विविध लेख
क्या सन्देह करना श्रद्धा का शत्रु है
डॉ. कृष्ण अवतार
प्रश्न प्रायः इस रूप में आता है; मैं भगवान को मानना चाहता हूँ। सत्संग में बैठता हूँ, पूजा भी करता हूँ। किन्तु पढ़ा लिखा मन भीतर से प्रश्न उठाता रहता है; क्या यह सब सच है, क्या कोई सुनता भी है। फिर अपराध बोध होता है कि मेरी श्रद्धा खोटी है। क्या मैं दोषी हूँ।
इस प्रश्न को पढ़कर मुझे सदा प्रसन्नता होती है; क्योंकि यह उस मन का प्रश्न है जो जाग रहा है। और उत्तर मैं पूरी ज़िम्मेदारी से कहता हूँ; नहीं, आप दोषी नहीं हैं। सन्देह श्रद्धा का शत्रु नहीं है; सोई हुई मान्यता का शत्रु है। और इन दोनों में बड़ा भेद है।
ज्ञान क्या कहता है
हमारी परम्परा प्रश्न पूछने वालों की परम्परा है। कठोपनिषद् का पूरा उपदेश एक किशोर के प्रश्नों पर खड़ा है, जो स्वयं मृत्यु के देवता से पूछता है और सरल उत्तरों से मानता नहीं। और गीता को ही देखिए; वह किसी आज्ञाकारी श्रोता को नहीं मिली। वह अर्जुन के संशय से जन्मी है; अठारह अध्यायों में अर्जुन बार बार पूछता है, टोकता है, यहाँ तक कह देता है कि आपकी बातें मुझे उलझा रही हैं। और भगवान उसे डाँटते नहीं; समझाते हैं, और अन्त में कहते हैं, अब जैसा तू चाहे वैसा कर। श्रद्धा का यह स्वरूप विचार की हत्या नहीं, विचार की परिपक्वता है।
अपनी पुस्तक खोज की देहरी पर मैंने पाठक को यही वचन दिया है; पाठक का संदेह इस पुस्तक में अतिथि नहीं, सहयात्री है। जो श्रद्धा प्रश्नों से डरती है, वह श्रद्धा नहीं, भय है। सच्ची श्रद्धा प्रश्नों को गोद में बैठा लेती है।
एक भेद, जो सब स्पष्ट कर देता है
सन्देह दो प्रकार का होता है, और दोनों का फल विपरीत है। एक है जिज्ञासा का सन्देह; वह पूछता है, ताकि जान सके। वह द्वार है। दूसरा है उपहास का सन्देह; वह पूछता नहीं, केवल काटता है; उसे उत्तर चाहिए ही नहीं। वह दीवार है। पहला साधक को गहरा करता है, दूसरा उथला।
कसौटी सरल है; अपने सन्देह से पूछिए, क्या तू उत्तर मिलने पर प्रसन्न होगा। यदि हाँ, तो वह जिज्ञासा है; उसे सम्मान दीजिए, पुस्तकें दीजिए, सत्संग दीजिए, समय दीजिए। जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों के अनेक उत्तर होते हैं, और उन सबके साथ धैर्य से बैठना ही ज्ञान की पहली परिपक्वता है।
अनुभव क्या सिखाता है
मैं स्वयं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ; प्रश्न पूछना मेरा व्यवसाय रहा है। और मैं साक्षी हूँ कि मेरे प्रश्नों ने मेरी श्रद्धा को घटाया नहीं; उसे मिट्टी से पक्की ईंट बनाया। जो श्रद्धा प्रश्नों की आँच से गुज़र चुकी है, उसे फिर कोई तर्क नहीं गिरा पाता।
अतः एक छोटा अभ्यास; अपने सबसे बड़े सन्देह को एक कागज़ पर प्रश्न के रूप में लिखिए। फिर उसे शत्रु नहीं, शिष्य का प्रश्न मानकर उसके उत्तर की खोज को अपनी साधना का अंग बना लीजिए। जिस दिन सन्देह साधना बन जाता है, उस दिन वह श्रद्धा का सेवक हो जाता है।