विविध लेख
क्षमा किसके लिए की जाती है
डॉ. कृष्ण अवतार
हर घर में एक ऐसा नाम होता है जिसके आते ही कमरे की हवा बदल जाती है। वर्षों पुरानी कोई बात; कोई बँटवारा, कोई वाक्य, कोई विवाह, कोई विश्वासघात। घटना कब की बीत चुकी; किन्तु उसका मुक़दमा भीतर आज भी प्रतिदिन चलता है, और उस अदालत में वकील भी हम हैं, न्यायाधीश भी हम, और दण्ड भी अन्ततः हमीं भोगते हैं।
चिकित्सा जीवन ने मुझे यह देखने का अवसर दिया है कि वर्षों पाला हुआ क्रोध केवल सम्बन्ध नहीं खाता; वह नींद खाता है, चैन खाता है, और धीरे धीरे स्वास्थ्य भी। तब यह प्रश्न उठता है, जो दिखने में छोटा है और वास्तव में जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों में है।
प्रश्न
क्षमा किसके लिए की जाती है। उसके लिए, जिसने घाव दिया। या उसके लिए, जो घाव उठाए घूम रहा है।
ज्ञान क्या कहता है
हमारी परम्परा ने क्षमा को दुर्बलों का नहीं, वीरों का आभूषण कहा है; क्योंकि प्रतिकार सरल है, छोड़ना कठिन। किन्तु उसने एक भूल से भी बचाया है, जो क्षमा के नाम पर प्रायः होती है। क्षमा का अर्थ यह नहीं कि जो हुआ वह उचित था। अन्याय अन्याय रहता है; क्षमा उसे धर्म नहीं बना देती। क्षमा केवल इतना करती है कि उस अन्याय की रस्सी, जो हमारे हृदय से बँधी चली आ रही थी, उसे हमारे छोर से खोल देती है।
और यह भी समझने योग्य है कि क्षमा कोई एक क्षण का दान नहीं है; वह एक साधना है, जो बार बार करनी पड़ती है, क्योंकि स्मृति बार बार लौटती है। जिस दिन स्मृति लौटे और भीतर आग न उठे, समझिए साधना फल रही है।
विज्ञान क्या कहता है
विज्ञान की गवाही यहाँ परम्परा के साथ खड़ी दिखती है। अध्ययन संकेत करते हैं कि लगातार पाला हुआ क्रोध और शत्रुभाव शरीर के लिए वैसा ही चिर तनाव है जैसा कोई और; हृदय, रक्तचाप, नींद, सब उसकी छाया में रहते हैं। क्रोध का घूँट वास्तव में हम स्वयं पीते हैं, और प्रतीक्षा करते हैं कि कड़वाहट किसी और को लगे।
और जिन लोगों ने क्षमा को एक अभ्यास की तरह साधा, उन पर हुए अध्ययन यह संकेत देते हैं कि उनका तनाव घटता है, नींद सुधरती है, और मन का भार हल्का होता है। विज्ञान यह नहीं कहता कि क्षमा सरल है; वह केवल यह कहता है कि उसका पहला और सबसे बड़ा लाभार्थी क्षमा करने वाला स्वयं है।
एक स्पष्टता और; क्षमा का अर्थ यह नहीं कि अन्याय सहते रहना ही धर्म है। जहाँ अन्याय चल रहा हो, वहाँ मर्यादा और दूरी बनाना भी विवेक है। क्षमा भीतर की गाँठ खोलती है; वह बाहर की सावधानी छोड़ने का आदेश नहीं है।
एक क्षण विचार का
आज पूरी क्षमा का व्रत मत लीजिए; वह प्रायः टूट जाता है। केवल एक छोटा प्रयोग कीजिए। एकान्त में बैठकर उस व्यक्ति के नाम एक पत्र लिखिए, जो कभी भेजा नहीं जाएगा। उसमें सब कहिए; क्रोध भी, पीड़ा भी, और अन्त में एक पंक्ति यह भी, कि मैं यह बोझ अब और नहीं उठाना चाहता।
पत्र को फाड़ दीजिए। और देखिए, उस रात नींद कैसी आती है। क्षमा वहीं से आरम्भ होती है; कागज़ पर नहीं, छाती पर से एक पत्थर सरकने से।