विविध लेख

साधना करने पर भी दुःख क्यों नहीं जाता

डॉ. कृष्ण अवतार

यह प्रश्न प्रायः बहुत पीड़ा से पूछा जाता है; मैं वर्षों से पाठ करता हूँ, नियम से पूजा करती हूँ, किसी का बुरा नहीं चाहा। फिर भी कष्ट मेरे ही घर क्यों आते हैं। क्या मेरी साधना व्यर्थ गई। क्या भगवान सुनते नहीं।

इस प्रश्न के सामने मैं सदा एक क्षण मौन हो जाता हूँ; क्योंकि इसके भीतर आँसू होते हैं, तर्क नहीं। और उत्तर देने से पहले यह कहना आवश्यक है; आपकी पीड़ा सच्ची है, और आपका प्रश्न पूछने का अधिकार भी।

ज्ञान क्या कहता है

उत्तर की जड़ में एक भूल है, जो हम सबसे सहज ही हो जाती है; हमने साधना से वह वचन जोड़ लिया जो उसने कभी दिया ही नहीं था। साधना का वचन यह नहीं है कि जीवन में प्रतिकूलता नहीं आएगी; उसका वचन यह है कि प्रतिकूलता के बीच भीतर कुछ अटूट खड़ा होता जाएगा। मेरी पुस्तक की पहली प्रतिज्ञा यही है; अनुकूल और प्रतिकूल के बीच भी एक समता आयेगी। आँधी रुके या न रुके, भीतर एक स्थिरता जन्म लेगी।

हमारी परम्परा में तो भक्तों ने विपत्ति को प्रसाद तक कहा है; कुन्ती ने भगवान से विपत्तियाँ माँगी थीं, कि इन्हीं में आपका स्मरण गहरा होता है। और जब दुःख आता है, तब एक पुकार भीतर से उठती है; और वह पुकार ही भक्ति का बीज है। अर्थात् दुःख साधना की असफलता नहीं है; वह प्रायः साधना की अगली कक्षा है।

कसौटी बदलिए

अतः साधना को नापने की कसौटी बदलिए। यह मत नापिए कि परिस्थितियाँ कितनी अनुकूल हुईं; वह खाता कर्मों का है, और उसकी गणित हमारी दृष्टि से बड़ी है। यह नापिए कि उन्हीं परिस्थितियों में आपकी प्रतिक्रिया कितनी बदली। पाँच वर्ष पहले जिस बात पर सप्ताह भर नींद उड़ती थी, अब उस पर कितनी रातें जागती हैं। जिस वाक्य पर पहले क्रोध फूटता था, अब कितना ठहरकर उत्तर आता है। कठिन समय में हाथ अब किसकी ओर उठता है।

अभ्यास की प्रगति भी सीधी रेखा में नहीं चलती; यह मैंने चिकित्सा में भी देखा है और साधना में भी। बीच में ऐसे पठार आते हैं जहाँ लगता है कुछ नहीं बदल रहा; और भीतर ही भीतर जड़ें गहरी हो रही होती हैं। पेड़ रोज़ नापने से नहीं बढ़ता; सींचते रहने से बढ़ता है।

एक क्षण विचार का

आज एक छोटा हिसाब कीजिए, परिस्थितियों का नहीं, प्रतिक्रियाओं का। कोई पुरानी कठिन घटना स्मरण कीजिए, और ईमानदारी से देखिए कि वही घटना आज घटे, तो भीतर क्या होगा। जो अन्तर दिखे, वही आपकी साधना का फल है; वह फल बाहर की फ़सल में नहीं, भीतर की मिट्टी में लगा है।

और एक बात हृदय से; यदि दुःख इन दिनों इतना गहरा हो कि अन्धकार ही अन्धकार दिखे, तो उसे केवल साधना की परीक्षा मानकर अकेले मत सहिए। किसी अपने से कहिए, और संकट सहायता निर्देशिका के द्वार सदा खुले हैं। सहायता लेना श्रद्धा की हार नहीं है; भगवान अनेक बार मनुष्यों के ही हाथों से सँभालते हैं।

सम्बन्धित सूत्र
"जब दुःख आता है, तब एक पुकार भीतर से उठती है। और वह पुकार ही भक्ति का बीज है।"
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