स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान
सुख मिलते ही छोटा क्यों पड़ जाता है
डॉ. कृष्ण अवतार
नया मोबाइल जिस दिन घर आता है, उस दिन उसकी पेटी खोलना भी एक उत्सव होता है। तीसरे सप्ताह वह जेब में पड़ी एक वस्तु है। यही कथा गाड़ी की है, पद की है, प्रशंसा की है। जिस चीज़ के लिए महीनों प्रतीक्षा की, वह हाथ में आते ही धीरे धीरे साधारण क्यों हो जाती है।
यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं है; इसके भीतर मस्तिष्क की एक पूरी व्यवस्था बैठी है, जिसे समझ लेना अपने ही मन की चाबी पा लेना है।
विज्ञान की ओर से
मस्तिष्क की पुरस्कार व्यवस्था के विषय में अध्ययन एक सूक्ष्म बात संकेत करते हैं; वह व्यवस्था प्राप्ति से अधिक प्रत्याशा पर जागती है। अर्थात् उसका चरम क्षण वस्तु के मिलने पर नहीं, मिलने की सम्भावना पर होता है। इसीलिए प्रतीक्षा में जो रस था, प्राप्ति में वह प्रायः नहीं मिलता; व्यवस्था तब तक अगली सम्भावना की ओर मुड़ चुकी होती है।
और इस व्यवस्था की एक दुखती रग भी समझ लीजिए; अनिश्चित पुरस्कार उसे सबसे अधिक बाँधता है। जहाँ यह पता न हो कि अगली बार क्या मिलेगा, वहाँ मन बार बार लौटता है। मोबाइल की पट्टी को बार बार सरकाने में यही सूत्र काम कर रहा होता है; हर सरकाव एक अनिश्चित पुरस्कार का पासा है। यह जानकर स्वयं पर हँसी भी आती है, और दया भी; हम दौड़ नहीं रहे, दौड़ाए जा रहे हैं।
तीसरी बात वही है जो पिछले लेख में आई; मिले हुए सुख पर मन शीघ्र अभ्यस्त हो जाता है, और मापदण्ड ऊपर सरक जाता है। कल की विलासिता आज की आवश्यकता बन जाती है।
ज्ञान क्या कहता है
अब सुनिए कि हमारे शास्त्र इसी बात को कितने पहले कह चुके हैं। वे कहते हैं कि कामनाएँ भोग से शान्त नहीं होतीं; जैसे घी डालने से अग्नि शान्त नहीं होती, और बढ़ती है। यह कोई नीति वचन भर नहीं है; यह उसी व्यवस्था का वर्णन है जिसे आज प्रयोगशालाएँ नाप रही हैं।
और मार्ग भी शास्त्रों ने वहीं दिखाया जहाँ व्यवस्था की पकड़ नहीं है; सन्तोष। सन्तोष का अर्थ दौड़ना छोड़ देना नहीं है; कर्म पूरा करना और मापदण्ड को मन के हाथ से लेकर विवेक के हाथ में दे देना है।
अनुभव क्या सिखाता है
इस व्यवस्था से लड़ा नहीं जा सकता; वह हमसे पुरानी और हमसे बलवान है। किन्तु उसे देखा जा सकता है, और जो देखा जाता है, वह धीरे धीरे स्वामी नहीं रह जाता, सेवक बन जाता है।
दो छोटे प्रयोग कीजिए। पहला, किसी एक इच्छित वस्तु की प्राप्ति को जान बूझकर कुछ दिन टालिए, और उन दिनों में अपने मन का उतार चढ़ाव देखिए; आप प्रत्याशा की पूरी लीला अपने भीतर घटती देखेंगे। दूसरा, दिन में एक बार, जो पहले से मिला हुआ है, उसमें से किसी एक वस्तु को ऐसे देखिए जैसे वह आज ही मिली हो। कृतज्ञता वह विधि है जो अभ्यस्त हो चुके सुख को फिर से जीवित कर देती है; यह पुरस्कार व्यवस्था को धोखा देना नहीं, उसे सही दिशा में जोतना है।
सम्बन्धित सूत्र
"पतंजलि यह नहीं कह रहे, कि सुख से सन्तोष मिलता है। वे कह रहे हैं, कि सन्तोष से सुख मिलता है।"
आगे के द्वार
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।