विविध लेख
व्यस्त जीवन में साधना का समय कहाँ से आए
डॉ. कृष्ण अवतार
यह प्रश्न प्रायः गृहस्थों का है, और बड़ी सच्चाई से पूछा जाता है; सुबह नौकरी, साँझ को बच्चे, बीच में माता पिता, फ़ोन, उत्तरदायित्व। मन तो है, समय नहीं है। साधना के लिए घण्टा कहाँ से लाएँ।
उत्तर का पहला वाक्य ही यह है; साधना घण्टे की वस्तु नहीं है। वह भाव की वस्तु है। और भाव को समय नहीं, स्मरण चाहिए।
ज्ञान क्या कहता है
गीता गृहस्थों का ही ग्रन्थ है; वह रणभूमि में खड़े एक कर्मठ मनुष्य से कही गई, किसी गुफा के एकान्त में नहीं। उसका मार्ग है कर्मयोग; काम छोड़कर साधना नहीं, काम को ही साधना बना लेना। जो भी कार्य पूरी एकाग्रता और प्रेम से किया जाए, वह साधना बन जाता है। रसोई, ओ.पी.डी., लेखा बही, बच्चे का पाठ; अर्पण का भाव जुड़ते ही मेज़ ही वेदी हो जाती है।
और उसका शिखर वह है, जहाँ करने वाला ही बदल जाता है; जब मैं कर रहा हूँ की जगह वह करा रहा है आता है, तो कर्म की गुणवत्ता असाधारण हो जाती है। ऐसा गृहस्थ चौबीसों घण्टे साधना में है, और घड़ी को पता भी नहीं चलता।
विज्ञान की ओर से
अभ्यास के विज्ञान की भी यहाँ एक स्पष्ट गवाही है; छोटा और नित्य, बड़े और कभी कभी से सदा जीतता है। प्रतिदिन के पाँच मिनट, सप्ताह के एक घण्टे से अधिक गढ़ते हैं; क्योंकि मस्तिष्क दोहराव से सीखता है, मात्रा से नहीं। और नई आदत सबसे सरलता से तब टिकती है जब वह किसी पुरानी, पक्की आदत के साथ बाँध दी जाए; जो काम प्रतिदिन होता ही है, उसी के साथ स्मरण जोड़ दीजिए।
अर्थात् प्रश्न समय निकालने का है ही नहीं; प्रश्न दिन में पहले से पड़े छिद्रों को पहचानने का है। जागने के पहले क्षण, स्नान, भोजन का पहला ग्रास, यात्रा, प्रतीक्षा की पंक्तियाँ, और नींद से पहले के दो मिनट; इतने में एक पूरी साधना समा जाती है।
एक क्षण विचार का
आज तीन ठिकाने चुन लीजिए, और उन्हें स्मरण से बाँध दीजिए। पहला; आँख खुलते ही, बिस्तर पर ही, तीन गहरी साँसें और एक छोटा सा धन्यवाद। दूसरा; भोजन का पहला ग्रास, एक क्षण रुककर, अर्पण के भाव से। तीसरा; सोने से पहले दिन भर का बोझ उसके हाथों में सौंपकर सोना; इसी वेबसाइट की दैनिक प्रार्थना में प्रातः और रात्रि के दो छोटे पाठ इसी के लिए रखे हैं, पाँच मिनट से कम के।
घण्टा कभी मिल जाए, तो वह उत्सव है। किन्तु साधना उत्सवों से नहीं, इन्हीं तीन ठिकानों से बनती है। बूँद नित्य गिरे, तो पत्थर भी कट जाता है।