स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान

मन को देखने वाला कौन है

डॉ. कृष्ण अवतार

रात को स्वप्न में मन एक पूरा संसार रच देता है; नगर, लोग, भय, दौड़। आँख खुलती है, संसार विलीन हो जाता है। किन्तु एक बात ध्यान देने योग्य है; स्वप्न में भी कोई देख रहा था, और जागने पर भी वही देख रहा है। दृश्य बदल गया, द्रष्टा नहीं बदला।

यहीं से वह भेद खुलता है जो इस पूरे विषय की धुरी है। विचार आते हैं और जाते हैं; स्मृतियाँ उठती हैं और डूबती हैं; भाव चढ़ते हैं और उतरते हैं। यह सब मन है, निरन्तर बहती धारा। किन्तु यह सारी धारा जिस प्रकाश में दिखाई देती है, वह प्रकाश धारा नहीं है। उसी प्रकाश का नाम चेतना है।

विज्ञान की ओर से

यहाँ मुझे वही ईमानदारी बरतनी होगी जिसका वचन मैंने अपनी पुस्तक खोज में दिया है; जो विज्ञान ने सिद्ध किया है, वह सिद्ध की भाषा में, और जिस पर विज्ञान मौन है, वहाँ साफ़ स्वीकार।

विज्ञान मस्तिष्क और मन के सम्बन्ध के विषय में बहुत कुछ जान चुका है; कौन सा अनुभव मस्तिष्क की किस हलचल के साथ चलता है, नींद में क्या बदलता है, ध्यान में क्या। किन्तु एक प्रश्न आज भी वैसा ही खड़ा है, और अनेक वैज्ञानिक उसे अपने क्षेत्र की सबसे कठिन पहेली कहते हैं; यह कि पदार्थ की हलचल के साथ अनुभव है ही क्यों। मैंने अपनी पुस्तक में इसी को अपना जीवन प्रश्न कहा है; पदार्थ के भीतर अनुभूति का दीपक जलता ही क्यों है। मस्तिष्क की बिजली का वर्णन हो सकता है; उस बिजली में पीड़ा की टीस, गुड़ की मिठास, माँ के स्वर की कोमलता क्यों अनुभव होती है, यह आज भी विज्ञान का खुला द्वार है।

अतः यह लेख कोई उत्तर थोपने के लिए नहीं है। यह केवल उस सीमा रेखा की सैर है, जहाँ विज्ञान अपनी पूरी गरिमा के साथ कहता है, यहाँ से आगे मैं अभी नहीं जानता।

ज्ञान क्या कहता है

हमारी परम्परा इस सीमा रेखा के उस पार से बोलती है, और उसका स्वर घोषणा का नहीं, अनुभव का है। वह कहती है कि चेतना मस्तिष्क की कोई उपज नहीं, बल्कि वह पहला तथ्य है जिसमें मस्तिष्क समेत सब कुछ जाना जाता है। दीपक से प्रकाश नहीं जाना जाता; प्रकाश में दीपक जाना जाता है।

और उसने साधकों को एक कसौटी दी, जो आज भी हर मनुष्य के भीतर उपलब्ध है; आत्मा कोई अनुभव की वस्तु नहीं है। वह अनुभव का साक्षी है। जो भी दिखे, वह दृश्य है; देखने वाला उससे परे। इसी सीढ़ी से नेति नेति करते हुए साधक वहाँ पहुँचता है, जहाँ खोजने वाला ही मिल जाता है।

अनुभव क्या सिखाता है

यह विषय जितना गहन है, इसका अभ्यास उतना ही सरल है। किसी भी क्षण अपने आप से पूछिए; अभी मेरे मन में क्या चल रहा है। एक क्षण में उत्तर दिखने लगेगा; कोई चिन्ता, कोई योजना, कोई गीत। अब दूसरा प्रश्न पूछिए; यह जिसे दिख रहा है, वह कौन है। उत्तर शब्दों में नहीं आएगा; एक मौन से भरी उपस्थिति में आएगा। वही आप हैं।

इस अभ्यास का व्यावहारिक फल तत्काल है। जो व्यक्ति दिन में कुछ बार भी मन की धारा से हटकर उसके साक्षी में टिकना सीख लेता है, उसकी चिन्ता उसे पहले जैसा नहीं बहा पाती; क्योंकि बाढ़ वही डुबोती है जो धारा में खड़ा हो, किनारे पर बैठे को नहीं। ध्यान का पूरा विज्ञान, जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं, इसी किनारे तक पहुँचने की पगडण्डी है।

सम्बन्धित सूत्र
"आत्मा कोई अनुभव की वस्तु नहीं है। वह अनुभव का साक्षी है।"
आगे के द्वार

यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।