स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान
यह मैं कौन है, जिसे दुःख होता है
डॉ. कृष्ण अवतार
भाषा कभी कभी हमसे अधिक जानती है। हम कहते हैं, मेरा हाथ, मेरा सिर, मेरा मन, मेरे विचार। जो वस्तु मेरी है, वह मैं नहीं हो सकती; मेरा घर कहने वाला घर नहीं होता। तो हाथ, सिर, मन, विचार, इन सबका वह स्वामी कौन है जो इन्हें मेरा कहता है।
यह प्रश्न कोई विलास नहीं है। इसी वेबसाइट के प्रथम पृष्ठ पर, पुस्तक के आवरण से, यह प्रश्न पूछा गया है; यह मैं कौन है, जिसे दुःख होता है। क्योंकि दुःख की जड़ तक वही पहुँचता है, जो दुःखी तक पहुँचता है।
विज्ञान की ओर से
यहाँ विज्ञान की गवाही बड़ी रोचक है। मस्तिष्क को खोजते हुए वैज्ञानिकों को स्मृति के तन्त्र मिले, भाषा के क्षेत्र मिले, भावों के केन्द्र मिले; किन्तु खोपड़ी के भीतर कहीं कोई एक बैठा हुआ मैं नहीं मिला, कोई ऐसा सिंहासन नहीं, जिस पर कोई छोटा सा राजा बैठकर सब देख रहा हो। जो मिलता है, वह एक कथा है; अनुभवों, स्मृतियों और भावों से निरन्तर बुनी जाती हुई मैं की कथा, जो हर रात गहरी नींद में थम जाती है और हर सुबह फिर चल पड़ती है।
अर्थात् जिसे हम ठोस पत्थर समझते थे, विज्ञान उसे बहती नदी पाता है। और यह जानना दुःख के लिए बड़ी बात है; क्योंकि हमारा अधिकांश दुःख उसी कथा की चोट है। जब मैं को चोट लगती है, तब दुःख होता है; जब मेरा खो जाता है, तब दुःख होता है। कथा जितनी कठोर, चोट उतनी गहरी।
ज्ञान क्या कहता है
जहाँ विज्ञान रुकता है, वहाँ से हमारी परम्परा का उत्तर आरम्भ होता है, और वह उत्तर निषेध से नहीं, पहचान से आता है। वह कहती है; यदि आप शरीर को देख सकते हैं, तो आप शरीर नहीं हैं। यदि आप मन को देख सकते हैं, तो आप मन नहीं हैं। यदि आप विचारों को देख सकते हैं, तो आप विचार नहीं हैं।
यह कोई तर्क का खेल नहीं है; यह एक दिशा है। कथा को देखा जा सकता है, इसलिए देखने वाला कथा से भिन्न है। परम्परा उसी देखने वाले को हमारा वास्तविक स्वरूप कहती है; और उसकी घोषणा यह है कि वह देखने वाला कभी घायल नहीं हुआ। बादल आते हैं, आकाश को ढकते हैं, किन्तु आकाश को बदल नहीं सकते।
अनुभव क्या सिखाता है
इस बोध को जीवन में उतारने का एक छोटा सा द्वार भाषा ही है। अगली बार जब भीतर आँधी उठे, तो वाक्य बदलकर देखिए। मैं क्रोधित हूँ के स्थान पर, मुझमें क्रोध उठा है। मैं दुःखी हूँ के स्थान पर, मुझमें दुःख उतरा है। यह शब्दों की चतुराई नहीं है; यह दूरी की साधना है। जिस क्षण क्रोध मेरा होना छोड़कर मुझमें उठा हुआ हो जाता है, उसी क्षण उसके और मेरे बीच एक अंगुल भर स्थान बन जाता है। और वही अंगुल भर स्थान मनुष्य की सारी स्वतन्त्रता है।
वर्षों की खोज के बाद मेरे पास इस प्रश्न का जो निचोड़ है, वह मेरे एक सूत्र में है; जो आप खोज रहे थे, वह आप हैं। खोज बाहर से भीतर मुड़ जाए, बस यही यात्रा है।
सम्बन्धित सूत्र
"मैं वाहन नहीं हूँ। मैं वह हूँ जो इस वाहन में बैठा है।"
आगे के द्वार
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।