विविध लेख

असफलता इतनी चुभती क्यों है

डॉ. कृष्ण अवतार

परिणाम वाले दिन की वह घड़ी सबने जी है। सूची में अपना नाम खोजती आँखें, वह फ़ोन जो नहीं आया, वह पद जो किसी और को मिल गया, वह व्यापार जो चला नहीं। और उस क्षण भीतर जो डूबता है, वह केवल एक अवसर नहीं होता; ऐसा लगता है जैसे हम स्वयं डूब गए।

वर्षों बाद वही घटना छोटी लगती है, कभी कभी वरदान भी। किन्तु उस दिन वह पहाड़ क्यों थी। असफलता इतनी चुभती क्यों है।

प्रश्न

चुभती हुई असफलता के भीतर झाँकिए तो दो चीज़ें अलग अलग दिखती हैं; एक घटना, जो बाहर घटी, और एक निर्णय, जो भीतर हुआ; कि मैं ही अपर्याप्त हूँ। प्रश्न यह है कि घटना को निर्णय बनने से कौन रोके।

ज्ञान क्या कहता है

गीता का सबसे प्रसिद्ध वचन ठीक इसी घाव की औषधि है; अधिकार कर्म पर है, फलों पर नहीं। यह वचन प्रयास घटाने का नहीं, चुभन घटाने का सूत्र है। निष्काम कर्म पूरी लगन से काम करता है, वह श्रेष्ठ फल की आकांक्षा भी रखता है। किन्तु यदि फल न मिले, तो वह टूटता नहीं। यदि फल मिले, तो अहंकार नहीं आता।

कारण स्पष्ट है; फल अनेक धागों से बुना जाता है, जिनमें से एक ही धागा हमारे हाथ में है, हमारा कर्म। असफलता प्रायः पूरे ताने बाने का परिणाम होती है, और दण्ड हम अकेले धागे को दे देते हैं। परम्परा कहती है, धागे को कसो, ताने बाने को स्वीकारो।

विज्ञान क्या कहता है

विज्ञान असफलता को एक और ही दृष्टि से देखता है; उसके लिए वह सूचना है। मस्तिष्क सीखता ही वहाँ है जहाँ अपेक्षा और परिणाम में अन्तर पड़ता है; जहाँ सब अनुमान के अनुसार हो जाए, वहाँ सीखने को कुछ बचता नहीं। अर्थात् जिसे हम असफलता कहते हैं, सीखने की भाषा में वह पाठ का सबसे घना पृष्ठ है।

और अध्ययन एक सूक्ष्म भेद भी संकेत करते हैं; मेरा प्रयास चूक गया कहने वाला मन सुधार की ओर बढ़ता है, जबकि मैं ही निकम्मा हूँ कहने वाला मन छिपने की ओर। पहला भाव कर्म पर टिका है, दूसरा पहचान पर। चुभन वहीं विष बनती है, जहाँ घटना पहचान से चिपक जाती है।

एक क्षण विचार का

आज अपनी किसी एक पुरानी असफलता को कागज़ पर बुलाइए, जो अब चुभती नहीं। और उससे केवल एक प्रश्न पूछिए; तूने मुझे क्या दिया। कोई मोड़, कोई विनम्रता, कोई नया मार्ग, कोई व्यक्ति। आप पाएँगे कि समय के साथ बन्द दरवाज़े प्रायः खिड़कियाँ निकले।

और जो असफलता अभी ताज़ी चुभ रही हो, उसके लिए इतना ही; उसे घटना रहने दीजिए, निर्णय मत बनने दीजिए। आप वह नहीं हैं जो उस दिन नहीं हो पाया; आप वह हैं जो अगली सुबह फिर उठ खड़ा हुआ।

सम्बन्धित सूत्र
"जो हुआ, वह हुआ। किन्तु उससे हम कौन सी कथा निकालते हैं, यह हमारे हाथ में है। तब वही दुःख जो कभी एक बन्द दरवाज़ा था, एक खुली खिड़की बन जाता है।"
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