विविध लेख
भीड़ में भी अकेलापन क्यों लगता है
डॉ. कृष्ण अवतार
वह क्षण हम सबने जाना है। घर भरा है, उत्सव चल रहा है, हँसी की आवाज़ें हैं; और उसी बीच एक पल को भीतर सन्नाटा उतर आता है, जैसे शीशे के इस पार हम हों और उस पार सब। फ़ोन में सैकड़ों सम्पर्क हैं, और जब हृदय सचमुच भारी होता है, तो अँगूठा सूची पर ऊपर नीचे चलता रह जाता है; कहने योग्य कोई नाम नहीं मिलता।
चिकित्सा जीवन ने मुझे यह भी दिखाया है कि वृद्धावस्था में अनेक लोग ओ.पी.डी. में केवल रोग लेकर नहीं आते; थोड़ी सी बातचीत भी लेने आते हैं। पर्ची पर लिखी व्याधि से बड़ी व्याधि प्रायः वह होती है जो कहीं लिखी नहीं जाती।
प्रश्न
तो अकेलापन वास्तव में है क्या। यदि वह लोगों की कमी होता, तो भीड़ में मिट जाता। और यदि वह लोगों की कमी नहीं है, तो फिर किसकी कमी है।
ज्ञान क्या कहता है
हमारी परम्परा यहाँ एक सूक्ष्म भेद करती है, जो इस पूरी गुत्थी की कुंजी है; एकान्त और अकेलापन एक नहीं हैं। अकेलापन एक कमी का बोध है; एकान्त एक पूर्णता का बोध है। ऋषि वन में अकेले नहीं थे; वे एकान्त में थे, क्योंकि भीतर कोई साथ था। और नगर की भीड़ में मनुष्य अकेला हो सकता है, क्योंकि भीतर कोई संग नहीं।
इसीलिए शास्त्रों ने दो मार्ग साथ साथ दिए; सत्संग, अर्थात् बाहर के सच्चे संग की खोज, और स्मरण, अर्थात् भीतर के नित्य संग की पहचान। जो यह जान लेता है कि जिसमें यह सारा जगत् बसा है, वही मुझमें भी बसा है, उसका अकेलापन धीरे धीरे एकान्त में बदलने लगता है; कमी पूर्णता में।
विज्ञान क्या कहता है
विज्ञान की गवाही यहाँ बहुत करुण है। अध्ययन संकेत करते हैं कि सामाजिक चोट, उपेक्षा, बहिष्कार, बिछोह, मस्तिष्क में बहुत कुछ उसी ढंग से अनुभव होती है जैसे शारीरिक पीड़ा। भाषा ने यह पहले से जान रखा था; हम कहते ही हैं, हृदय टूट गया, बात चुभ गई। और लगातार बना रहने वाला अकेलापन केवल मन को नहीं, स्वास्थ्य को भी उतना ही प्रभावित करता है जितनी कोई ठोस व्याधि; नींद, तनाव, हृदय, सब पर उसकी छाया पड़ती है।
और विज्ञान एक आशा भी देता है; अकेलापन सिर गिनने से नहीं नापा जाता। एक सच्चा जुड़ाव, एक व्यक्ति जिससे बिना मुखौटे के बात हो सके, पूरी सूची से अधिक काम करता है। प्रश्न संख्या का नहीं, गहराई का है।
एक क्षण विचार का
आज दो छोटे काम कीजिए। बाहर की ओर; किसी एक व्यक्ति को बिना किसी प्रयोजन के स्मरण कीजिए, फ़ोन कीजिए, केवल यह कहने को कि आज आपकी याद आई। सम्भव है उस पार भी कोई शीशे के पीछे बैठा हो, और आपकी एक घण्टी उसका काँच तोड़ दे।
और भीतर की ओर; आज रात सोने से पहले दो मिनट उसके साथ बैठिए जो कभी नहीं जाता। जिसका कोई नहीं होता, उसके लिए हमारी परम्परा ने कहा है कि उसका भगवान होता है। यह पंक्ति सान्त्वना नहीं है; लाखों साधकों का जिया हुआ अनुभव है।
और यदि अकेलापन इन दिनों बहुत गहरा हो, बोझ बनने लगा हो, तो कृपया इसे केवल स्वभाव मानकर मत सह लीजिए; किसी अपने से कहिए, अथवा इसी वेबसाइट की संकट सहायता निर्देशिका खोलिए। वहाँ बात करने वाले, सुनने वाले मार्ग दिए हैं।