विविध लेख
दुःख से गुज़रने के बाद जीवन को अर्थ कैसे मिले
डॉ. कृष्ण अवतार
तूफ़ान के बीत जाने के बाद का समय, तूफ़ान से कम कठिन नहीं होता। संकट के दिनों में तो लड़ना ही एक काम था; दिन उसी में कट जाते थे। कठिनाई उसके बाद आती है, जब सब शान्त हो जाता है और मनुष्य मलबे के बीच खड़ा पूछता है; अब इस सबका अर्थ क्या। मैं क्यों बचा। आगे किसलिए जीना है।
मैं यह प्रश्न पहचानता हूँ। सोलह वर्ष की आयु में पिता जी के वियोग के बाद यह मेरे भी सामने खड़ा था। और आज पीछे देखता हूँ, तो जिस असहायता ने उस दिन सब कुछ सूना कर दिया था, उसी में से वह संकल्प निकला जो मुझे चिकित्सा तक ले आया। मेरे जीवन का अर्थ मुझे किसी शान्त उपवन में नहीं, मेरे सबसे गहरे घाव में मिला था।
प्रश्न
तो क्या अर्थ कहीं रखा होता है, जिसे खोज लेना है। या वह गढ़ा जाता है; और यदि गढ़ा जाता है, तो उसकी सामग्री क्या है।
ज्ञान क्या कहता है
मेरी पुस्तक की एक प्रतिज्ञा है; जो अभी शत्रु लगता है, वह एक दिन गुरु लगेगा। यह पंक्ति दुःख का महिमामण्डन नहीं है; दुःख माँगने की वस्तु नहीं है। यह केवल उस सम्भावना की घोषणा है, जो हर घाव के भीतर सोई रहती है। कीचड़ किसे प्रिय है; किन्तु कमल कीचड़ में उगता है। यदि कीचड़ न हो, तो कमल भी न हो।
हमारी परम्परा इस गढ़ने की दो सामग्रियाँ बताती है। पहली, बोध; दुःख से वह सीख निकाल लेना जो सुख कभी नहीं सिखा पाता। और दूसरी, सेवा; अपने घाव को दूसरों के घाव की समझ में बदल देना। जिसका दुःख किसी और के काम आने लगे, उसके दुःख को अर्थ मिल गया।
विज्ञान क्या कहता है
मनोविज्ञान ने भी इस विषय को ध्यान से देखा है, और उसकी गवाही सन्तुलित है। अध्ययन संकेत करते हैं कि बड़े आघात के बाद कुछ लोगों में समय के साथ एक विचित्र वृद्धि दिखती है; सम्बन्ध गहरे हो जाते हैं, प्राथमिकताएँ स्पष्ट, करुणा बड़ी, और जीवन का स्वाद पहले से सच्चा। किन्तु विज्ञान यह भी स्पष्ट कहता है कि यह वृद्धि कोई नियम नहीं है, और किसी दुःखी से यह कहना कि इसमें से कुछ अच्छा निकालो, प्रायः एक और चोट होती है। वृद्धि थोपी नहीं जाती; वह शोक के पूरे सम्मान के बाद, धीरे धीरे, स्वयं अंकुरित होती है।
और उसकी सबसे बड़ी विधि वही निकलती है जिसकी चर्चा हम स्मृति वाले लेख में कर चुके हैं; अपनी कथा को फिर से लिखना। घटना नहीं बदलती; किन्तु मैं टूटा हुआ हूँ से मैं वह हूँ जो इससे गुज़रकर भी खड़ा है तक की यात्रा, अर्थ की ही यात्रा है।
एक क्षण विचार का
यदि आपका तूफ़ान बीत चुका है, तो आज कागज़ पर दो प्रश्न लिखिए। पहला; इस अनुभव ने मुझे क्या सिखाया, जो और किसी विधि से नहीं सीख सकता था। दूसरा; इस अनुभव के कारण मैं अब किसके काम आ सकता हूँ, जिसके काम पहले नहीं आ सकता था। इन दोनों उत्तरों के बीच कहीं आपका अर्थ खड़ा मिलेगा।
और यदि उत्तर अभी न सूझें, तो कोई दोष नहीं; खेत को भी बुवाई और अंकुर के बीच मौन चाहिए। अर्थ की प्रतीक्षा भी अर्थ की साधना है।