स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान

भय भीतर से इतना बड़ा क्यों हो जाता है

डॉ. कृष्ण अवतार

रात के तीन बजे हैं। नींद अचानक खुल गई है। और वही चिन्ता, जो दिन में एक साधारण सी बात थी, अब छाती पर पहाड़ बनकर बैठी है। हृदय तेज़ है, हथेलियाँ ठण्डी, और मन भविष्य की एक ऐसी कथा दिखा रहा है जिसका अभी कोई प्रमाण नहीं है।

सुबह वही बात फिर छोटी लगती है। तो रात में वह बड़ी क्यों थी। भय भीतर से इतना बड़ा क्यों हो जाता है।

विज्ञान की ओर से

मस्तिष्क में खतरे को पहचानने की एक अत्यन्त प्राचीन व्यवस्था है, और उसका स्वभाव समझ लेना ही आधी शान्ति है। उसका स्वभाव यह है कि वह पहले घण्टी बजाती है, प्रमाण बाद में देखती है। जंगल के युग में यही उसका गुण था; रस्सी को साँप समझकर कूद जाने वाला जीवित रहता था। कठिनाई यह है कि आज साँप कम हैं और रस्सियाँ अनेक; अधूरे सन्देश, कल की बैठक, जाँच की रिपोर्ट, बच्चों का भविष्य।

घण्टी बजते ही शरीर तैयार होता है; हृदय दौड़ता है, श्वास उथली होती है, माँसपेशियाँ कसती हैं। और यहीं एक चक्र बनता है; मन शरीर की इस हलचल को देखकर कहता है, अवश्य ही खतरा बड़ा है, और घण्टी और ज़ोर से बजती है। भय स्वयं अपना भोजन बन जाता है। चिन्ता इसी भय का वह रूप है जो किसी उपस्थित खतरे पर नहीं, कल्पित भविष्य पर चलता है; इसीलिए वह थकाती अधिक है और सुलझाती कम।

इस चक्र की सबसे सरल कुंजी श्वास है, क्योंकि श्वास शरीर की उन थोड़ी सी क्रियाओं में है जो स्वयं भी चलती है और हमारे वश में भी है। धीमी, गहरी, लम्बी साँसें शरीर को यह सन्देश देती हैं कि खतरा उतना नहीं है; और शरीर शान्त हो, तो मन की घण्टी भी धीमी पड़ती है।

ज्ञान क्या कहता है

उपनिषद् एक गहरी बात कहते हैं; भय सदा दूसरे से होता है। जहाँ द्वैत है, दो हैं, वहीं खोने का भय है। इसीलिए हमारी परम्परा ने अभय को इतना ऊँचा स्थान दिया, और उसका मार्ग बताया समर्पण; जो अपने को उस एक के हाथों में सौंप देता है, उसके लिए पराया कोई नहीं बचता।

मुझे परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज का वह सरल वाक्य स्मरण आता है; जो होता है, वह ठीक ही होता है। यह वाक्य भविष्य की अनिश्चितता को मिटाता नहीं; उस अनिश्चितता के साथ बैठने की शक्ति दे देता है। भय अनिश्चितता से उतना नहीं, अनिश्चितता के अस्वीकार से जन्मता है।

अनुभव क्या सिखाता है

ओ.पी.डी. में ऐसे अनेक लोग आते हैं जिनकी सब जाँचें सामान्य होती हैं, किन्तु जो भीतर काँप रहे होते हैं। मैं उनसे कभी यह नहीं कहता कि डरो मत; यह कहना सरल है और व्यर्थ भी। मैं इतना कहता हूँ कि भय आपका दोष नहीं है; वह एक अत्यन्त पुरानी, अत्यन्त स्वामिभक्त व्यवस्था का अधिक सजग हो जाना है। उसे दोष नहीं, प्रशिक्षण चाहिए।

और प्रशिक्षण का पहला पाठ यह है; भय के समय तीन गहरी साँसें लीजिए, और अपने आप से केवल एक प्रश्न पूछिए; इस क्षण, अभी, मेरे सामने वास्तव में क्या है। प्रायः उत्तर होता है; इस क्षण में केवल एक कमरा है, एक बिस्तर है, और एक कथा है जो अभी घटी नहीं है।

एक आवश्यक बात और; यदि चिन्ता नींद, भोजन अथवा दैनिक जीवन को निरन्तर रोकने लगे, तो यह केवल दर्शन का नहीं, चिकित्सा का भी विषय है। तब कृपया संकोच छोड़कर अपने चिकित्सक से मिलिए; सहायता लेना दुर्बलता नहीं, विवेक है।

सम्बन्धित सूत्र
"भविष्य की चिन्ता करके उसे नियन्त्रित नहीं किया जा सकता। जो होगा, वह होगा। उसकी तैयारी की जा सकती है। किन्तु उसमें रहना केवल चिन्ता देता है।"
आगे के द्वार

यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।