विविध लेख
जो चला जाता है, वह हमसे कितना जाता है
डॉ. कृष्ण अवतार
यह कथा किसी और की नहीं, मेरी अपनी है।
सन् १९८६ में एक दुर्घटना में मैंने अपने पिता जी को खो दिया। मेरी आयु सोलह वर्ष थी। उस आघात ने भीतर सब कुछ स्थिर कर दिया। उस अवस्था में जो अनुभव हुआ, वह असहायता का था; यह भाव कि सामने कोई अपना जा रहा है, और आपके हाथ में कुछ नहीं है।
उसी असहायता से एक संकल्प निकला, और वही संकल्प मुझे चिकित्सा तक ले आया। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरा पहला दुःख ही मेरा पहला मार्गदर्शक था।
प्रश्न
वियोग हर जीवन में आता है; किसी में जल्दी, किसी में देर से। और हर बार वही प्रश्न छोड़ जाता है; जो चला गया, वह हमसे कितना गया। क्या सचमुच पूरा चला गया।
ज्ञान क्या कहता है
गीता इस प्रश्न पर संसार की सबसे धीर वाणी है। वह कहती है कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है; देह वस्त्र की तरह बदलती है, और जो भीतर है, वह न जन्मता है, न मरता है। यह वाणी आँसू रोकने के लिए नहीं है; वह आँसुओं के बीच खड़े रहने के लिए धरती देती है।
और हमारी परम्परा एक बात और कहती है, जो मुझे वर्षों बाद समझ आई; जो हमें गढ़ गए, वे हमारे गढ़े हुए में जीवित रहते हैं। मेरे पिता जी के सिद्धान्त, कि साध्य के साथ साधनों की पवित्रता भी उतनी ही आवश्यक है, आज भी मेरे हर निर्णय में खड़े मिलते हैं। माता पिता सच्चे अर्थ में कभी खोते नहीं; वे देह से हटकर हृदय के भीतर स्थान ले लेते हैं, और संस्कार बनकर साँस की तरह साथ चलते हैं।
विज्ञान क्या कहता है
विज्ञान शोक को रोग नहीं मानता; वह उसे प्रेम का ही दूसरा पक्ष मानता है। जिस मन ने वर्षों किसी की उपस्थिति के साथ जीना सीखा है, उसे अनुपस्थिति के साथ जीना फिर से सीखना पड़ता है; और यह सीखना सीधी रेखा में नहीं चलता। लहरों में चलता है। महीनों बाद भी कोई गन्ध, कोई गली, कोई तिथि अचानक सब लौटा देती है; यह पीछे लौटना नहीं है, यह सीखने की स्वाभाविक चाल है।
और अध्ययन यह भी संकेत करते हैं कि शोक को शब्द देना, उसे किसी से कहना, उसे लिखना, उसे भार से स्मृति की ओर ले जाता है। इसीलिए जो समाज मिलकर रोना जानते हैं, वे अकेले टूटने से बच जाते हैं। हमारी तेरहवीं, हमारे श्राद्ध, हमारा सत्संग; इनमें केवल कर्मकाण्ड नहीं, यह समझ भी बुनी हुई है।
एक क्षण विचार का
आज उस व्यक्ति को स्मरण कीजिए जिसका वियोग आपने सहा है। और आँसुओं के बाद एक प्रश्न पूछिए; उनका दिया हुआ क्या है, जो आज भी मुझमें चल रहा है। कोई सिद्धान्त, कोई स्वाद, कोई वाक्य, कोई आदत। वही उनका आपके भीतर रहना है।
और यदि वियोग अभी ताज़ा है, और अकेले सहा नहीं जा रहा, तो कृपया अकेले मत रहिए; किसी अपने से कहिए, अथवा इस वेबसाइट की संकट सहायता निर्देशिका का पहला ही खण्ड आपके लिए है।