विविध लेख

रोग शरीर को होता है, तो टूटता मन क्यों है

डॉ. कृष्ण अवतार

रिपोर्ट हाथ में आने के बाद का दृश्य लगभग हर परिवार में एक सा होता है। कागज़ पर कुछ शब्द होते हैं, कुछ अंक; और उन्हें पढ़ते ही घर की हवा बदल जाती है। भोजन वही है, कमरा वही, लोग वही; किन्तु सब कुछ किसी और युग का लगने लगता है। रोग अभी शरीर में उतना नहीं फैला होता, जितना कुछ ही घण्टों में मन में फैल जाता है।

तीन दशकों से अधिक के चिकित्सा जीवन में मैंने यह बार बार देखा है; रिपोर्ट एक सी, यात्राएँ भिन्न। और यहीं से यह कहानी अपना प्रश्न पाती है।

प्रश्न

यदि रोग शरीर की घटना है, तो टूटना मन में क्यों घटता है। और यदि टूटना मन में घटता है, तो क्या वहीं कोई द्वार भी है, जो रोग के रहते भी खुला रह सकता है।

ज्ञान क्या कहता है

हमारी परम्परा देह और देही का भेद जीवन भर सिखाती है; शरीर वस्त्र है, वाहन है, मन्दिर है, और भीतर वाला उससे भिन्न। यह भेद स्वस्थ दिनों में दर्शन लगता है; रोग के दिनों में वह औषधि बन जाता है। क्योंकि रोग वस्त्र पर है; पहनने वाले पर उसकी पहुँच उतनी ही है, जितनी हम उसे दे दें।

और परम्परा यह भी कहती है कि शरीर धर्म का पहला साधन है; अतः उसकी चिकित्सा, उसकी देखभाल, उसका उपचार, यह सब भी साधना का ही अंग है। रोग को स्वीकारना और उपचार को पूरी निष्ठा से करना, ये विरोधी नहीं, एक ही श्रद्धा के दो हाथ हैं।

विज्ञान क्या कहता है

चिकित्सा विज्ञान भी अब दो बातें अलग करके देखता है; एक वह रोग, जो जाँचों में दिखता है, और दूसरा वह अनुभव, जो रोगी उस रोग के साथ जीता है। दोनों सदा बराबर नहीं होते। एक ही व्याधि किसी के जीवन को पूरा निगल लेती है, और किसी के जीवन के एक कोने में रहकर चलती रहती है। अध्ययन संकेत करते हैं कि इस अन्तर में मन की बड़ी भूमिका है; भय, अकेलापन और निरन्तर चलता भीतरी युद्ध रोग के अनुभव को बड़ा करते हैं, जबकि समझ, सहारा और स्वीकृति उसे सँभालने योग्य बनाते हैं।

इसीलिए आज की चिकित्सा केवल औषधि नहीं, शिक्षा भी देना चाहती है; क्योंकि जो रोग को पहचान लेता है, वह उससे डरना बन्द कर देता है। और परिवार का, मित्रों का, सत्संग का साथ; ये कोई भावुक बातें नहीं, नापे हुए बल हैं।

एक क्षण विचार का

यदि इन दिनों आप अथवा आपका कोई अपना किसी रोग से गुज़र रहा है, तो आज भाषा का एक छोटा प्रयोग कीजिए। मैं रोगी हूँ के स्थान पर कहिए, मुझे एक रोग है। पहला वाक्य पूरी पहचान रोग को सौंप देता है; दूसरा रोग को उसकी सीमा में रखता है। रोग आपके पास है; आप रोग के पास नहीं हैं।

और आज एक बार उस शरीर को धन्यवाद भी कहिए, जो रोग के बीच भी साँस ले रहा है, पचा रहा है, लड़ रहा है। जिस सिपाही की सराहना होती है, वह और बल से लड़ता है।

सम्बन्धित सूत्र
"जो रोग को पहचान लेता है, वह उससे डरना बन्द कर देता है। जो दुःख को पहचान लेता है, वह उससे मुक्त होने का मार्ग पा सकता है।"
आगे के द्वार

यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; यह किसी रोगी विशेष का परामर्श, निदान अथवा औषधि सुझाव नहीं है। अपनी स्थिति के लिए कृपया अपने चिकित्सक से मिलें।