स्वास्थ्य सलाह · मनुष्य होने का विज्ञान

ध्यान करने से मस्तिष्क में क्या बदलता है

डॉ. कृष्ण अवतार

पहली बार आँख बन्द करके बैठिए, और तीस सेकंड के भीतर मन कहीं और होगा; कल की बात में, किसी पुराने वाक्य में, किसी सूची में। अधिकांश लोग यहीं हारकर उठ जाते हैं; कहते हैं, हमसे ध्यान नहीं होता, हमारा मन बहुत चंचल है।

यहीं पहली भूल होती है। मन का भागना ध्यान की असफलता नहीं है; वही तो अभ्यास का मैदान है। जिस क्षण आपने देखा कि मन भाग गया, उसी क्षण एक छोटा सा, किन्तु वास्तविक कार्य हुआ; देखना।

विज्ञान की ओर से

मस्तिष्क के विषय में विगत दशकों की सबसे आशा भरी खोज एक ही वाक्य में कही जा सकती है; मस्तिष्क बदल सकता है। आयु कोई भी हो, जो अभ्यास बार बार दोहराया जाता है, मस्तिष्क उसी के अनुरूप ढलने लगता है; जैसे पगडण्डी पर बार बार चलने से मार्ग बन जाता है।

ध्यान इसी नियम का उपयोग है। हर बार जब मन भागता है और आप उसे कोमलता से वापस लाते हैं, तो ध्यान की वह वापसी एक अभ्यास बनती है; ठीक वैसे, जैसे माँसपेशी हर उठान से बलवान होती है। अनेक अध्ययन संकेत करते हैं कि नियमित अभ्यास से ध्यान टिकाने की क्षमता बढ़ती है, तनाव की प्रतिक्रिया कोमल पड़ती है, और मनुष्य अपने ही विचारों को थोड़ी दूरी से देखना सीखता है। मैं इन्हें चमत्कार नहीं कहता, और अतिरंजित दावों से इस सुन्दर विषय की रक्षा भी आवश्यक है; किन्तु दिशा स्पष्ट है, और वह दिशा वही है जिसकी ओर हमारी परम्परा सहस्रों वर्षों से संकेत कर रही है।

ज्ञान क्या कहता है

हमारी परम्परा में ध्यान कोई विशेष मुद्रा अथवा कठिन तकनीक नहीं है; वह मन का किसी एक आश्रय में ठहर जाना है। किसी के लिए वह श्वास है, किसी के लिए नाम, किसी के लिए रूप, किसी के लिए केवल साक्षी भाव। पतंजलि उसे धारा की उपमा देते हैं; जैसे तेल की अटूट धार, वैसे एक ही ओर बहता चिन्तन।

और भक्ति परम्परा उसमें एक मिठास और जोड़ देती है; अकेले प्रयत्न से मन नहीं ठहरता, प्रेम से ठहरता है। जिससे प्रेम है, वहाँ मन बिना बुलाए जाता है। इसीलिए हमारे यहाँ ध्यान और स्मरण सगे भाई हैं।

कैसे आरम्भ करें

किसी बड़े संकल्प से नहीं; पाँच मिनट से। प्रातः, स्नान के बाद अथवा जैसा बने, एक ही स्थान पर बैठिए। तीन गहरी साँसें लीजिए। फिर या तो श्वास को देखिए, या अपने इष्ट का स्मरण कीजिए। मन भागे, तो बिना झुँझलाए वापस ले आइए; यही पूरा अभ्यास है।

जिन्हें कोई सरल, बना बनाया आरम्भ चाहिए, उनके लिए इसी वेबसाइट पर दैनिक प्रार्थना है; प्रातः पाँच मिनट का स्मरण, और रात्रि का छोटा समर्पण पाठ। सहस्रों पृष्ठ पढ़ने से पहले, पाँच मिनट बैठना अधिक बदलता है।

और एक स्पष्ट बात; ध्यान किसी रोग की औषधि का विकल्प नहीं है। जो उपचार चल रहा है, वह चलता रहे; ध्यान उसके साथ चलने वाला मित्र है, उसका स्थानापन्न नहीं।

सम्बन्धित सूत्र
"मस्तिष्क बदल सकता है। और यदि मस्तिष्क बदल सकता है, तो मन बदल सकता है। और यदि मन बदल सकता है, तो जीवन बदल सकता है।"
आगे के द्वार

यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।