नवीन कृति
खोज: पदार्थ से परमात्मा तक
एक न्यूरोलॉजिस्ट की खोज
यह पुस्तक क्या है
यह किसी सिद्धान्त की पुस्तक नहीं है। यह एक चिकित्सक की उस लम्बी चढ़ाई का ईमानदार वृत्तांत है, जो एक प्रश्न से आरम्भ हुई। लेखक ने जीवन के कई दशक न्यूरोलॉजी को दिए हैं; मस्तिष्क उनका कार्यक्षेत्र रहा है, और रोगबिस्तर उनकी पाठशाला। वहीं, रोगियों के सिरहाने खड़े खड़े, वर्षों की परतों में एक प्रश्न भीतर उतर गया, जिसे कोई पाठ्यपुस्तक नहीं छूती थी; कोई चमत्कारिक क्षण नहीं, कोई दिव्य अनुभव नहीं, केवल एक प्रश्न, जो फिर कभी नहीं निकला।
वह प्रश्न यह है। मस्तिष्क में चल रही बिजली की हलचल का वर्णन किया जा सकता है; परन्तु उस हलचल से पीड़ा का अनुभव क्यों जन्मता है। स्मृति के तंत्र खोजे जा सकते हैं; परन्तु वह कौन है, जो कहता है, यह मेरी स्मृति है। पुस्तक के शब्दों में, प्रश्न यह है कि पदार्थ के भीतर अनुभूति का दीपक जलता ही क्यों है।
यात्रा का पथ
उत्तर की खोज पदार्थ से आरम्भ होती है, क्योंकि वहीं से हर वैज्ञानिक की श्रद्धा आरम्भ होती है। फिर पदार्थ से जीवन, जीवन से मस्तिष्क, मस्तिष्क से मन, मन से चेतना, चेतना से उस मैं तक जो इस समय ये पंक्तियाँ पढ़ रहा है, और अन्त में उस सीमा तक, जहाँ भाषा धीमी पड़ने लगती है। मार्ग में विज्ञान की कुछ अद्भुत कथाएँ मिलती हैं, इतिहास के सच्चे नाटकीय मोड़, लेखक के अपने रोगबिस्तरों के अनुभव, और भारतीय मनीषा के वे प्रश्न, जो सहस्रों वर्ष पहले पूछे गए थे और आज की प्रयोगशालाओं में फिर से गूँज रहे हैं।
संरचना
सात सोपान, तेईस अध्याय; पदार्थ, जीवन, मस्तिष्क, मन, चेतना, मैं, और सीमा। अन्त में उपसंहार के रूप में एक लेखकीय स्वीकारोक्ति, तथा पाँच परिशिष्ट; वैज्ञानिक शब्दावली, अध्यायवार स्रोत एवं टिप्पणियाँ, उद्धृत शास्त्रीय वाक्य मूल पाठ सहित, सात दिन का विस्मय अभ्यास, और दर्शनों का संक्षिप्त मानचित्र।
पाठक से पाँच वचन
पुस्तक की देहरी पर लेखक पाठक को पाँच वचन देता है, और पूरी पुस्तक में उन्हें कसौटी की तरह कसने का अधिकार भी।
एक · सत्य का वचन।
इस पुस्तक में एक भी गढ़ी हुई कथा नहीं है; कोई काल्पनिक पात्र नहीं, कोई मनगढ़ंत दृष्टांत नहीं। शास्त्र का हर वाक्य मूल ग्रंथ से मिलाकर लिखा गया है, और अन्त में हर अध्याय के स्रोत दिए गए हैं, ताकि पाठक कहा हुआ माने नहीं, चाहे तो जाँच ले।
दो · रोगियों का वचन।
रोगियों की पहचान से जुड़े विवरण पूरी तरह बदल दिए गए हैं; जो नहीं बदला गया, वह अनुभव का सत्य है। और वे किसी सिद्धान्त के प्रमाण बनकर नहीं आते; पुस्तक के शब्दों में, वे प्रमाण नहीं, प्रश्न के द्वार हैं। वे गुरु रहे हैं, और गुरु को साक्षी बनाया जाता है, औज़ार नहीं।
तीन · सीमा का वचन।
जो विज्ञान ने सिद्ध किया है, वह सिद्ध की भाषा में मिलेगा। जिस पर विज्ञान अभी मौन है, वहाँ साफ़ लिखा मिलेगा कि विज्ञान अभी नहीं जानता। और जहाँ बात परम्परा के अनुभव की होगी, वहाँ वह अपने ही नाम से आएगी, विज्ञान की वेशभूषा पहनकर नहीं।
चार · निष्कर्ष का वचन।
इस पुस्तक का कोई पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष नहीं है। हर द्वार पर दोनों ओर के सबसे बलवान तर्क पाठक के सामने रखे जाते हैं, और चुनाव सदा पाठक के हाथ में छोड़ा जाता है।
पाँच · संशय का वचन।
पाठक का संदेह इस पुस्तक में अतिथि नहीं, सहयात्री है। पुस्तक ने अपना काम तब नहीं किया जब पाठक ने लेखक की बात मान ली; बल्कि तब किया, जब पाठक के भीतर का प्रश्न पहले से बड़ा, साफ़ और निर्भय हो गया।
यह किनके लिए है
यह पुस्तक दो प्रकार के पाठकों से पहले ही पृष्ठ पर सीधी बात करती है। संशयी पाठक से यह कहती है कि आपका संदेह उचित है; उसे घर छोड़कर मत आइए, वही इन पृष्ठों में आपका सबसे विश्वसनीय साथी रहेगा। और श्रद्धालु पाठक से यह विनम्र निवेदन करती है कि यह पुस्तक आपकी श्रद्धा को विज्ञान से प्रमाणित नहीं करेगी, क्योंकि ऐसा करना दोनों के साथ अन्याय होगा। पुस्तक के ही शब्दों में; जो श्रद्धा प्रयोगशाला की मुहर माँगे, वह श्रद्धा नहीं, असुरक्षा है; और जो विज्ञान शास्त्र की जय बोलने लगे, वह विज्ञान नहीं, चाटुकारिता। इस पुस्तक में दोनों अपनी अपनी मर्यादा में मिलते हैं।
और शीर्षक के विषय में पुस्तक स्वयं स्पष्ट करती है; शीर्षक में परमात्मा गंतव्य की घोषणा नहीं, क्षितिज का नाम है; और क्षितिज तक कोई सड़क नहीं जाती, केवल दिशा जाती है।
कैसे पढ़ें
यह पुस्तक दौड़कर पढ़ने की नहीं है, टहलकर पढ़ने की है। एक बैठक में एक सोपान पर्याप्त है। यह फुलवारी नहीं है, जिसमें कहीं से भी एक फूल चुन लिया जाए; यह सीढ़ी है। हर अध्याय पिछले की कमाई पर खड़ा है, और हर अध्याय के अन्त में एक प्रश्न अगले का द्वार खोलता है। और इस पुस्तक से सहमत होना आवश्यक नहीं है; इससे केवल ईमानदारी से गुज़रना आवश्यक है।
विवरण
विषय वर्ग; विज्ञान एवं अध्यात्म · चेतना का विज्ञान एवं दर्शन · भारतीय दर्शन एवं वेदान्त · लोकप्रिय विज्ञान। लगभग तीन सौ पृष्ठ। प्रकाशक; बुक वर्ल्ड, एस्ले हॉल, देहरादून। उपलब्धता की सूचना इसी वेबसाइट पर मिलेगी।
विशेष निवेदन; इस पुस्तक में चिकित्सा विज्ञान से जुड़े जो भी प्रसंग हैं, वे केवल विचार और विमर्श के लिए हैं। यह पुस्तक किसी रोग के निदान अथवा उपचार का परामर्श नहीं है। स्वास्थ्य सम्बन्धी किसी भी निर्णय के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।
और शीर्षक के विषय में पुस्तक स्वयं स्पष्ट करती है; शीर्षक में परमात्मा गंतव्य की घोषणा नहीं, क्षितिज का नाम है; और क्षितिज तक कोई सड़क नहीं जाती, केवल दिशा जाती है।