विविध लेख

छोड़ना इतना कठिन क्यों है

डॉ. कृष्ण अवतार

एक छोटे बच्चे की मुट्ठी देखिए। उसमें काँच की एक गोली है। आप उसे मिठाई देना चाहते हैं, किन्तु वह मुट्ठी नहीं खोलता। मिठाई भी चाहिए, गोली भी नहीं छोड़नी। हम सब उम्र भर वही बच्चे रहते हैं; केवल गोलियाँ बदलती जाती हैं। कभी कोई वस्तु, कभी कोई पद, कभी कोई व्यक्ति, कभी अपनी ही कोई पुरानी छवि।

और जब जीवन वह वस्तु हाथ से लेने लगता है, तो भीतर जो खिंचाव उठता है, वही हमारे दुःख का बहुत बड़ा भाग है। प्रश्न यह है कि छोड़ना इतना कठिन क्यों है।

ज्ञान क्या कहता है

गीता एक क्रम बताती है; विषयों का चिन्तन करते करते उनसे संग बनता है, संग से कामना, कामना में बाधा से क्रोध, और वहाँ से मनुष्य का विवेक ढहता जाता है। अर्थात् पकड़ किसी एक दिन नहीं बनती; वह चिन्तन की पुनरावृत्ति से, धीरे धीरे, रस्सी की तरह बटी जाती है। इसीलिए वह एक झटके में नहीं खुलती।

और शास्त्र यह भी स्पष्ट करते हैं कि वैराग्य का अर्थ वस्तुओं को फेंक देना नहीं है; उनसे चिपके बिना जीना है। पकड़ वस्तु में नहीं होती, मन में होती है। इसीलिए जंगल में बैठा मनुष्य भी पकड़ से भरा हो सकता है, और घर गृहस्थी के बीच बैठा मनुष्य भी भीतर से मुक्त।

विज्ञान की ओर से

आधुनिक मनोविज्ञान ने इस पकड़ को नापने का प्रयास किया है, और एक बात बार बार सामने आई है; किसी वस्तु को खोने की पीड़ा, उसी वस्तु को पाने के सुख से बड़ी होती है। हानि हमें लाभ से अधिक गहरा छूती है। इसी से समझ आता है कि हम प्रायः उन चीज़ों को भी पकड़े रहते हैं जो अब सुख नहीं देतीं; मन पाने का हिसाब नहीं, खोने का भय देख रहा होता है।

मस्तिष्क की दृष्टि से भी, जो चीज़ बार बार सुख से जुड़ी रही है, उसके लिए भीतर एक अपेक्षा का पथ बन जाता है। छोड़ने पर वह पथ तुरन्त नहीं मिटता; कुछ समय तक वह खालीपन की तरह अनुभव होता है। यह खालीपन हानि का प्रमाण नहीं है; यह केवल अभ्यास के बदलने की अवधि है। जो यह जान लेता है, वह उस अवधि से घबराता नहीं।

अनुभव क्या सिखाता है

चिकित्सा जीवन में मैंने यह बार बार देखा है कि मनुष्य को सबसे अधिक थकाने वाला बोझ प्रायः वह नहीं होता जो उसके कन्धे पर है; वह होता है जिसे वह मन में उठाए घूम रहा है। और यह भी देखा है कि छोड़ना वास्तव में कोई क्रिया नहीं है। मुट्ठी को खोलना नहीं पड़ता; जिस क्षण भीतर यह दिख जाता है कि पकड़ने से रस नहीं, केवल ऐंठन मिल रही है, मुट्ठी अपने आप ढीली होने लगती है।

इसीलिए छोड़ने का अभ्यास वस्तु से नहीं, देखने से आरम्भ होता है। आज केवल इतना देखिए कि मन इस समय किसे सबसे कसकर पकड़े है। हटाइए मत, लड़िए मत; केवल देखिए। जो पैटर्न पहचाना जाता है, वह बदला जा सकता है।

सम्बन्धित सूत्र
"जो व्यक्ति आसक्ति से मुक्त है, वह कम प्रेम नहीं, अधिक प्रेम करता है। जो जानता है, कि यह क्षण क्षणिक है, वह उसे और अधिक पूर्णता से जीता है।"
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