विविध लेख
जीवन की साँझ में मन खाली क्यों लगने लगता है
डॉ. कृष्ण अवतार
सेवानिवृत्ति के बाद की पहली सुबह बड़ी विचित्र होती है। वर्षों में पहली बार घड़ी का अलार्म नहीं बजा; और यह सुख जैसा लगना चाहिए था, किन्तु छाती में कहीं कुछ खाली सा है। जिस मेज़ की ओर चालीस वर्ष पैर अपने आप चलते थे, वह अब किसी और की है। फ़ोन पहले से कम बजता है। और डाक में नाम के आगे से वह पद हट गया है, जो कब पहचान बन गया था, पता ही नहीं चला।
ओ.पी.डी. में यह वाक्य मैंने अनगिनत बार सुना है, भिन्न भिन्न मुखों से, एक ही स्वर में; डॉक्टर साहब, अब हमारी आवश्यकता ही क्या रह गई है।
प्रश्न
प्रश्न यह है कि यह खालीपन वास्तव में किसका है। काम तो गया ही है; किन्तु क्या केवल काम गया है, या उसके साथ वह पहचान भी चली गई जिसे हमने अपना होना समझ लिया था। और यदि पहचान जाने से मैं खाली हो जाता हूँ, तो क्या मैं केवल पहचान ही था।
ज्ञान क्या कहता है
हमारी परम्परा ने जीवन की साँझ को कभी उतार नहीं माना; उसने उसे ऋतु परिवर्तन कहा। वानप्रस्थ की कल्पना कोई निर्वासन नहीं थी; वह जीवन का वह मोड़ थी जहाँ मनुष्य संग्रह से सिंचन की ओर मुड़ता है। जो कमाया, अब वह बाँटा जाए; जो सीखा, अब वह सौंपा जाए; और जो दौड़ में छूट गया था, उस भीतर वाले से अब भेंट की जाए।
अर्थात् साँझ का प्रयोजन घटता नहीं, बदलता है। पहले जीवन करने से चलता था; अब होने से चलता है। और होना, करने से छोटा नहीं, बड़ा है; क्योंकि करने की सीमा है, होने की नहीं।
विज्ञान क्या कहता है
विज्ञान की भाषा में यह खालीपन भूमिका के छिन जाने का शोक है; और वह उतना ही वास्तविक है जितना कोई और शोक। किन्तु अध्ययन एक बहुत आशा भरी बात भी संकेत करते हैं; वृद्धावस्था में स्वास्थ्य का सम्बन्ध केवल औषधियों से नहीं, प्रयोजन से भी है। जिनके जीवन में कोई उद्देश्य बना रहता है, कोई नियमित दिनचर्या, कोई सीखना, कोई जुड़ाव, उनका तन और मन, दोनों अधिक समय तक सक्षम रहते हैं।
और स्मरण रहे, मस्तिष्क के विषय में हम पहले कह चुके हैं कि वह किसी भी आयु में बदल सकता है। नया सीखना साँझ में भी सम्भव है; भाषा, वाद्य, शास्त्र, सेवा का कोई नया रूप। जो सीखता रहता है, वह भीतर से वृद्ध नहीं होता।
एक क्षण विचार का
आज एक सूची बनाइए; उपलब्धियों की नहीं, देने योग्य वस्तुओं की। कौन सा अनुभव है जो किसी नए व्यक्ति के काम आ सकता है। कौन सी कथा है जो पोते पोतियों तक पहुँचनी चाहिए। कौन सी सेवा है जो अब समय होने पर सम्भव है। कौन सा नाम है जिसका स्मरण अब बिना घड़ी देखे हो सकता है।
और अपने आप से वह प्रश्न भी पूछिए, जो मैंने अपने सूत्रों में सबसे कठिन पाया है; “यदि आज मेरा अन्तिम दिन होता, तो क्या मैं वह करता, जो आज करने वाला हूँ।” साँझ इस प्रश्न से डरने का नहीं, इसका उत्तर जीने का समय है। दीपक साँझ को ही जलाया जाता है।