विविध लेख
आज के समय में बच्चों को संस्कार कैसे मिलें
डॉ. कृष्ण अवतार
यह प्रश्न हर पीढ़ी के माता पिता का रहा है, किन्तु आज कुछ अधिक व्याकुलता से पूछा जाता है; बच्चे मोबाइल में डूबे हैं, हमारी सुनते नहीं, संस्कार कैसे दें। पूछने वालों की आँखों में प्रायः थोड़ा अपराध बोध भी होता है, मानो कहीं कोई पाठ पढ़ाना छूट गया हो।
उत्तर से पहले एक ढाढ़स; संस्कार कभी भी भाषण से नहीं गए थे। न हमारे समय में, न हमारे पूर्वजों के समय में। अतः जो विधि कभी थी ही नहीं, उसके छूटने का दोष अपने ऊपर मत लीजिए।
ज्ञान क्या कहता है
पहले यह समझ लें कि संस्कार है क्या। संस्कार का अर्थ है गहरी मानसिक छाप; जब कोई अनुभव बार बार दोहराया जाता है, तब वह मन में एक गहरी लकीर बना देता है, और फिर वह लकीर स्वचालित हो जाती है। ध्यान दीजिए; अनुभव बार बार दोहराया जाता है। भाषण एक बार सुना जाता है; घर का वातावरण प्रतिदिन दोहराया जाता है। इसीलिए बच्चे का वास्तविक पाठ्यक्रम वह नहीं है जो हम उसे कहते हैं; वह है जो वह हमें प्रतिदिन करते देखता है।
मैं अपने ही जीवन की साक्षी दूँ। मेरे पिता जी ने मुझे कभी बैठाकर सिद्धान्तों का पाठ नहीं पढ़ाया। किन्तु जीवन में समझौता किस बात पर नहीं करना है, यह मैंने किसी पुस्तक से नहीं, उन्हीं को देखकर सीखा। और मेरी माता जी का एक आग्रह, कि भगवान का आश्रय कभी मत छोड़ना, आज तक मेरी साधना की नींव में रखा है। दोनों ने संस्कार दिए नहीं; जिए, और मुझ तक अपने आप उतर गए।
विज्ञान क्या कहता है
बाल मन के अध्ययन इस अनुभव के साथ खड़े हैं; बच्चा सुनने से बहुत कम और देखने से बहुत अधिक सीखता है। वह घर का स्वर सीखता है, क्रोध में हमारा व्यवहार सीखता है, सत्य और सुविधा में हमारा चुनाव सीखता है, और हमारे ही हाथ में पकड़ा हुआ फ़ोन भी। जहाँ कथनी और करनी में अन्तर होता है, वहाँ बच्चा सदा करनी को चुनता है; और साथ में यह पाठ भी पढ़ लेता है कि कथनी का मूल्य नहीं होता।
और परदे के विषय में विज्ञान की सीधी सी बात है; बच्चे को परदे से छुड़ाने का मार्ग निषेध कम, विकल्प अधिक है। खाली समय और खाली साथ, इन दोनों को जो भर दे, बच्चा उसी का हो जाता है। परदा उन घरों में जीतता है जहाँ उसके सामने कोई खड़ा ही नहीं होता; कोई कथा, कोई खेल, कोई साथ बैठा भोजन, कोई साझा हँसी।
एक क्षण विचार का
आज से दो छोटे नियम, बच्चों के लिए नहीं, अपने लिए। पहला; सप्ताह में एक साँझ पूरे परिवार की, बिना परदों की; भोजन साथ, और एक कथा, कोई भी, दादा दादी की, रामायण की, आपके अपने बचपन की। बच्चा उस साँझ को जीवन भर नहीं भूलेगा। दूसरा; जो एक गुण आप बच्चे में सबसे अधिक चाहते हैं, वह इस सप्ताह उसके सामने स्वयं जीकर दिखाइए; सत्य, कोमल वाणी, प्रणाम, क्षमा, सेवा, जो भी हो।
संस्कार वसीयत नहीं है, जो लिखकर दे दी जाए। वह सुगन्ध है; जो घर में हो, तो वस्त्रों में अपने आप बस जाती है।