विविध लेख
सब कुछ पाकर भी खाली क्यों लगता है
डॉ. कृष्ण अवतार
जीवन में कुछ रातें ऐसी आती हैं जिनकी किसी से चर्चा नहीं होती। वह रात, जब वर्षों का साधा हुआ लक्ष्य मिल गया; पद, भवन, सम्मान, समारोह, बधाइयों से भरा फ़ोन। और देर रात, जब सब सो गए, भीतर से एक धीमा सा प्रश्न उठा; बस? इतना ही?
यह प्रश्न कृतघ्नता नहीं है। यह उस मनुष्य का प्रश्न है जिसने सीढ़ी पूरी ईमानदारी से चढ़ी, और ऊपर पहुँचकर पाया कि छत पर वह नहीं है जिसका पता सीढ़ी ने दिया था।
प्रश्न
प्रश्न यह नहीं कि सफलता क्यों नहीं भरती; सफलता ने भरने का वचन कब दिया था, यह वचन तो हमने उससे जोड़ लिया था। असली प्रश्न यह है; वह पात्र कौन सा है, जो सचमुच भरता है।
ज्ञान क्या कहता है
उपनिषद् इस अनुभव को एक ही पंक्ति में रख देते हैं; अल्प में सुख नहीं है। छोटा पात्र कितना भी भर जाए, रहेगा छोटा ही। मैं और मेरा, इन दो शब्दों की परिधि जितनी है, सुख की परिधि भी उतनी ही रहती है। इसीलिए उपलब्धियाँ परिधि के भीतर ढेर होती जाती हैं, और परिधि वैसी ही तंग रहती है।
और परम्परा ने विस्तार का द्वार भी बता दिया; जो स्वयं के लिए जीता है, वह घटता जाता है। जो दूसरों के लिए जीता है, वह बढ़ता जाता है। रिक्तता पात्र के खाली होने की सूचना नहीं है; वह पात्र के छोटे होने की सूचना है। भरना नहीं, बड़ा होना है।
विज्ञान क्या कहता है
विज्ञान इस रात से परिचित है। अध्ययन संकेत करते हैं कि बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के बाद उल्लास आश्चर्यजनक रूप से अल्पजीवी होता है; मन शीघ्र नई परिस्थिति का अभ्यस्त हो जाता है, और मापदण्ड आगे सरक जाता है; इसकी चर्चा हम सुख वाले लेखों में कर चुके हैं। इसीलिए दौड़ते हुए मनुष्य को यह भ्रम बना रहता है कि अगली पायदान पर चैन है; और हर पायदान पर वही अगली पायदान।
और अध्ययन यह भी संकेत करते हैं कि जो तृप्ति देर तक टिकती है, वह प्रायः भोग से नहीं, अर्थ से आती है; किसी से गहरा जुड़ाव, किसी का काम आ जाना, अपने से बड़े किसी प्रयोजन का अंग होना। भाषा विज्ञान की है, बात वही है, जो ऊपर परम्परा ने कही।
एक क्षण विचार का
आज अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि को स्मरण कीजिए, और उससे एक नया प्रश्न पूछिए; तू किस किसके काम आई। जिन नामों की सूची बने, वही उस उपलब्धि का वास्तविक मूल्य है। यदि सूची छोटी लगे, तो निराश मत होइए; वह लम्बी की जा सकती है, आज से, इसी उपलब्धि से।
सफलता का सबसे सुन्दर उपयोग उसे भोगना नहीं, उसे समर्पित करना है। जो दीपक केवल अपने लिए जलता है, वह अपनी ही लौ से घुटता है; जो औरों के लिए जलता है, उसका प्रकाश ही उसका आनन्द बन जाता है।