स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान
स्वीकार करना हार मानना क्यों नहीं है
डॉ. कृष्ण अवतार
निदान सुनने के बाद के पहले क्षण लगभग हर रोगी में एक जैसे होते हैं। एक ही प्रश्न भीतर गूँजता है; मैं ही क्यों। और उसी क्षण से दो मार्ग खुल जाते हैं। एक मार्ग उस प्रश्न में ही बस जाने का है; क्यों मैं, क्यों अभी, किसका दोष। दूसरा मार्ग एक छोटे से मोड़ से आरम्भ होता है; अच्छा, अब आगे क्या।
दोनों रोगियों का रोग एक हो सकता है। दोनों की यात्रा एक नहीं होती।
ज्ञान क्या कहता है
स्वीकृति शब्द से बहुतों को आपत्ति होती है; उन्हें लगता है यह हथियार डाल देने का दूसरा नाम है। हमारी परम्परा इस भ्रम को जड़ से काटती है। स्वीकृति का अर्थ हार मान लेना नहीं है; स्वीकृति का अर्थ है यह जानना कि जो है, वह है। लड़ाई वास्तविकता से नहीं की जाती; वास्तविकता को स्वीकार करके, उसके भीतर जो किया जा सकता है, वह पूरे बल से किया जाता है।
गीता का पूरा सन्देश यही है; परिणाम स्वीकार, पुरुषार्थ अखण्ड। जो हो चुका, वह प्रारब्ध; जो किया जा सकता है, वह कर्तव्य। इन दोनों को मिलाने वाला मनुष्य न भाग्यवादी होता है, न अहंकारी; वह शान्त योद्धा होता है।
विज्ञान की ओर से
चिकित्सा विज्ञान ने इस भेद को अपनी भाषा में नापा है। जो रोगी वास्तविकता से निरन्तर लड़ता रहता है, वह वस्तुतः एक दोहरा भार उठाता है; एक रोग का, और एक उस भीतरी युद्ध का, जो चौबीसों घण्टे चलता है। यह युद्ध वही चिर तनाव है जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं; और वह नींद, मनोबल और उपचार के पालन, सब पर भारी पड़ता है।
इसके विपरीत, अध्ययन संकेत करते हैं कि जो रोगी स्थिति को स्वीकार कर लेते हैं, वे उपचार में अधिक नियमित होते हैं, अपने चिकित्सक से अधिक खुलकर बात करते हैं, और दीर्घ रोगों के साथ भी बेहतर जीवन जीते हैं। कारण सरल है; जो शक्ति इनकार में जल रही थी, वह अब प्रबन्धन में लगती है। स्वीकृति निष्क्रियता नहीं है; वह शक्ति का सही मोर्चे पर पहुँच जाना है।
अनुभव क्या सिखाता है
मैंने अपने चिकित्सा जीवन में ऐसे लोग देखे हैं जिनकी सारी रिपोर्ट सामान्य थीं और जो भीतर से टूटे हुए थे; और ऐसे भी, जिनका रोग असाध्य था और जिनके भीतर एक विलक्षण शान्ति थी। उस शान्ति का रहस्य पूछने पर उत्तर प्रायः किसी न किसी रूप में एक ही मिलता है; जो है, उसे स्वीकार कर लिया, और जो करना है, वह कर रहे हैं।
एक छोटा अभ्यास इस मोड़ को सरल बनाता है। जब भी मन क्यों मैं में फँसे, उसे एक वाक्य दीजिए; इस क्षण जो है, वह यह है; और इस क्षण मैं जो कर सकता हूँ, वह यह है। पहला आधा स्वीकृति है, दूसरा आधा पुरुषार्थ। दोनों मिलकर वह मार्ग बनाते हैं जिस पर रोग हो तो भी, जीवन चलता रहता है।
सम्बन्धित सूत्र
"स्वीकृति का अर्थ हार मान लेना नहीं है। स्वीकृति का अर्थ है यह जानना कि जो है वह है।"
आगे के द्वार
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।