विविध लेख
मृत्यु का स्मरण जीवन को क्या देता है
डॉ. कृष्ण अवतार
श्मशान से लौटते हुए मनुष्य कुछ घण्टों के लिए सन्त हो जाता है। उस साँझ झगड़े व्यर्थ लगते हैं, सम्पत्ति छोटी, अहंकार हास्यास्पद; मन कहता है, अब ऐसे नहीं जीना। और तीसरे दिन सब वैसा ही चलने लगता है। उस साँझ जो दिखा था, वह झूठ नहीं था; वह टिका क्यों नहीं।
हमारी संस्कृति ने मृत्यु को कभी अन्तिम पृष्ठ का विषय नहीं माना; उसने उसे पहला अध्याय बनाया। कठोपनिषद् में एक किशोर नचिकेता स्वयं मृत्यु के देवता के द्वार पर जाकर जीवन का रहस्य पूछता है। जो प्रश्न से भागते हैं, उनके लिए मृत्यु भय है; जो प्रश्न के पास बैठते हैं, उनके लिए वह गुरु बन जाती है।
प्रश्न
तो प्रश्न यह है; मृत्यु का स्मरण हमें डराने के लिए है, या जगाने के लिए। और यदि जगाने के लिए है, तो वह जागरण तीन दिन में सो क्यों जाता है।
ज्ञान क्या कहता है
परम्परा का उत्तर सूक्ष्म है; श्मशान वैराग्य इसीलिए उड़ जाता है क्योंकि वह भय से जन्मा था, बोध से नहीं। भय की स्याही कच्ची होती है। बोध का स्मरण भिन्न है; वह प्रतिदिन का, शान्त, छोटा सा स्मरण है कि समय सीमित है। और जब यह जान लेते हैं, कि समय सीमित है, तो जो महत्त्वपूर्ण है, वह सामने आता है। जो गौण है, वह पीछे छूट जाता है। जो अनावश्यक है, वह स्वयं हट जाता है।
इसीलिए हमारे यहाँ मृत्यु का स्मरण रुग्णता नहीं, स्वच्छता है; वह प्रतिदिन मन का आँगन बुहार देता है। और जिसे देह और देही का भेद दिखने लगता है, उसके लिए तो मृत्यु वस्त्र बदलना है; वह स्मरण फिर भय नहीं, विश्राम देता है।
विज्ञान क्या कहता है
विज्ञान के पास भी इस विषय की दो गवाहियाँ हैं। पहली यह, कि मृत्यु का विचार जब अचानक और असहाय होकर आता है, तब मन उससे भागता है और उस भागने में तरह तरह की ओट खोजता है। किन्तु वही विचार जब शान्त भाव से, अपनी इच्छा से, बार बार देखा जाता है, तब अध्ययन संकेत करते हैं कि प्राथमिकताएँ स्पष्ट होती हैं, क्षुद्र बातें अपने आप छोटी पड़ती हैं, और सम्बन्धों का मूल्य बढ़ जाता है।
दूसरी गवाही उनकी है जो जीवन की अन्तिम साँझ में रोगियों के साथ रहे हैं। वे बताते हैं कि अन्त समय के पछतावे प्रायः उन कामों के नहीं होते जो बिगड़ गए; वे उन बातों के होते हैं जो कही नहीं गईं, उस प्रेम के, जो व्यक्त नहीं हुआ, उस जीवन के, जो दूसरों की अपेक्षाओं में बीत गया। मृत्यु का स्मरण इन पछतावों की सूची को आज पढ़ लेने की विधि है, जब सुधार का समय शेष है।
एक क्षण विचार का
आज कोई बड़ा व्रत नहीं; केवल एक काम। किसी एक प्रिय व्यक्ति से वह वाक्य आज कह दीजिए, जो आप सोचते हैं कि कभी अन्तिम भेंट पर कहेंगे। धन्यवाद का, क्षमा का, प्रेम का, जो भी हो। अन्तिम भेंट का समय किसी पंचांग में नहीं लिखा; और जो वाक्य कह दिया गया, वह पछतावों की सूची से सदा के लिए कट गया।
और यदि इन दिनों किसी अपने का वियोग ताज़ा है, तो यह लेख नहीं, सहारा चाहिए; कृपया वियोग वाला लेख पढ़िए, किसी अपने से बात कीजिए, अथवा संकट सहायता निर्देशिका के द्वार खुले हैं।