खड़ा है। एक परिणाम जीवन नहीं है।

विस्तार के लिए अध्याय चौदह।

प्रतिष्ठा एक प्रतिबिम्ब है, आत्मा नहीं। प्रतिबिम्ब टूट सकता है, आत्मा अखण्ड है। आज जो शोर है, वह कल चुप होगा। जो आज वायरल है, वह तीन दिनों में बासी होता है। यह डिजिटल युग का नियम है।

इस क्षण में

बहत्तर घंटों के लिए सोशल मीडिया से दूर हो जाइए। हर पंद्रह मिनट में देखने का आवेग प्रबल होगा, परन्तु प्रत्येक नई टिप्पणी केवल घाव को कुरेदती है। फोन को किसी विश्वसनीय व्यक्ति को सौंप दीजिए, अथवा घर पर ही छोड़ दीजिए। एक शान्त गुमनाम स्थान खोजिए; एक पुस्तकालय, मन्दिर, नदी का तट। केवल चलते रहिए, अथवा बैठिए।

हमारी परम्परा में सीता एवं द्रौपदी जैसी पवित्र स्त्रियों पर भी सार्वजनिक आघात हुए। उन्होंने न शोर मचाया, न उत्तर में प्रहार किया। उन्होंने सहा, अपनी मर्यादा से डिगीं नहीं, और काल ने ही उत्तर दिया। आज भी वही सत्य है। काल बहुत बड़ा न्यायाधीश है।

स्मरण रखिए

यह तूफान बीतेगा। आप इसके बाद भी जीवित होंगे, और शायद कुछ अधिक गहरे।

विस्तार के लिए अध्याय चौदह एवं पाँच।

जो हुआ, वह आपके साथ हुआ; आपके कारण नहीं। यह विशेषतः उन सब के लिए है, जिन्होंने यौन हिंसा, बाल शोषण, अथवा किसी प्रियजन के हाथों आघात सहा है। “यह मेरी गलती नहीं थी।” यह पंक्ति बार बार दोहराइए, जब तक यह हृदय में उतर न जाए। आपका कोई वस्त्र, कोई समय, कोई व्यवहार उस अपराध का कारण नहीं था। अपराधी का अपराध अपराधी का है।

इस क्षण में

पाँच, चार, तीन, दो, एक का अभ्यास कीजिए। चारों ओर देखिए। पाँच चीज़ें जो दिख रही हैं; नाम लीजिए। चार जिन्हें छू सकते हैं; छूकर देखिए। तीन जो सुन रहे हैं; ध्यान दीजिए। दो जिनकी गंध आ रही है। एक जिसका स्वाद है। यह वर्तमान क्षण में लौटाता है, क्योंकि आघात मन को अतीत में खींच ले जाता है।

फ़्लैशबैक स्मृति नहीं है; यह स्मृति का दौरा है, जो शरीर एवं मन को वहाँ ले जाता है जहाँ घटना हुई थी। यह बीत जाता है। आप अभी यहाँ हैं, सुरक्षित हैं। जो हुआ वह बीत चुका है।

स्मरण रखिए

प्रशिक्षित चिकित्सकीय सहायता आवश्यक है। आघात अकेले नहीं भरता।

विस्तार के लिए अध्याय सात एवं बारह।

जब जीवन का अर्थ ही प्रश्न बन जाए, जब उठने का कारण ही प्रश्न बन जाए, तब वह प्रश्न ही उत्तर का बीज है। यह अंधकार सूचना है, श्राप नहीं। यह आत्मा का संकेत है कि एक पुरानी पहचान अब पर्याप्त नहीं, कुछ नए की प्रतीक्षा है।

इस क्षण में

रमण महर्षि का प्रश्न मन में रखिए। “यह जो दुःख कर रहा है, यह कौन है।” बिना उत्तर खोजे, केवल यह प्रश्न रखें। उत्तर भीतर से उठेगा। साथ ही एक मन्त्र पाँच बार। “तमसो मा ज्योतिर्गमय।” अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

संतों एवं ऋषियों ने भी यह अंधकार पार किया है। ईसाई परम्परा में संत जॉन ने इसे “आत्मा की काली रात्रि” कहा है। यह विशिष्ट अनुभव है, सामान्य मानसिक रोग नहीं, यद्यपि लक्षण मिल सकते हैं। दोनों में भेद कठिन है, इसलिए चिकित्सक एवं गुरु, दोनों से सम्पर्क उचित है।

स्मरण रखिए

यह एक चरण है, अंत नहीं।

विस्तार के लिए अध्याय उन्नीस एवं पाँच।

कभी कभी अनेक संकट एक साथ आते हैं। बीमार माता पिता, बच्चे की समस्या, अपनी थकान, आर्थिक भार। कभी एक के बाद एक, बिना विश्राम के, जैसे लहरें। यह विशेषतः उन सब के लिए है जो देखभालकर्ता हैं; पति, पत्नी, बच्चे, माता पिता, अथवा वे सब जो किसी प्रिय की निरन्तर सेवा में हैं।

इस क्षण में

पाँच साँसों की एक छोटी साधना। दोनों आँखें मूँद लीजिए, यदि सम्भव हो। श्वास भीतर, मन में गिनिए “एक”। श्वास बाहर, “यह क्षण”। अगली श्वास भीतर, “दो”, बाहर, “यह क्षण”। पाँच बार। यह कुछ नहीं बदलता, परन्तु आपको पुनः केन्द्र पर लाता है। केन्द्र से उठने वाला निर्णय अधिक स्थिर होता है।

देखभालकर्ता का थक जाना मानवीय है। आप मनुष्य हैं, यन्त्र नहीं। थकान में सहायता माँगना दुर्बलता नहीं, विवेक है। अपने लिए एक घंटा निकालना स्वार्थ नहीं, उन सबके प्रति कर्तव्य है जो आप पर निर्भर हैं। थका हुआ देखभालकर्ता अन्ततः किसी की देखभाल नहीं कर पाता।

स्मरण रखिए

आपका कर्तव्य सबको ठीक करना नहीं है। आपका कर्तव्य अपनी सीमा में सर्वोत्तम करना है। शेष का भार उस परम सत्ता पर छोड़िए, जो सब को धारण करती है।

विस्तार के लिए अध्याय तेरह एवं अठारह।

यदि आप यहाँ तक पहुँचे हैं, तो आपने सबसे कठिन कार्य कर लिया है; आपने अपनी पीड़ा को स्वीकार किया है, और सहायता की ओर हाथ बढ़ाया है। यह छोटा कार्य नहीं है। बहुत से लोग इस स्थान तक नहीं पहुँच पाते।

जब आप तैयार हों, इसी पुस्तक के अध्याय आपकी प्रतीक्षा में हैं। उनमें वही यात्रा है, जिसका द्वार आपने यहाँ खोला है।

संकट की किसी भी अवस्था में, सबसे पहले ऊपर दिए गए क्रमांकों पर सम्पर्क करें। हेल्पलाइन पर लौटें

"सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥"

सब सुखी हों। सब निरोग हों। सब का कल्याण हो। किसी को दुःख का भागी न होना पड़े।

आगे जुड़ता रहेगा

इस निर्देशिका में क्रमशः

  • राज्यवार सेवाएँ एवं अतिरिक्त संगठनों के सम्पर्क सूत्र
  • बहुभाषी सहायता; तमिल, बंगाली, तेलुगु, मराठी, गुजराती
  • मानसिक स्वास्थ्य के मोबाइल अनुप्रयोग एवं ऑनलाइन चैट सहायता
  • तत्काल शान्ति के लिए ऑडियो निर्देशन

ऊपर दिए गए सभी हेल्पलाइन क्रमांक तत्काल उपयोग के लिए पर्याप्त हैं। ऑनलाइन सहायता केवल अतिरिक्त संसाधन है, मुख्य का विकल्प नहीं।

दुःख से आनन्द की ओर
रक्षा फाउंडेशन, देहरादून
आपातकाल 112
यह निर्देशिका रक्षा फाउंडेशन, देहरादून के सौजन्य से, पूर्णतः निःशुल्क।