विविध लेख
अपने ही लोग सबसे गहरा दुःख क्यों देते हैं
डॉ. कृष्ण अवतार
यह जीवन की एक विचित्र गणित है। मार्ग चलते किसी अपरिचित का कठोर वाक्य साँझ तक भूल जाता है; और अपने ही घर के किसी सदस्य का एक छोटा सा वाक्य वर्षों नहीं भूलता। जिनसे सबसे अधिक प्रेम है, उन्हीं से सबसे गहरे घाव क्यों मिलते हैं।
ओ.पी.डी. में स्नायु के रोग देखते हुए भी, बातों बातों में, अन्ततः यही कथाएँ निकलती हैं; बेटा बात नहीं करता, भाई ने वह कह दिया, बहू ने वह सुना दिया। शरीर की जाँचें सामान्य; हृदय की जाँच का कोई यन्त्र बना नहीं।
प्रश्न
तो क्या अपनों के पास हमें दुखाने की कोई विशेष शक्ति है। या वह शक्ति हमने ही उन्हें दी है, प्रेम के साथ साथ, बिना जाने।
ज्ञान क्या कहता है
परम्परा का उत्तर सीधा है; घाव की गहराई अपेक्षा की गहराई से आती है। अपरिचित से कोई अपेक्षा नहीं, अतः उसका पत्थर छूकर गिर जाता है; अपनों से असीम अपेक्षा है, अतः उनका कंकड़ भी भीतर तक धँसता है। जितना निकट सम्बन्ध, उतना बड़ा अपेक्षा का खाता; और हर अपूर्ण अपेक्षा ब्याज सहित दुःख बनती है।
इसका उपचार परम्परा ने प्रेम घटाना नहीं बताया; अपेक्षा को कोमल करना बताया है। प्रेम देना है; सौदा नहीं। और एक बात यह भी, कि सम्बन्धों में दुःख अनेक बार इसलिए नहीं आता कि दूसरा व्यक्ति बुरा है; यह इसलिए आता है, क्योंकि हम अपने प्रेम को उस भाषा में व्यक्त नहीं कर पाते जो दूसरा समझे। घर घर में प्रेम है; अनुवाद नहीं है।
विज्ञान क्या कहता है
विज्ञान की गवाही भी यही है कि हम सबसे तीव्र भाव उन्हीं के साथ जीते हैं जिनसे जुड़ाव सबसे गहरा है; जो तन्त्र प्रेम में सबसे अधिक जागता है, वही बिछोह और टकराव में सबसे अधिक दुखता है। अपनों की शक्ति और अपनों की चोट, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
और सम्बन्धों पर हुए अध्ययन एक व्यावहारिक बात संकेत करते हैं; कलह का विष प्रायः विषय में नहीं, ढंग में होता है। वही बात कही जा सकती है और वही बात चुभाई जा सकती है। ताना, उपेक्षा, पुराने घावों की सूची; ये ढंग सम्बन्ध को भीतर से खोखला करते हैं। और सुनना, सच में सुनना, बिना उत्तर की तैयारी के, सम्बन्ध की सबसे बड़ी चिकित्सा निकलती है। गहरी उपस्थिति कहती है, तुम्हारी भावना ठीक है। मैं यहाँ हूँ। मुझे सुधारने की ज़रूरत नहीं। मुझे बस साथ रहना है।
एक क्षण विचार का
आज घर में एक संवाद ऐसा कीजिए जिसमें आपका पूरा काम केवल सुनना हो। बीच में सुधारिए मत, सुझाइए मत, अपनी कथा मत जोड़िए; केवल सुनिए। देखिए उस व्यक्ति का चेहरा कैसे बदलता है।
और एकान्त में अपनी एक अपेक्षा को पहचानिए, जो किसी अपने से चिपकी है और बार बार दुखती है। उसे मिटाइए मत; केवल इतना कोमल कीजिए कि वह माँग से इच्छा बन जाए। माँग टूटती है तो क्रोध देती है; इच्छा अपूर्ण रहे तो केवल हल्की उदासी, और सम्बन्ध साबुत रहता है।